मप्र के आंगन में मानसून का मंगल प्रवेश, भीगा आधा प्रदेश
इंतजार खत्म: नौ दिन रूठा रहा मानसून, अब खुलकर बरसने की तैयारी में
मध्य प्रदेश के लिए बुधवार अच्छी खबर लेकर आया। प्रदेश में अपनी सामान्य तिथि से 9 दिन की देरी से दक्षिण-पश्चिम मानसून का आगाज हुआ। प्रदेश के एक बड़े हिस्से में झमाझम बारिश हुई। आधे से अधिक प्रदेश, विशेषकर दक्षिणी और मध्य भाग, मानसून की पहली फुहारों से भीग गए।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने बताया है कि अगले दो दिनों में राज्य के शेष हिस्सों में भी मानसून छा जाने के आसार हैं। IMD के आधिकारिक पूर्वानुमान के अनुसार मानसून की उत्तरी सीमा मध्य प्रदेश के इंदौर और मंडला से गुजर रही है। मध्य प्रदेश के ऊपर कई अनुकूल मौसम प्रणालियां सक्रिय हैं। अगले कुछ दिनों तक बारिश का अच्छा दौर जारी रहने की संभावना है।
मुख्य ट्रफ से गुजर रहा मानसून
राज्य से मानसून की मुख्य ट्रफ गुजर रही है। राजस्थान से लेकर पश्चिम बंगाल तक एक लंबी कम दबाव वाली रेखा बनी हुई है, जो मध्य प्रदेश से होकर गुजर रही है। यह रेखा जहां-जहां से गुजरती है, वहां बादल बनने और बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।
प्रदेश के ऊपर चक्रवातीय परिसंचरण का बना क्षेत्र
यह सिस्टम आसपास की नमी को खींचकर ऊपर उठाता है, जिससे बादल बनते हैं और बारिश बढ़ती है। मध्य प्रदेश से अरब सागर तक एक ट्रफ बनी हुई है। वहीं, प्रदेश के ऊपर कम दबाव की एक पट्टी भी सक्रिय है। इसकी वजह से अरब सागर से नमी लगातार मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की ओर आ रही है, जिससे अच्छी बारिश के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं।
इन जगहों पर मानसून की झमाझम
मंडला, बालाघाट, इंदौर, धार, सिवनी, खरगौन, खंडवा और भोपाल के आसपास के जिलों में सामान्य से बेहतर बारिश हुई है।मानसून के अनुकूल परिस्थितियां बनते ही पूरे प्रदेश में, अपवाद स्वरूप नौगांव को छोड़कर, सभी स्थानों पर अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से नीचे आ गया है।
कालिदास के 'मेघदूत' में दर्ज है मानसून का शाश्वत भूगोल
कवि कालिदास ने डेढ़ हजार साल पहले पढ़ ली थी बादलों की राह
करीब डेढ़ हजार साल पहले महान कवि कालिदास ने मानसूनी बादलों का मार्ग अपनी काव्य रचना 'मेघदूत' में बड़ी स्पष्टता से वर्णित किया था। यद्यपि 'मेघदूत' का स्वरूप काव्यात्मक है, लेकिन यह एक तथ्य है कि बादलों का जो मार्ग उस समय वर्णित किया गया था, कमोबेश उसी मार्ग से मानसून आज भी आगे बढ़ता है।हालांकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कभी-कभी मानसून अनियमित व्यवहार करता है। बादल किसी एक स्थान पर अपेक्षा से अधिक समय तक ठहर जाते हैं, लेकिन वर्षा का डेढ़ हजार वर्ष पुराना मार्ग आज भी काफी हद तक वही है। इसी मार्ग पर चलते हुए बादल भारतीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक जनजीवन को आधार प्रदान करते हैं।यह स्पष्ट करता है कि कालिदास केवल महाकवि ही नहीं थे, बल्कि उनका भौगोलिक ज्ञान भी उतना ही विलक्षण और व्यावहारिक था। यह भारतीय मेधा का उत्कृष्ट उदाहरण है।इन बातों का उल्लेख आज इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि बुधवार को मध्य प्रदेश में मानसून ने प्रभावी दस्तक दे दी है। प्रदेश में मानसून का यह आगमन भी महाराष्ट्र के रास्ते ही हुआ है।
मेघदूत में वर्णित मेघों का मार्ग
रामगिरि
कालिदास ने वर्तमान नागपुर के पास स्थित रामगिरि पर्वत से बादलों के उठने का उल्लेख किया है। वहां से बादल उत्तर दिशा की ओर, अर्थात वर्तमान मध्य प्रदेश की तरफ बढ़ते हैं।
मालव क्षेत्र
रामगिरि से आगे बढ़ते हुए बादल मालव क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, जिसे अध्येताओं ने वर्तमान मालवा क्षेत्र से जोड़ा है।
आम्रकूट
मालवा से आगे बढ़ते हुए बादल आम्रकूट, अर्थात वर्तमान अमरकंटक के पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा कराते हैं।
नर्मदा क्षेत्र
कालिदास ने नर्मदा क्षेत्र का भी उल्लेख किया है। इस क्षेत्र में वर्तमान सीहोर सहित आसपास के इलाके शामिल माने जाते हैं।
दशार्ण
दशार्ण क्षेत्र में मालवा और विदिशा अंचल के दक्षिण-पूर्वी भाग शामिल हैं। इसमें रायसेन और विदिशा क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। यहां से गुजरने वाली वेत्रवती (बेतवा) और शिप्रा नदियों का भी वर्णन किया गया है।
गंभीरा और चंबल
उज्जैन और रतलाम के बीच बहने वाली गंभीरा नदी तथा चर्मण्वती (चंबल) का भी उल्लेख मिलता है। यहां बादलों को निर्देशित किया गया है कि जब वीणा लिए हुए सिद्ध दंपति बूंदों के भय से मार्ग छोड़ दें, तब आगे बढ़ना और फिर चर्मण्वती (चंबल) के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए नीचे उतरना।
नोट: मेघदूत में "मानसून" शब्द का उल्लेख नहीं है। उस काल में वर्षा ऋतु के लिए "प्रावृषा" शब्द का प्रयोग किया जाता था।