कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर जीतने वाली ज्ञानेश्वरी

छत्तीसगढ़ की बेटी ज्ञानेश्वरी का संघर्ष लाया रंग, भाई से किया वादा निभाकर जीता कॉमनवेल्थ सिल्वर

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में राजनांदगांव की ज्ञानेश्वरी यादव ने महिला 53 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में 199 किलोग्राम वजन उठाकर भारत के लिए सिल्वर मेडल जीता। लेकिन इस पदक के पीछे वर्षों की ऐसी मेहनत और संघर्ष है, जिसे सिर्फ मेडल के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और परिवार के लगातार त्याग ने इस उपलब्धि की नींव रखी।

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हुए मुकाबले में ज्ञानेश्वरी ने 88 किलोग्राम स्नैच और 111 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क के साथ कुल 199 किलोग्राम वजन उठाया। नाइजीरिया की ओनोमे ओमोलोला डिडीह ने 206 किलोग्राम के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि कनाडा की रेबेका ग्रूलक्स को कांस्य पदक मिला।

इलेक्ट्रिशियन पिता ने सपने के आगे नहीं आने दी गरीबी

ज्ञानेश्वरी की खेल यात्रा किसी बड़े स्पोर्ट्स सेंटर से नहीं, बल्कि राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। उनके पिता दीपक यादव इलेक्ट्रिशियन का काम करते थे और महीने में तीन से पांच हजार रुपये की आमदनी से पूरे परिवार का खर्च चलाते थे। इसी कमाई से बेटी की डाइट, स्पोर्ट्स किट, जूते और प्रतियोगिताओं का खर्च भी उठाया गया। कई बार परिवार ने अपनी जरूरतें टाल दीं, लेकिन प्रशिक्षण में कभी समझौता नहीं होने दिया।

एक साइकिल पर तय होता था सपनों का रास्ता

परिवार का हर दिन संघर्ष से भरा था। ग्राम भोड़िया से दीपक यादव दोनों बच्चों को एक साइकिल पर बैठाकर रोज करीब आठ किलोमीटर दूर राजनांदगांव लाते थे। बच्चे स्कूल जाते और उसके बाद घंटों अभ्यास करते। रात में पूरा परिवार उसी साइकिल से गांव लौटता। घर पहुंचने तक दिन खत्म हो जाता, लेकिन अगले दिन फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाती।

कोच ने पहचानी प्रतिभा, पिता ने नहीं छोड़ा साथ

सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ज्ञानेश्वरी अपने पिता के साथ व्यायामशाला जाने लगीं। उनकी रुचि देखकर दीपक यादव ने कोच अजय लोहार से बेटी को वेटलिफ्टिंग सिखाने का आग्रह किया। वहीं से शुरू हुआ सफर लगातार आगे बढ़ता गया। परिवार ने हर चुनौती का सामना किया ताकि बेटी का अभ्यास कभी न रुके।

पहला पदक बना करियर का टर्निंग प्वाइंट

साल 2017 में राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में जीता कांस्य पदक ज्ञानेश्वरी के करियर का पहला बड़ा पड़ाव बना। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2022 में जूनियर विश्व वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उसी साल कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जूनियर और सीनियर दोनों वर्गों में गोल्ड जीतकर उन्होंने अपनी दावेदारी और मजबूत कर दी।

पुलिस की नौकरी मिली, लेकिन जिम्मेदारियां कम नहीं हुईं

साल 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने ज्ञानेश्वरी को सहायक उपनिरीक्षक के पद पर नियुक्त किया। इसके बावजूद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। राजनांदगांव में लिया गया मकान अब भी ऋण पर है और उसकी किस्तें परिवार मिलकर चुका रहा है। ऐसे में कॉमनवेल्थ गेम्स का यह सिल्वर मेडल सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के त्याग, धैर्य और भरोसे की पहचान बन गया।

भाई अस्पताल में था, फिर भी निभाया अपना वादा

इस जीत के पीछे एक भावनात्मक पहलू भी जुड़ा रहा। मुकाबले के समय ज्ञानेश्वरी के भाई रितेश यादव दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में भर्ती थे। प्रतियोगिता से पहले उन्होंने भाई से बात कर पदक जीतने का वादा किया था। ग्लासगो में सिल्वर जीतकर उन्होंने वह वादा भी पूरा कर दिखाया।