करोड़ों का बजट, लेकिन रिसर्च ठप! BU में फैकल्टी संकट से लड़खड़ाया शोध कार्य
भोपाल। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में फैकल्टी की कमी से शोध कार्य प्रभावित हो रहा है। शोध कार्यों की स्थिति लगातार रिती जा रही है। स्थिति ये है कि बीते 5 साल में केवल 524 शोध कार्य हो पाएं है। खास बात ये है कि इन शोध कार्यों पर कुल बजट का आधा ही खर्च हो सका है।
बता दें कि शासन की ओर से विश्वविद्यालय को रिसर्च और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों का बजट दिया जा रहा है, लेकिन धरातल पर शोध कार्य बेहद धीमी गति से हो रहे हैं।
5 साल में केवल 524 रिसर्च वर्क
मिली जानकारी के अनुसार पिछले पांच वर्षों में विश्वविद्यालय में केवल 524 शोध कार्य पूरे हुए हैं। इनमें भी वर्ष 2023-24 में सबसे कम मात्र 97 शोध कार्य दर्ज किए गए। वर्ष 2024-25 के बजट अनुमान में शोध कार्यों के लिए बजट संशोधित कर 1.30 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान कर दिया गया, लेकिन अप्रैल से दिसंबर 2024 के बीच इस मद में केवल 3.29 लाख रुपये ही खर्च हुए हैं। कुल बजट का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा रिसर्च तक पहुंच ही नहीं सका।
प्रयोगशालाओं में संसाधनों का संकट गहराया
बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय में शोध कार्यों की रफ्तार संसाधनों की कमी के कारण लगातार प्रभावित हो रही है। विश्वविद्यालय में फैकल्टी के करीब आधे पद खाली पड़े हैं, जिससे रिसर्च गतिविधियों पर सीधा असर दिखाई दे रहा है। कई विभागों में शोध के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विज्ञान संकाय की प्रयोगशालाओं में केमिकल की कमी बनी हुई है, जबकि कई उपकरण पुराने और आउटडेटेड हो चुके हैं। ऐसे में शोधार्थियों को आधुनिक रिसर्च के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं।
प्रोजेक्ट बने, लेकिन बजट नहीं मिला
कुलगुरु सुरेश कुमार जैन ने विभागों को रिसर्च और नवाचार से जुड़े नए प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद कुछ विभागों ने अपने प्रस्ताव तैयार कर विश्वविद्यालय प्रबंधन को भेजे भी। हालांकि कई विभागों को अब तक जरूरी बजट स्वीकृत नहीं हो सका है। इससे रिसर्च से जुड़े कई प्रस्ताव फाइलों में ही अटके हुए हैं और जमीन पर काम शुरू नहीं हो पाया।
करोड़ों के बजट के बावजूद सवाल
प्रदेश के विश्वविद्यालयों को हर साल केंद्र और राज्य सरकार की ओर से करोड़ों रुपये का बजट दिया जाता है। इसके बावजूद रिसर्च के क्षेत्र में अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। बीयू की मौजूदा स्थिति ने उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विश्वविद्यालय का कुल वार्षिक बजट करीब 92 से 95 करोड़ रुपये बताया जा रहा है, लेकिन शोध कार्यों पर वास्तविक खर्च महज 0.05 प्रतिशत तक सीमित रह गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो इसका असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा।
तीन साल में रिसर्च का उतार-चढ़ाव
विश्वविद्यालय के आंकड़े बताते हैं कि शोध कार्यों की संख्या में लगातार स्थिरता नहीं रह पाई है। वर्ष 2022 में 134 शोध कार्य पूरे हुए थे। इसके बाद 2023 में यह संख्या बढ़कर 293 पहुंची, लेकिन 2024 में घटकर सिर्फ 97 रह गई। कम होती रिसर्च गतिविधियां विश्वविद्यालय की अकादमिक स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं।
प्रशासन बोला- बेहतर प्रोजेक्ट को मिलेगा फंड
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि रिसर्च के लिए अलग से बजट निर्धारित किया गया है। विभागाध्यक्षों से और अधिक रिसर्च प्रोजेक्ट तैयार करने के लिए कहा गया है। प्रबंधन के मुताबिक बेहतर और उपयोगी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी देकर बजट उपलब्ध कराया जाएगा। इस मामले पर कुलगुरु सुरेश कुमार जैन ने विभागों को रिसर्च और नवाचार से जुड़े प्रोजेक्ट तैयार करने के निर्देश दिए है।