ट्रंप की ईरान डील से क्या बदला? एक्सपर्ट बोले- 60 दिन में तय होगी असली सफलता
अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया समझौते को लेकर दुनिया भर में चर्चा जारी है। जहां इसे तनाव कम करने की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है, वहीं कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठा रहे हैं। वेस्ट एशिया मामलों के जानकारों का मानना है कि फिलहाल यह समझौता किसी बड़ी रणनीतिक जीत से ज्यादा युद्ध से पहले वाली स्थिति में लौटने जैसा दिखता है। उनका कहना है कि असली तस्वीर अगले 60 दिनों की वार्ता के बाद ही साफ होगी। यही वजह है कि समझौते को केवल युद्धविराम या कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में नहीं बल्कि अमेरिकी रणनीति की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है।
अभी तक क्या हासिल हुआ
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मिडिल ईस्ट प्रोग्राम से जुड़े वरिष्ठ फेलो विल टॉडमैन के मुताबिक शुरुआती समझौते का सबसे बड़ा उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच टकराव कम करना और होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना था। उनका मानना है कि मौजूदा व्यवस्था मूल रूप से दोनों देशों को उसी स्थिति में वापस ले जाती है, जहां वे सैन्य कार्रवाई शुरू होने से पहले थे। टॉडमैन का कहना है कि जिन लक्ष्यों को आधार बनाकर अमेरिका ने अभियान शुरू किया था, उनमें से किसी पर भी अभी स्पष्ट सफलता दिखाई नहीं देती।
60 दिन की बातचीत पर टिकी नजर
समझौते का सबसे अहम हिस्सा 60 दिनों की वार्ता अवधि को माना जा रहा है। इस दौरान ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार और उसके परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। विशेषज्ञों के अनुसार इसी चरण में यह तय होगा कि अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान पर कितनी प्रभावी शर्तें लागू करवा पाते हैं। यदि इन मुद्दों पर सहमति नहीं बनती तो मौजूदा समझौता केवल अस्थायी राहत तक सीमित रह सकता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में प्रस्तावित हस्ताक्षर प्रक्रिया के बाद इस समझौते को औपचारिक रूप दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।
होर्मुज खुलने से दुनिया को राहत
अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर बनी सहमति को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा मार्गों में शामिल है, जहां से बड़े पैमाने पर तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। इस मार्ग के खुलने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को स्थिरता मिलने की उम्मीद बढ़ी है। यही वजह है कि समझौते के बाद वैश्विक तेल बाजार में राहत का माहौल देखने को मिला।
खाड़ी देशों में बढ़ी नाराजगी
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे संघर्ष के दौरान अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों के रिश्तों पर भी असर पड़ा है। कई अरब देशों को लगा कि युद्ध के दौरान उनके हितों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली। टॉडमैन के मुताबिक इस भावना का असर भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। खाड़ी देश अपनी सुरक्षा रणनीति में बदलाव करते हुए अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ भी साझेदारी बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। उनका मानना है कि विश्वास की यह कमी निकट भविष्य में आसानी से दूर होती नहीं दिख रही।
इजरायल और अमेरिका के बीच भी उभरे सवाल
समझौते ने अमेरिका और इजरायल के बीच भी कुछ रणनीतिक मतभेदों को उजागर किया है। इजरायल को आशंका है कि मौजूदा व्यवस्था ईरान से जुड़े सुरक्षा खतरों को पूरी तरह खत्म नहीं करती। विशेषज्ञों के अनुसार इजरायली नेतृत्व यह भी मानता है कि क्षेत्र में उसकी कुछ सैन्य प्राथमिकताएं अभी अधूरी हैं। दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन क्षेत्रीय संघर्ष को और विस्तार देने के पक्ष में नहीं दिख रहा क्योंकि इससे समझौते पर असर पड़ सकता है।
यूरोप के साथ भी बढ़ सकती है दूरी
इस पूरे घटनाक्रम का असर अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों पर भी पड़ा है। युद्ध के दौरान कई यूरोपीय देशों ने सैन्य विकल्प के बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे ने पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा किया है। ऐसे में आने वाले समय में अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के साथ उसके संबंध भी नई परीक्षा से गुजर सकते हैं। फिलहाल समझौते ने तनाव कम करने का रास्ता जरूर खोला है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता अगले 60 दिनों की बातचीत और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े फैसलों पर निर्भर करेगी। यही दौर तय करेगा कि यह डील स्थायी समाधान बनती है या सिर्फ एक अस्थायी विराम साबित होती है।