TMC के 20 बागी सांसदों का NCPI में विलय, सियासी हलचल तेज; NDA के साथ काम करने का ऐलान
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 में से 20 सांसदों के एक अलग राजनीतिक कदम के बाद राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इन सांसदों ने त्रिपुरा की एक छोटी पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा की है। इसके साथ ही बागी सांसदों ने संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से की है।
NCPI की पृष्ठभूमि और अचानक चर्चा में वापसी
NCPI की स्थापना 2023 में पश्चिम बंगाल के उत्तिया कुंडू और शेउली कुंडू नामक दंपती ने की थी। पार्टी के दस्तावेजों के अनुसार उत्तिया कुंडू अध्यक्ष हैं, जबकि शेउली कुंडू कोषाध्यक्ष हैं। पार्टी का कार्यालय हावड़ा के बानीपुर इलाके में बताया जाता है। शुरुआती दौर में इसे एक सीमित राजनीतिक प्रयोग के तौर पर देखा गया था।
त्रिपुरा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन
2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में NCPI ने चार उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। उम्मीदवारों को कुल मिलाकर लगभग 1,198 वोट मिले थे और कई जगह वे NOTA से भी पीछे रहे। चुनाव के बाद पार्टी की सक्रियता लगभग खत्म हो गई थी और स्थानीय स्तर पर संपर्क भी टूट गया था।
TMC सांसदों का बड़ा राजनीतिक कदम
रविवार को TMC के 20 सांसदों ने NCPI में विलय की घोषणा करते हुए दावा किया कि वे अब NDA के साथ मिलकर काम करेंगे। बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग की है। उनका कहना है कि उनके पास दो-तिहाई सांसदों का समर्थन है, इसलिए यह कदम दल-बदल कानून के दायरे में आता है।
संसद में अलग बैठने की मांग
बागी गुट ने लोकसभा में TMC से अलग बैठने की जगह देने की मांग की है। सूत्रों के अनुसार, सांसदों ने पहले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से भी मुलाकात की थी। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उनका गुट अब NDA के साथ सहयोग करेगा और आगे की राजनीतिक रणनीति इसी दिशा में तय होगी।
ममता बनर्जी गुट की प्रतिक्रिया
TMC के मूल गुट ने इस पूरे घटनाक्रम को खारिज करते हुए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर बागी सांसदों को मान्यता न देने की मांग की है। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कहा है कि असली TMC कौन है, इसका निर्णय कानूनी प्रक्रिया और संसद के नियमों के तहत होगा।
NCPI और बागी नेताओं का दावा
बागी गुट का कहना है कि नियमों के अनुसार जब दो-तिहाई सदस्य किसी अलग संगठन में शामिल होते हैं, तो वह दल-बदल कानून के दायरे से बाहर माना जा सकता है। अब मामला लोकसभा अध्यक्ष और संभावित रूप से अदालत की व्याख्या पर निर्भर करता है कि इस विलय को वैध माना जाए या नहीं।