सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के फोटो-वीडियो सोशल मीडि

आरोपियों के वीडियो पोस्ट करना चिंताजनक: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के सोशल मीडिया ट्रेंड पर जताई सख्त चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा आरोपियों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के खिलाफ है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि आरोपियों के वीडियो और तस्वीरें सार्वजनिक करने से उनके खिलाफ पहले से ही माहौल बन जाता है, जो न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।  कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी का काम निष्पक्ष रहना है और वह न तो पीड़ित के पक्ष में होती है, न ही आरोपी के।

‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा ट्रेंड

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा बताया। बेंच ने कहा कि आजकल हर व्यक्ति मोबाइल के जरिए खुद को मीडिया समझने लगा है, जिससे गलत सूचनाएं और पूर्वाग्रह तेजी से फैल रहे हैं।याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि पुलिस अक्सर आरोपियों की हथकड़ी लगी या अपमानजनक स्थिति वाली तस्वीरें साझा करती है, जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुंचती है।

मीडिया ट्रायल पर भी चिंता

सुनवाई के दौरान सहारा बनाम सेबी केस का जिक्र किया गया, जिसमें पहले भी मीडिया ट्रायल के खतरे पर चिंता जताई जा चुकी है। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से यह समस्या और गंभीर हो गई है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ब्लैकमेलिंग जैसे तरीकों से माहौल बिगाड़ते हैं।

कोर्ट ने बताया कि पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने के लिए राज्यों को समय दिया गया है। बेंच ने सुझाव दिया कि याचिका को फिलहाल वापस लेकर SOP लागू होने के बाद दोबारा दायर किया जाए।यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से बढ़ती सामग्री न्याय प्रक्रिया और व्यक्तिगत अधिकारों पर असर डाल रही है।