तीन भाषा नियम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CBSE की नई पॉलिसी से छात्रों में बढ़ी उलझन
कक्षा 9वीं के छात्रों पर लागू किए गए CBSE के नए तीन भाषा नियम ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। सुप्रीम Court ने इस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। मामला सिर्फ भाषा चयन तक सीमित नहीं है। लाखों छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों का कहना है कि सत्र शुरू होने के बाद नियम बदलने से पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी पर सीधा असर पड़ेगा।
बुधवार को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, CBSE और NCERT को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अब दो हफ्ते बाद इस विवाद पर अगली सुनवाई होगी।
जुलाई से लागू नियम ने क्यों बढ़ाई परेशानी
CBSE के नए सर्कुलर के मुताबिक, 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9वीं के सभी छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इनमें कम से कम दो भाषाएं भारतीय होना जरूरी है। सबसे ज्यादा असर उन छात्रों पर पड़ रहा है जो अब तक फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या जापानी जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ रहे थे। नए नियम के तहत विदेशी भाषा तभी मुख्य विकल्प बन सकती है जब बाकी दो भाषाएं भारतीय हों। कई स्कूलों का कहना है कि सत्र शुरू होने के बाद यह बदलाव लागू करना प्रशासनिक और शैक्षणिक दोनों स्तर पर मुश्किल खड़ी करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई
छात्रों और अभिभावकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि अप्रैल से शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। ऐसे में बीच सत्र में नया नियम लागू करना छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव डालेगा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि CBSE ने पहले इस नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की बात कही थी। शुरुआती योजना के मुताबिक इसकी शुरुआत सिर्फ कक्षा 6 से होनी थी। लेकिन अचानक जुलाई 2026 से कक्षा 9वीं में इसे अनिवार्य करने के फैसले ने स्कूलों और परिवारों दोनों को असमंजस में डाल दिया है। याचिकाकर्ताओं ने इसे “अराजक स्थिति” पैदा करने वाला कदम बताया।
CBSE और NCERT ने क्या तर्क दिया
CBSE ने अपने फैसले का आधार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन 2023 को बताया है। बोर्ड का कहना है कि NCERT ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जो नया सिलेबस जारी किया है, उसमें तीन भाषाओं का प्रावधान शामिल है। ऐसे में CBSE को भी अपने पाठ्यक्रम और नियम उसी ढांचे के अनुरूप करने पड़े। बोर्ड का दावा है कि इस बदलाव का मकसद भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना और नई शिक्षा नीति को लागू करना है।
छात्रों और स्कूलों पर क्या असर पड़ सकता है
अगर यह नियम मौजूदा स्वरूप में लागू रहता है तो कई छात्रों को अपनी चुनी हुई विदेशी भाषा छोड़नी पड़ सकती है या फिर उसे अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ना होगा। स्कूलों के सामने भी नई भाषा व्यवस्था लागू करने की चुनौती खड़ी हो सकती है। कई संस्थानों में अभी पर्याप्त भाषा शिक्षक और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नीति का उद्देश्य भले ही भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना हो। लेकिन अचानक बदलाव से छात्रों की अकादमिक योजना और बोर्ड तैयारी प्रभावित हो सकती है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है।