शिवसेना के 60 साल के इतिहास में 6 बड़े विद्रोह हुए

बाल ठाकरे की पार्टी में फिर बगावत! 60 साल में 6 बार टूटी शिवसेना, उद्धव के कार्यकाल में 4 बड़े विद्रोह

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना के भीतर असंतोष और संभावित टूट की चर्चा तेज हो गई है। खबरें हैं कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद अलग राह चुन सकते हैं। हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इन अटकलों ने शिवसेना के छह दशक पुराने इतिहास की याद ताजा कर दी है। 1966 में बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित पार्टी अपने राजनीतिक सफर में कई बार बड़े विद्रोह और विभाजन का सामना कर चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी को सबसे ज्यादा झटके उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दौर में लगे हैं।

बाल ठाकरे के दौर में भी हुई थीं बगावतें

शिवसेना की स्थापना मराठी अस्मिता के मुद्दे पर हुई थी और लंबे समय तक बाल ठाकरे का पार्टी पर निर्विवाद नियंत्रण रहा। इसके बावजूद पार्टी के भीतर समय-समय पर असंतोष उभरता रहा।

1991: छगन भुजबल ने छोड़ा साथ

शिवसेना की पहली बड़ी राजनीतिक बगावत 1991 में सामने आई, जब पार्टी के प्रभावशाली ओबीसी नेता छगन भुजबल ने विद्रोह कर दिया। भुजबल ने शिवसेना छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा और बाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। उस समय यह शिवसेना के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया था।

2005: नारायण राणे की नाराजगी

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे भी बाल ठाकरे के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन नेतृत्व को लेकर मतभेद बढ़ने के बाद उन्होंने 2005 में पार्टी छोड़ दी। राणे का जाना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वे शिवसेना के सबसे आक्रामक और जनाधार वाले नेताओं में शामिल थे।

2006 में परिवार से उठी सबसे बड़ी चुनौती

राज ठाकरे ने बनाई नई पार्टी

2006 में शिवसेना को सबसे चर्चित झटका तब लगा जब बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन किया। माना जाता है कि उद्धव ठाकरे को पार्टी का उत्तराधिकारी बनाए जाने के बाद मतभेद गहराए थे। राज ठाकरे के जाने से शिवसेना के पारंपरिक वोट बैंक में भी असर पड़ा और महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया शक्ति केंद्र उभरा।

उद्धव ठाकरे के दौर में बढ़ी चुनौतियां

2012 में बाल ठाकरे के निधन के बाद पार्टी की पूरी कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में आ गई। इसके बाद शिवसेना ने सत्ता का स्वाद भी चखा और संकटों का सामना भी किया।

2022: एकनाथ शिंदे की बगावत ने बदल दी राजनीति

शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी टूट 2022 में हुई, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक पार्टी से अलग हो गए। इस बगावत के चलते उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई।

बाद में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को वास्तविक शिवसेना और पार्टी का पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ आवंटित कर दिया। यह उद्धव ठाकरे के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों स्तर पर बड़ा झटका था।

2022 के बाद जारी रहा पलायन

शिंदे विद्रोह के बाद भी शिवसेना (यूबीटी) से नेताओं के जाने का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका। कई सांसद, विधायक, जिला प्रमुख और स्थानीय स्तर के पदाधिकारी शिंदे गुट में शामिल होते रहे। इससे संगठन की ताकत लगातार प्रभावित होती रही।

2026: सांसदों की बगावत की चर्चा

अब एक बार फिर पार्टी में टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं। चर्चा है कि उद्धव गुट के कुछ सांसद अलग राजनीतिक रास्ता चुन सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में सामने आने वाला चौथा बड़ा राजनीतिक संकट माना जाएगा।

क्यों बार-बार टूटती रही शिवसेना?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना लंबे समय तक करिश्माई नेतृत्व आधारित पार्टी रही। बाल ठाकरे के दौर में व्यक्तिगत नेतृत्व पार्टी को एकजुट रखने का बड़ा आधार था। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरण, सत्ता की राजनीति और नेतृत्व को लेकर उभरते मतभेद समय-समय पर विद्रोह की वजह बनते रहे।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि 2019 के बाद शिवसेना की राजनीतिक दिशा में आए बदलाव और गठबंधन राजनीति ने संगठन के भीतर वैचारिक मतभेदों को और बढ़ाया।

कब-कब टूटी शिवसेना?

वर्ष नेता परिणाम
1991 छगन भुजबल पार्टी छोड़कर कांग्रेस में गए
2005 नारायण राणे शिवसेना से अलग हुए
2006 राज ठाकरे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई
2022 एकनाथ शिंदे शिवसेना दो हिस्सों में बंटी
2022-25 कई सांसद-विधायक शिंदे गुट में शामिल
2026 संभावित सांसद विद्रोह नई टूट की चर्चा