दीदी की सबसे भरोसेमंद सांसद ने क्यों बदला रुख? सयानी घोष की चुप्पी के बाद बगावत ने बढ़ाए सवाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उठे नए सियासी भूचाल के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। जादवपुर से सांसद और तृणमूल कांग्रेस की युवा राजनीति का प्रमुख चेहरा रहीं सयानी घोष अब उन सांसदों में गिनी जा रही हैं, जो पार्टी नेतृत्व से अलग राह पकड़ने की तैयारी में हैं। यह वही सयानी घोष हैं जिन्होंने वर्षों तक सार्वजनिक मंचों से ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की थी।
इतना ही नहीं पार्टी के प्रचार अभियान से लेकर संगठनात्मक जिम्मेदारियों तक, उन्हें टीएमसी की सबसे भरोसेमंद युवा नेताओं में गिना जाता रहा। यही वजह है कि बागी सांसदों की सूची में उनका नाम सामने आने के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
चुप्पी के बाद बदल गया राजनीतिक संदेश
दरअसल, पिछले कुछ दिनों से सयानी घोष की राजनीतिक सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे थे। उनकी चुप्पी पर लगातार अटकलें लग रही थीं और सोमवार को हुई बैठकों के बाद इन चर्चाओं ने और जोर पकड़ लिया। इस बीच 8 जून को किया गया उनका सोशल मीडिया पोस्ट भी चर्चा का विषय बना। जादवपुर स्टेशन रोड पर बुलडोजर कार्रवाई को लेकर उन्होंने राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने लिखा था, 'जादवपुर स्टेशन रोड पर बुलडोज़र की कार्रवाई दिल तोड़ने वाली और अन्यायपूर्ण है। पूरे राज्य में फेरीवालों को हटाने के अभियान ने हज़ारों लोगों को उनकी कमाई के जरिया से वंचित कर दिया है। बिना किसी पूर्व सूचना के हटाना अनुचित है और पुनर्वास की योजनाओं पर पूरी तरह चुप्पी, गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के प्रति मौजूदा सरकार के इरादों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।' इस पोस्ट को कई राजनीतिक पर्यवेक्षक पार्टी लाइन से अलग सार्वजनिक असहमति के तौर पर भी देख रहे हैं।
ममता की करीबी नेताओं में थी गिनती
सयानी घोष का राजनीतिक सफर टीएमसी में तेजी से आगे बढ़ा था। विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने ममता बनर्जी के लिए आक्रामक प्रचार अभियान चलाया था। उस दौर में उनका गाया गीत 'एकबार छेड़े दे नौका माझी, जाबो मदीना... आमार हृदय माझे काबा, नयाने मदीना...' भी काफी चर्चा में रहा था। चुनावी सभाओं में उनकी सक्रियता को देखते हुए कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनमें ममता बनर्जी की छवि देखनी शुरू कर दी थी। उस समय इस तुलना पर उन्होंने आपत्ति नहीं जताई थी।
उन्होंने कहा था, 'अगर मैं ममता बनर्जी की पार्टी में हूं, तो यह मुश्किल होगा कि मैं नरेंद्र मोदी जैसी दिखूं या सीपीएम नेता या सोनिया गांधी जैसी दिखूं। तो कोई दिक्कत नहीं, मुझे खुशी है कि जिस पार्टी में हूं, वह मुझे उनके जैसी दिखाती है। मैं उनकी तरह ही सरल रहना चाहती हूं। मैं उनकी तरह जमीन से जुड़ी रहना चाहती हूं।'
हार के बाद भी मिला था बड़ा भरोसा
एक चुनावी हार के बावजूद ममता बनर्जी ने सयानी घोष पर भरोसा बनाए रखा। पार्टी के संगठनात्मक पुनर्गठन के दौरान उन्हें तृणमूल युवा कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपी गई। सफेद साड़ी और हवाई चप्पल वाली उनकी सार्वजनिक छवि को भी कई बार ममता बनर्जी की शैली से जोड़कर देखा गया। संगठन में बढ़ती भूमिका ने यह संकेत दिया था कि पार्टी नेतृत्व उन्हें भविष्य के प्रमुख चेहरों में देख रहा है। यही कारण है कि अब उनके बागी खेमे के साथ जुड़ने की खबर को केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि नेतृत्व के प्रति भरोसे में आई दरार के रूप में देखा जा रहा है।
20 सांसदों का गुट क्यों बना चर्चा का विषय
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा में टीएमसी के 20 सांसदों का एक समूह पार्टी से अलग रुख अपनाने पर विचार कर रहा है। इस गुट का नाम सामने आने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल बढ़ी है। बताया जा रहा है कि यह समूह संसद में NDA को समर्थन देने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है। गुट की प्रमुख नेताओं में शामिल काकोली घोष ने यहां तक कहा है कि आगे चलकर बीजेपी में शामिल होने का फैसला भी लिया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
टीएमसी में लगातार बढ़ रही टूट
सिर्फ लोकसभा ही नहीं, राज्यसभा और विधानसभा स्तर पर भी तृणमूल कांग्रेस को झटके लगे हैं। हाल ही में राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी और सदन दोनों से इस्तीफा दे दिया। इससे पहले सुखेंदु शेखर भी पार्टी छोड़ चुके हैं। वहीं, लोकसभा में 28 में से 20 सांसदों और राज्यसभा में 13 में से 2 सांसदों के अलग होने की खबरों ने नेतृत्व की चुनौती बढ़ा दी है। इसी बीच बंगाल के 80 विधायकों में से 58 के अलग गुट बनाने और ऋतब्रत को नेता चुनने की खबरों ने पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष की चर्चा को और तेज कर दिया है।
दूसरी ओर राजनीतिक संकट के बीच संपर्क और संवाद की कवायद भी तेज दिखाई दे रही है। एक तरफ अभिषेक बनर्जी ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की है। वहीं, उससे पहले ममता बनर्जी की सोनिया गांधी से बैठक भी चर्चा का विषय बनी रही। सवाल अब केवल सयानी घोष के फैसले का नहीं है। नजर इस बात पर भी है कि क्या यह असंतोष कुछ नेताओं तक सीमित रहेगा या फिर तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकती है।