लोकसभा में गतिरोध के बीच कांग्रेस ने स्पीकर ओम बिर

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद से ही गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी। इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बीच तकरार देखने को मिली। राहुल गांधी और कांग्रेस का आरोप था कि लोकसभा अध्यक्ष सत्ता दल के दबाव में उन्हें बोलने नहीं दे रहे हैं, जबकि ओम बिरला का कहना था कि राहुल गांधी को विषय पर ही बोलना चाहिए।

इसी बात को लेकर तकरार बढ़ती गई, जिसके चलते राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की पुस्तक में सेना को लेकर लिखी बातों पर नहीं बोल सके। इन परिस्थितियों के बीच कांग्रेस ने अन्य विपक्षी दलों से बातचीत के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया।

कांग्रेस की ओर से मंगलवार को नियम 94(सी) के तहत लोकसभा महासचिव को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ने महासचिव को नोटिस की जांच कर उचित कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं।

अब चर्चा यह है कि कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस तो पेश कर दिया है, लेकिन क्या इस प्रस्ताव को पारित कराने लायक बहुमत उसके पास है। नोटिस पर कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, लेकिन इसमें तृणमूल कांग्रेस के सांसद शामिल नहीं हैं।

अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में कहा गया है कि लोकसभा अध्यक्ष खुलेआम एकतरफा तरीके से काम कर रहे हैं। कई मौकों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने नहीं दिया गया, जो संसद में उनका बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद नोटिस देने का निर्णय लिया था, जिसमें इंडिया गठबंधन के नेता शामिल हुए थे।

बैठक के बाद टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि उनकी ओर से कांग्रेस को सुझाव दिया गया था कि वह पहले अपनी चार मांगें लिखित रूप में अध्यक्ष को सौंपे और उस पर चर्चा के लिए तीन दिन का समय दिया जाए। यदि इसके बाद भी मांगें न मानी जाएं, तब अविश्वास प्रस्ताव लाया जाए। बताया जा रहा है कि कांग्रेस ने इस सुझाव से सहमति नहीं जताई, इसी वजह से टीएमसी ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए।

इससे पहले वर्ष 1954, 1966 और 1987 में भी लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किए गए थे। दिसंबर 1954 में गणेश वासुदेव मावलंकर, नवंबर 1966 में हुकम सिंह और अप्रैल 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन इनमें से किसी की भी कुर्सी नहीं गई।

विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है और विपक्ष की आवाज दबाई है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि स्पीकर साहब का खुद निरादर किया गया है। स्पीकर साहब पर दबाव है कि उन्हें खुद बयान देना पड़ रहा है, जो सही नहीं है। प्रियंका गांधी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री पर हमला करने का सवाल ही नहीं उठता। सरकार द्वारा अध्यक्ष पर दबाव डाला गया है, इसलिए उन्होंने हमले वाली बात कही।

दरअसल, संसद में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी को अपना भाषण पूरा करने नहीं दिया गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब पर बोलना चाहते थे। इसके बाद हुए हंगामे के चलते कांग्रेस के सात सांसदों समेत कुल आठ सांसदों को निलंबित कर दिया गया।

आम तौर पर अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार होने के 10 दिनों के भीतर उस पर चर्चा और मतदान कराया जाता है। जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होता है, तब वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते।

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव सदन में उपस्थित सदस्यों के बहुमत से पारित होता है, लेकिन वर्तमान में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के पास बहुमत के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। ऐसे में इतना जरूर संभव है कि राहुल गांधी धन्यवाद प्रस्ताव पर अपनी बात रख सकें, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने में कांग्रेस को सफलता मिलने की संभावना नहीं है।