लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए कितने सांसदों का समर

कुर्सी अडिग या संकट में? लोस अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का सच

स्पीकर को हटाने की असली प्रक्रिया: 118 सांसदों के हस्ताक्षर और 14 दिन की परीक्षा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद संसद के भीतर और बाहर यह बहस तेज हो गई है कि आखिर किसी लोकसभा स्पीकर को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है और क्या भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसा कभी सफलतापूर्वक हो पाया है। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने स्पीकर पर सदन की कार्यवाही में पक्षपात करने और विपक्ष की आवाज दबाने के आरोप लगाए हैं।

विपक्ष के अनुसार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को ोबोलने की अनुमति न दिए जाने और सांसदों के निलंबन की घटनाओं ने संसदीय मर्यादाओं पर सवाल खड़े किए हैं। इसी पृष्ठभूमि में स्पीकर के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंपा गया है, जिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।

क्या कहता है संविधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 में लोकसभा स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के पद से हटाए जाने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित है। अनुच्छेद 94 (सी) के अनुसार, लोकसभा अपने कुल तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित कर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को पद से हटा सकती है। हालांकि, यह प्रक्रिया सामान्य अविश्वास प्रस्ताव से कहीं अधिक सख्त और औपचारिक मानी जाती है।

50 सांसदों का समर्थन अनिवार्य

लोकसभा की कार्यप्रणाली के नियमों के अनुसार, स्पीकर को हटाने से संबंधित किसी भी प्रस्ताव पर तभी विचार किया जा सकता है, जब उसे कम से कम 50 लोकसभा सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो। यदि यह न्यूनतम संख्या पूरी नहीं होती, तो प्रस्ताव प्रारंभिक चरण में ही गिर जाता है. प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों को भी एक निर्धारित मर्यादा में रखना जरूरी होता है। नियमों के अनुसार, आरोप स्पष्ट, सटीक और तथ्यपरक होने चाहिए। इनमें तर्क, अनुमान, व्यंग्य या अपमानजनक भाषा की अनुमति नहीं होती।

बहस, मतदान और स्पीकर की भूमिका

जब प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है और कार्यसूची में शामिल कर लिया जाता है, तब उसकी चर्चा के लिए तारीख तय की जाती है, जो नोटिस की तिथि से कम से कम 14 दिन बाद होती है। आमतौर पर प्रस्ताव स्वीकार होने के 10 दिनों के भीतर बहस और मतदान की प्रक्रिया पूरी की जाती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि जब स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव सदन में विचाराधीन होता है, तो स्पीकर स्वयं सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता, भले ही वह सदन में उपस्थित हो। इस दौरान वे बहस में भाग ले सकते हैं और अपना पक्ष रख सकते हैं। स्पीकर को मतदान करने का अधिकार होता है, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत (कास्टिंग वोट) देने का अधिकार नहीं होता।

अंततः, प्रस्ताव के पारित होने के लिए लोकसभा की इफेक्टिव मेजॉरिटी, यानी खाली सीटों को छोड़कर सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत का समर्थन प्राप्त होना आवश्यक होता है। यदि प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो स्पीकर को तत्काल पद छोड़ना पड़ता है।

क्या कहता है संसदीय इतिहास?

भारतीय संसदीय इतिहास में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब तक कोई भी प्रस्ताव सफल नहीं हो पाया है। 1954 में पहली बार तत्कालीन स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, जिसे बहस के बाद सदन ने खारिज कर दिया। 1966 में स्पीकर हुकम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया, लेकिन इसे आवश्यक 50 सांसदों का समर्थन नहीं मिला और यह प्रारंभिक चरण में ही गिर गया। 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, जिसे विस्तृत बहस के बाद अस्वीकार कर दिया गया।

इसके अलावा, 1967 में डॉ. नीलम संजीव रेड्डी, 2001 में जी.एम.सी. बालयोगी, 2011 में मीरा कुमार और 2020 में ओम बिरला के खिलाफ भी नोटिस दिए जाने की चर्चाएं हुईं, लेकिन ये प्रस्ताव कभी निर्णायक चरण तक नहीं पहुंच सके।

क्यों लाया गया मौजूदा अविश्वास प्रस्ताव?

विपक्ष का आरोप है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी को अपना भाषण पूरा करने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद हुए हंगामे के बीच कांग्रेस के सात सांसदों समेत कुल आठ सांसदों को निलंबित कर दिया गया। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन बता रहा है।कांग्रेस नेताओं का कहना है कि स्पीकर पर सरकार का दबाव है और इसी कारण उन्हें बार-बार सफाई देनी पड़ रही है। वहीं, सरकार और सत्तापक्ष इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रहे हैं।

लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान द्वारा बेहद सोच-समझकर बनाई गई है, ताकि इस संवैधानिक पद की गरिमा बनी रहे। इतिहास गवाह है कि यह प्रक्रिया जितनी स्पष्ट है, उतनी ही कठिन भी। ऐसे में मौजूदा अविश्वास प्रस्ताव का परिणाम चाहे जो हो, यह तय है कि यह मामला भारतीय संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा।