CAPF Law Row: नए कानून के बाद IPS-DIG तैनाती पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे पूर्व अफसर
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) में नए कानून के लागू होते ही विवाद खड़ा हो गया है। डीआईजी स्तर पर आईपीएस अधिकारियों की तैनाती को लेकर कैडर अफसरों ने सवाल उठाए हैं और इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।
कानून लागू होते ही हुई नियुक्तियां
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ‘सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026’ लागू हुआ। इसके अगले ही दिन बीएसएफ और एसएसबी में आईपीएस अधिकारियों को डीआईजी पद पर प्रतिनियुक्ति के आधार पर तैनात कर दिया गया। इस तेज कार्रवाई ने कैडर अधिकारियों के बीच असंतोष बढ़ा दिया है।
क्यों उठे सवाल?
नए कानून में डीआईजी स्तर पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। पहले 20% पद आईपीएस के लिए आरक्षित थे, नए कानून में यह प्रावधान हटा दिया गया है इसके बावजूद नियुक्तियां जारी रहने से सवाल खड़े हुए हैं। कैडर अफसरों का कहना है कि इससे उनके प्रमोशन के अवसर प्रभावित होंगे।
प्रमोशन पर असर की आशंका
अधिकारियों का दावा है कि पहले से ही पदोन्नति में देरी हो रही है। 15 साल तक पहली पदोन्नति नहीं मिल रही है। कैडर रिव्यू लंबे समय से लंबित चल रहे हैं। कई अधिकारी कमांडेंट बनकर ही रिटायर होने की आशंका जता रहे हैं। इससे बलों के भीतर करियर ग्रोथ को लेकर चिंता बढ़ी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से टकराव?
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने CAPF अधिकारियों को ‘संगठित समूह A सेवा’ का दर्जा देने और आईपीएस प्रतिनियुक्ति कम करने की बात कही थी। कैडर अफसरों का आरोप है कि नया कानून इस फैसले के विपरीत है और बिना ठोस आधार के इसे लागू किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती की तैयारी
पूर्व कैडर अफसर इस कानून को संवैधानिक आधार पर चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि कानून न्यायालय के आदेश की भावना के खिलाफ है, इससे कैडर अधिकारियों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। अब यह मामला फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है, जहां अंतिम फैसला तय करेगा कि CAPF में प्रमोशन और तैनाती की व्यवस्था कैसी होगी।