थलापति विजय की आखिरी फिल्म होने के कारण दर्शकों को

एंटरटेनमेंट से विदाई वाली विजय की फिल्म 'जन नायकन' का जानें हाल, क्या थिएटर में देखने जाएं?

जन नायकन का फाइनल वर्डिक्ट

एक्टिंग करियर छोड़कर राजनीति में उतरे एक्टर थलापति विजय की फिल्म 'जन नायकन' को उनके फिल्मी करियर की विदाई के तौर पर देखा जा रहा था। यही वजह थी कि फिल्म  के रिलीज से पहले ही फैंस में जबरदस्त उत्साह था। लेकिन क्या ये फिल्म थिएटर में जाकर देखें की नहीं उससे पहले यह पूरी खबर पढ़ लें।

कई मुद्दों पर उलझी फिल्म की कहानी

एक तरफ जहां मूवी को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्साह था। वहीं, दूसरी तरफ फिल्म के निर्देशक एच विनोथ ने इसे एक बड़े सामाजिक  और राजनीतिक ड्रामा का रूप देने की भरसक प्रयास किया। लेकिन कहानी कई मुद्दों पर उलझती चली जाती है। इसका रिजल्ट यह निकला की फिल्म इमोशनल जर्नी बनने की जगह राजनीतिक भाषण जैसी महसूस होती है। एक कमजोरी फिल्म की 3 घंटे की लंबी अवधि है जो कमजोर स्क्रप्टिंग के चलते दर्शकों को निराश करती है।

कहानी में कई ट्विस्ट लेकिन फोकस कमजोर

फिल्म की कहानी एक्टर वेत्री के आस पास घूमती है। वह जेल में रहते हुए भी इतनी क्षमता रखता है कि बाहर की घटनाओं की दिशा बदल सके। वहीं, एक ईमानदार जेलर अपनी बेटी की जिम्मेदारी उस पर छोड़ देता है। और यहीं से भावनात्मक सफर शुरू होता है। दूसरी तरफ इंटरनेशनल क्रिमिनल जॉन हिमलर देश में हिंसा फैलाने की साजिश रचता है। कहानी में एक पत्रकार भी इस पूरे घटनाक्रम का अहम हिस्सा बनती है।

फिल्म शुरूआत में इमोशनल बेस तैयार करती है। लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है उसमें महिला सशक्तिकरण, आतंकवाद, करप्शन, सत्ता संघर्ष जैसे विषय एक साथ जुड़ जाते है। इसके चलते मूल कहानी अपनी धार खो देता है। इतना ही नहीं इंटरवल के बाद स्क्रिप्टिंग बिखर जाती है। इतना ही नहीं कई सीन तो ऐसे लगते हैं मानो विजय के किरदार को बड़ा दिखाने के लिए लिखे गए हैं।

एक्टिंग भी नहीं छुपा पाई कमजोर स्क्रिप्टिंग

एक्टर विजय अपने उसी अंदाज में दमदार स्क्रीन प्रेजेंस दिखाते हैं। उनका एक्शन, डायलॉग और एंट्री वाले सीन उनके फैंस को पसंद आ सकते हैं लेकिन कमजोर स्क्रिप्टिंग के अभाव में उनकी एक्टिंग भी फिल्म को नई ऊंचाई नहीं दिला पाती है। फिल्मों के सीन की बात करें तो ममिता बैजू इमोशनल सीन में सबसे प्रभावशाली नजर आती हैं। वहीं, बॉबी देओल का विलेन का किरदार जितना असरदार दिख सकता था। उतना प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाता। पूजा हेगड़े के हिस्से लिमिटेड स्क्रीन टाइम आता है। प्रकाश राज, नासर, प्रियामणि और गौतम वासुदेव मेनन जैसे अनुभवी कलाकारों को अपनी क्षमता के अनुरूप प्रभाव छोड़ने का पूरा स्क्रीन टाइम ही नहीं मिल पाया है।

दमदार संगीत है फिल्म की मजबूत कड़ी

अनुरुद्ध सविचंदर का संगती फिल्म को कई जगह ऊर्जा देता है। पहले से लोकप्रिय गाने कहानी की गति बनाए रखने में मदद करते हैं। वहीं, बैकग्राउंड स्कोर खासकर विजय की एंट्री और एक्शन सीन को ज्यादा प्रभावशाली बनाता है। तकनीकी रूप से संगीत फिल्म की सबसे मजबूत विशेषताओं में शामिल है।

सिनेमाघर में फिल्म देखने जाएं की नहीं

स्टार विजय की विदाई फिल्म जन नायकन प्रशंसकों को उनके फेवरेट एक्टर के कई दमदार मोमेंट जरूर देती है। लेकिन इसके अलावा एक पूरी फिल्म के तौर पर कोई खास असर नहीं छोड़ पाती है। फिल्म की बिखरी कहानी, लंबी अवधि और राजनीतिक संदेशों पर अधिक जोर इसे अपेक्षित स्तर पर पहुंचने देते हैं। यदि आप विजय के कट्टर प्रशंसक हैं तो फिल्म में इंटरटेनमेंट के कुछ पल मिल सकते हैं लेकिन मजबूत कहानी की उम्मीद लेकर जाने वाले दर्शकों को यह फिल्म संतुष्ट नहीं कर पाएगी।