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भारत क्यों छोड़ रहे हैं करोड़पति!

यह बात किसी के गले शायद ही उतरे कि एक ओर दुनिया का कोई भी देश कारोबारी सुगमता के साथ सुशासन के माध्यम से देश में समृद्धि दर बढ़ाने में लगा हो वहीं आर्थिक रूप से समृद्ध और शक्तिशाली लोग देश छोड़ने की होड़ में हों। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट यह है कि बीते साल 2017 में सात हजार करोड़पतियों ने भारत छोड़ दिया। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 16 प्रतिशत की बढ़त के साथ देखा जा सकता है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार जहां 2015 में 4 हजार भारतीय करोड़पतियों ने अपना स्थायी निवास बदल लिया, वहीं 2016 में यह आंकड़ा 6 हजार पहुंच गया, जबकि 2017 में एक हजार की वृद्धि के साथ यह बदस्तूर बना रहा। रिपोर्ट को देखते हुए सवाल यह उठ खड़ा होता है कि आखिर देश में आर्थिक ताकत जुटाने वाले करोड़पति अपने ही देश से मोह क्यों भंग कर लेते हैं। एक ओर प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इण्डिया से लेकर भारत की कई आर्थिक नीतियों को वैश्विक मंचों के माध्यम से बढ़ावा देने की फिराक में लगे रहते हैं और इस कोशिश में भी कि विदेशी निवेश बढ़े और देश के भीतर विनिर्माण को लेकर विदेशी कम्पनियां आकर्षित हों, वहीं दूसरी ओर धन के बाहुबली नागरिकता बदलने में लगे हुए हैं। पिछले 17 सालों में भारत से 75 हजार से अधिक करोड़पति कर सुरक्षा और बच्चों की शिक्षा जैसे कार्यों के चलते विदेश पलायन कर गये। हालांकि पलायन करने के मामले में चीन अव्वल दर्जे पर है।

न्यू वर्ल्ड वेल्थ की ग्लोबल रिपोर्ट भी यह मानती है कि 21वीं सदी की शुरूआत से दूसरे देश की नागरिकता के लिए आवेदन एवं स्थान परिवर्तन में जबरदस्त तेजी आयी है। हालांकि यह समस्या भारत की ही नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि चीन के इतने ही समय में लाख से अधिक करोड़पति पलायन कर चुके हैं। पलायन की इस विधा से दुनिया का लगभग हर महाद्वीप प्रभावित है फ्रांस, इटली, रूस, इण्डोनेशिया से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक में इसे देखा जा सकता है। करोड़पतियों के अपने देश से पलायन करने के प्रमुख कारणों को देखें तो कुछ के लिए देश के भीतर व्याप्त संकट तो कुछ के लिए सुरक्षा कारण जिम्मेदार रहे हैं। कईयों ने तो बच्चों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने को लेकर देश से विदाई ली है। भारत में पलायन के पीछे कर भी एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

रिपोर्ट को देखते हुए कई सवाल उभरने लाजिमी हैं। पहला यह कि जब किसी देश का करोड़पति दूसरे देश की नागरिकता लेता है तो क्या वह वहां की अर्थव्यवस्था को बैठे-बिठाये बढ़त नहीं दे देता है और इसकी कीमत उसका मूल देश चुकाता है। दूसरा प्रश्न यह कि क्या देश में वाकई में हालात ऐसे हैं कि पलायन उनके लिए अनिवार्य विकल्प बन जाता है और अपना ही देश रास नहीं आता। भारत के परिप्रेक्ष्य में अगर बात की जाय तो यह एक विकासशील अर्थव्यवस्था वाला देश है। सात दशकों की बड़ी कोशिश के बाद दुनिया के फलक पर ताकत के साथ उभरा है। इन्हीं सात दशकों में देश में 101 अरबपति के साथ हजारों-लाखों में करोड़पति भी पैदा हुए हैं जबकि इसका दूसरा अध्याय यह है कि यहीं पर हर चौथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है और इतने ही अशिक्षित भी। जनवरी 2018 की आॅक्सफेम की आयी रिपोर्ट भी यह बताती है कि यहां सम्पदा के संकेन्द्रीकरण में व्यापक असंतुलन आया है। गौरतलब है कि 73 प्रतिशत सम्पदा मात्र एक प्रतिशत लोगों के पास है जबकि बाकी बची सम्पदा 99 फीसदी के हिस्से में है। परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण यह इशारा करते हैं कि उत्थान और विकास की राह खोजते-खोजते भारत व्यापक आर्थिक असंतुलन वाला देश भी होता चला गया। 2016 में इसी रिपोर्ट के तहत यही आंकड़े इस ओर झुके थे कि 58 प्रतिशत सम्पदा केवल एक प्रतिशत के पास थी। करोड़पतियों का देश छोड़ने के कारण बेशक वाजिब हो सकते हैं परन्तु इनकी बढ़ती पलायन की दर देश के आर्थिक इरादों को न केवल कमजोर बल्कि दूसरों को उकसाने का काम कर सकती है।
भारत बदल चुका है, भारत आयें और निवेश करें इस बात को उद्घाटित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को विदेशी मंचों पर कई बार देखा गया है। सरकार की यह भी कोशिश रही है कि देश के विकास को लेकर न केवल निवेश को बढ़ाया जाय बल्कि मेक इन इण्डिया के माध्यम से विदेशियों का ध्यान व्यापक तरीके से आकर्षित किया जाय।

भारत सरकार ने रक्षा, खाद्य प्रसंस्करण समेत लगभग 25 क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 2014 में मेक इन इण्डिया अभियान की शुरूआत की और दुनिया के कोने-कोने में इसे पहुंचाने की कोशिश की। बावजूद इसके इस बात को पूरी गारण्टी के साथ नहीं कहा जा सकता कि क्षेत्र विशेष में मनचाही सफलता मिली है। सभी जानते हैं कि मेक इन इण्डिया की सफलता स्किल इण्डिया और स्टैण्डअप इण्डिया जैसे अभियानों की सफलता से जुड़ी है। ऐसे में मेक इन इण्डिया को प्रभावी बनाने के लिए कई जरूरी संदर्भों को अंगीकृत करना होगा। जब तक भारत अपनी कौशल क्षमता का विकास नहीं करता तब तक कई बातें कमतर रहेंगी और शायद निवेशक भी संदेह में रहेंगे। इतना ही नहीं कई ढांचागत कमजोरियों के कारण भी करोड़पतियों को यह लगता होगा कि विदेशों में अवसर बेहतर हैं। भारत के करोड़पति अधिकतर अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, आॅस्टेलिया और न्यूजीलैण्ड जा रहे हैं। चीन के करोड़पतियों का भी कमोबेश ठिकाना यही है। इन देशों में बढ़े आकर्षण से यह भी परिलक्षित होता है कि यहां सुगमता और अवसर के साथ-साथ कई और चीजें कहीं अधिक बेहतरी के साथ हैं। शायद ऐसा ही संदर्भ देश के भीतर हो तो पलायन रोका जा सकता है।

भारत उन पांच शीर्ष देशों में शामिल है जहां से बड़ी संख्या में अति धनाढ्य या करोड़पति लोग विदेशों में जाकर बस रहे हैं। वैश्विक स्तर पर रिपोर्ट यह दर्शाती है कि आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका में आकर्षण समान रूप से बना हुआ है। मौजूदा समय में आॅस्ट्रेलिया की जनसंख्या ढाई करोड़ से थोड़ा ही ज्यादा है जबकि अमेरिका में तीस करोड़ लोग रहते हैं। आॅस्ट्रेलिया का मध्य इलाका जो रेगिस्तान है को छोड़ दिया जाय तो उसका चौतरफा ढांचागत विकास करोड़पतियों के आकर्षण का प्रमुख कारण हो सकता है। इतना ही नहीं शिक्षा, चिकित्सा समेत कई बुनियादी सुविधायें यहां उपलब्ध हैं। अमेरिका में आकर्षण का प्रमुख कारण व्यवसाय में तेजी से बढ़त और हाईवोल्टेज शिक्षा व्यवस्था का होना है। हालांकि नस्लभेद जैसी समस्या से अमेरिका भी उबरा नहीं है और आॅस्ट्रेलिया में भी गैर आॅस्ट्रेलियाई को लेकर असंतोष उभरते रहे हैं। दोनों देशों ने बीते समय में वीजा संशोधन के माध्यम से एशियाई देशों पर प्रहार करने की कोशिश पहले कर चुके हैं। भारत के करोड़पति संयुक्त अरब अमीरात तथा ब्रिटेन को भी प्राथमिकता देते हैं जबकि चीन के करोड़पति हांगकांग और सिंगापुर की ओर भी रूख करता है। हालांकि पलायन दुनिया के प्रत्येक कोने से हो रहा है तो क्या इस आधार पर यह समझ लिया जाय कि यह कोई बड़ी बात नहीं। बड़ी बात इसलिए क्योंकि हमारे करोड़पति तेजी से पलायन कर रहे हैं जबकि दूसरे देशों के करोड़पति हमसे आकर्षित नहीं हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इसे लेकर देर तक असंवेदनशील रहना उचित नहीं है बल्कि इस बात का चिंतन होना चाहिए कि आखिर देश से पलायन कर चुके करोड़पति अपने ही देश भारत में पूंजी का निवेश क्यों नहीं करते, मेक इन इण्डिया से लेकर स्टार्टअप इण्डिया समेत विनिर्माण के क्षेत्र में आगे क्यों नहीं आते? क्या इससे विदेशी निवेश को लेकर समस्याएं कम नहीं होती। विदेशी कम्पनियों को आकर्षित करने और उन्हें देश में कारोबार के लिए उकसाने हेतु जहां ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है वहीं देश के करोड़पतियों को लुभाने में हम काफी हद तक नाकाम भी हो रहे हैं।

- सुशील कुमार सिंह

(लेखक सामयिक विषयों के वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

Updated : 2018-02-07T05:30:00+05:30
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