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क्या सिर्फ मारने वाले का ही मानवाधिकार है?

क्या सिर्फ मारने वाले का ही मानवाधिकार है?


अप्रैल महीने की 24 तारीख को सुकमा जिले के चिंतागुफा थाना क्षेत्र के अंतर्गत बुरकापाल में नक्सलियों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के दल पर हमला कर दिया था। इस हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हो गए थे। घटना से पूरे देश नक्सलियों के खिलाफ आवाज उठने लगी है चौतरफा मांग हो रही है कि माओवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और सरकार भी इस पर काफी गंभीर नजर आ रही है।

लेकिन वाम विचारधारा के तथाकथित मानवाधिकारवादी आम नागरिकों से लेकर सुरक्षा बलों के मानवाधिकारों के हनन पर तो खामोश हो जाते हैं, पर अपराधियों, नक्सलियों, पत्थरबाजों के मानवाधिकारों को लेकर बहुत जोर-शोर से आवाज बुलंद करते हैं। अरुंधति राय से लेकर आनंद पटवर्धन समेत दूसरे भांति-भांति के स्वघोषित बुद्धिजीवियों और स्वघोषित मानवाधिकार आंदोलनकारियों के लिए अफजल गुरु से लेकर अजमल कसाब के मानवाधिकार हो सकते हैं, पर नक्सलियों की गोलियों से छलनी सुरक्षाबलों के मानवाधिकारों का शायद इनके लिए कोई मतलब नहीं है। इस हमले पर नक्सलियों के खिलाफ इनके मुंह से एक शब्द भी नहीं सुना जा सकता। लेखक विवेक शुक्ला जी ने बहुत ही स्पष्ट विचार रखे हैं।

ऐसी स्थिति में मानवों के अधिकारों की बात करने बाले बुद्धिजीवी वर्ग जिन्हे अफजल गुरु व अजमल कसाब जैसे आतंकवादियों की फांसी पर तो मानव अधिकार की चिंता सताने लगती है पर शहीद सैनिकों के बलिदान पर मानवाधिकारवादियों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना बहुत सारे सवाल छोड़ जाता है।

अपने लेख में मानवाधिकारवादियों पर इसी प्रकार चिंता जाहिर की है उन्होंने कहा ''निश्चित रूप से भारत जैसे देश में हरेक नागरिक के मानवाधिकारों की रक्षा करना सरकार का दायित्व है। कहने की जरूरत नहीं है कि व्यक्ति चाहे अपराधी ही क्यों न हो, जीवित रहने का अधिकार उसे भी है, यही मानवाधिकारों का मूल सिद्धांत है। जो अधिकार अपराधियों के प्रति भी संवेदना दिखाने के हिमायती हों, वह आम नागरिकों के सम्मान और जीवन के तो रक्षक होंगे ही, पर कभी-कभी लगता है कि इस देश के ये कुछ पेशेवर मानवाधिकारों के रक्षक सिर्फ अपराधियों के प्रति ही संवेदनशील हैं, नागरिकों के प्रति नहीं। आतंकवादियों के हमलों में कई बार घायल हो चुके मनिंदर सिंह बिट्टा सही कहते हैं कि क्या सिर्फ मारने वाले का ही मानवाधिकार है? मरने वाले का कोई अधिकार नहीं है? याद नहीं आता कि कश्मीर से लेकर छतीसगढ़ में मारे गए सुरक्षा बलों के जवानों पर मानव अधिकारों के किसी पैरोकार ने संवेदना के दो शब्द भी बोल हों। देश ने पंजाब में पृथकतावादी आंदोलन के समय भी मानवाधिकारवादियों के दोहरे चेहरे को साफतौर पर देखा था। तब भी ये उग्रवादियों के मारे जाने पर तो खूब स्यापा करते थे, पर आम नागरिकों या पुलिसकर्मियों के मारे जाने पर शांत रहते थे।

छत्तीसगढ़ और बाकी सभी माओवादी प्रभावित राज्य सरकारों का नक्सल मोर्चे पर रुख लगभग साफ है। ये लड़ रही हैं नक्सलियों से। पर कुछ नेता ही गड़बड़ करने से पीछे नहीं रहते। आपको याद होगा कि पिछली यूपीए सरकार में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम की कठोर माओवादी नीति के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह ने ही अभियान चला रखा था। उन्होंने एक अखबार में लेख लिखकर चिदंबरम की माओवादियों से लड़ने की नीति को कोसा था। वैसे भी, नक्सलियों को पोषित करके आज इतना बड़ा बनाने में कांग्रेस का सर्वाधिक योगदान है। ''

देखा जा रहा है कि प्रारम्भ से ही केंद्र की भाजपा सरकार नक्सल समस्या को खत्म करने के लिए प्रयासरत रही है तथा वह नक्सली क्षेत्र में विकास करना चाहती है तथा नक्सलियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना चाहती है।

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Updated : 2017-05-09T05:30:00+05:30
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