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धन्य-धन्य भिण्ड की माटी और वीर सपूत

धन्य-धन्य भिण्ड की माटी और वीर सपूत
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भिण्ड। वेशक भिण्ड का गौरवशाली इतिहास कहीं लिपिबद्ध न मिले, लेकिन यदि आप यहां के लोगों व भिण्ड की माटी के इतिहास में गहराई तक झांकेगे तो जानेंगे कि भिण्ड इतना बुरा नहीं जितना हम खुद उसे बुराईयों से महिमा मण्डित करते हैं। कई बार हम किसी को नायक बनाने के लिए अपनी ही भिण्ड की माटी को खलनायक की भूमिका देने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। जब भी कोई कलमकार अपनी कलम के माध्यम से भिण्ड में हो रहे अच्छे कामों का बखान करता है तो वह उसकी शुरूआत भिण्ड की ऋणात्मक पृष्ठ भूमि से उसकी प्रस्तावना की रचना से करता है। अक्सर आपने पढ़ा होगा, सुना होगा, डकैतों के नाम से बदनाम, डकैतों की शरण स्थली रहा भिण्ड अब बदल रहा है। नकल के कलंक के टीके से अब भिण्ड उबर रहा है। यानि अब भिण्ड नकल के कलंक के टीके से मुक्त होने के साथ यहां के लोगों की मानसिकता में बदलाव आ रहा है। सबसे गंदा शहर अब स्वच्छता के अच्छे पायदान पर है।

यह सच है कि चंबल के बीहड़ों में बागी हुआ करते थे, लेकिन यदि आप पुराने बुजुर्गों से उनके चरित्र के बारे में चर्चा करेंगे तो पता चलेगा कि उन बागियों का भी ईमान धर्म हुआ करता था, बीहड़ में रहते हुए जो समाजसेवा व गरीबों के हित में कार्य करते थे। उन्होंने कभी किसी निर्दोष गरीब को नहीं सताया, बल्कि उनके बागी होने का भी एक निहित उद्देश्य हुआ करता था, जिसके पूरा होते ही सरकार के सामने कई बागियों ने आत्म समर्पण भी किया, यहां तक यदि वागी की दुश्मनी किसी व्यक्ति के साथ है तो उसने कभी उसके बाप, बेटे व बेटियों पर अन्याय, अत्याचार करना तो दूर कभी बुरी निगाह से देखा तक नहीं, उप्र में एक बागी का तो बकायदा मन्दिर बना हुआ है। जिसमें उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है। विधिवत आज भी प्रतिमा के समक्ष आरती होती है। भिण्ड के ही बागियों के बारे में जानें तो डकैत मानसिंह, लाखन, रूपा, माधौसिंह, मोहर सिंह व पानसिंह, मलखान जैसे डकैत हुए, जिनके चरित्र पर कोई भी दाग नहीं है। भिण्ड की माटी में वीरता की तासीर तो है, यही कारण है कि देश की सीमा पर यदि सबसे ज्यादा सेना के जवान तैनात हैं तो वह इस माटी के हैं। और सीमा पर पीठ पर नहीं, छाती पर गोली खाकर शहादत करने वालों की संख्या भी भिण्ड के बीर जवानों की ही है।
यदि बाकई में भिण्ड नकलची था तो अब तक इस माटी से जितने भी आईएएस, आईपीएस व अन्य बड़े-बड़े पदों पर लोग पहुंचे हैं। वर्तमान सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद बिना आरक्षण के भिण्ड के उत्कृष्ट आईएएस अधिकारी बने। इसी तरह सरदार सिंह डंगस, रुस्तम सिंह, आईपीएस श्याम शुक्ला ने भी भिण्ड से ही निकलकर यहां की माटी का नाम रोशन किया। उन्होंने यूपीएससी या अन्य कोई प्रतियोगिता कैसे उत्तीर्ण कर ली। हकीकत कुछ और ही है। जिसको हम कई बार चाटुकारिता के चक्कर में नजरंदाज कर जाते हैं। इस माटी ने मेधावी व ऊर्जावान लोगों को जना है। लेकिन कई युवा अवसर के अभाव में अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते हैं। यदि अवसर मिले तो भिण्ड का सपूत असंभव को संभव करके दिखा सकता है।

यदि राजनीतिक क्षेत्र के इतिहास में झांके तो भिण्ड से ताल्लुक रखने वाले राजनेता राष्ट्र में शिखर तक पहुंचे हैं। जो हमारे भिण्ड के गौरव हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का बचपन भिण्ड में ही बीता और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भिण्ड में हुई। यदि यहां उन्हें संस्कार खराब मिले होते तो क्या राजनीति के जिस मुकाम पर वे पहुंचे हैं क्या पहुंच पाते। यहीं भिण्ड की माटी में जन्मे प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी वर्तमान में हरियाणा के राज्यपाल हैं। यहां के लोगों में बाहर से आए हुए लोगों के प्रति कितनी श्रद्धा है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्व. हरिकिशनदास भूता हैं। वे मूलत: गुजरात के रहने वाले बताए जाते थे। उनका भिण्ड में एक मात्र परिवार था। भिण्ड ने स्व. हरिकिशन जाधव भूता जी को मिनिस्टर मेकर बना दिया। तो आज भिण्ड से वर्तमान विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह शहर के ऐतिहासिक गौरी सरोबर को पर्यटन का स्वरूप देने में अग्रणी भूमिका निर्वहन कर रहे हैं। सांस्कृतिक खेल गतिविधियों में भी भिण्ड हमेशा अग्रणी रहा है। यहां की वालीवाल टीम पूरे मप्र का नेतृत्व कर चुकी है। यहां के खिलाड़ी मप्र की टीम के कप्तान तक रहे, गणेशराम पाण्डेय उन्हीं खिलाड़ियोंं में से एक है। जिन पर हमें गर्व है। वर्तमान में इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता के प्रणेता बलवीर सिंह कुशवाह भी मूलत: भिण्ड के ही रहने वाले हैं। यही नहीं लोहपुरुष की हासिल करने वाले आॅलंपिक चैम्पियन विजय सिंह चौहान की शिक्षा भिण्ड में ही हुई और भारत को एशियाई ओलंपिक में 1973 में मेडल दिलाने वाले भिण्ड का ही यह नौजवान था।

भिण्ड शहर के ऐतिहासिक गौरी सरोबर में राष्ट्रीय स्तर की नौकायन कहें या डोगी दौड़ प्रतियोगिता उसका भव्य आयोजन चल रहा है। उसकी चर्चा करने के बजाय भिण्ड की गौरव गाथा से शायद आप उक्ता रहे हों, लेकिन मेरा इतना कुछ लिखने का उद्देश्य भिण्ड में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय स्तर की नौकायन प्रतियोगिता ही है।

शीर्षक में लिखा है कि धन्य-धन्य भिण्ड की माटी और वीर सपूत इससे हमारा आशय सिर्फ इतना है कि यहां के लोगों की हिम्मत की दाद तो आपको देनी ही होगी, महज एक डेढ़ माह की तैयारी में ही बिना किसी सरकारी अनुदान के इतना बड़ा राष्ट्रीय आयोजन करने की हिम्मत हमारे भिण्ड के युवाओं में ही है, वेशक आप उन्हें गंवार जाहिल, डकैत, नकलची या फिर जितनी बुरी संज्ञा देना चाहें, दें। लेकिन उनकी अच्छाई को नकारना भिण्ड के साथ अन्याय होगा।

इसी राष्ट्रीय प्रतियोगिता के आयोजन पर भारतीय खेल प्राधिकरण करोड़ों की योजना बजट खर्च करने के बावजूद भी इतनी बेहतरीन व्यवस्थाएं नहीं दे सकता था। समूचे देश की 22 प्रांतों की 26 टीमों के लगभग 800 प्रतियोगियों के आवास व भोजन की व्यवस्था तो पता ही नहीं चली कैसे हो गई, यहां के निजी विद्यालय के संचालक धन्य हैं। जिनके द्वारा प्रतियोगियों को आवास की नि:शुल्क व्यवस्था दी गई, धन्य हैं हमारे भिण्ड के होटल व लॉज मालिक, जिनके द्वारा कोच व प्रशिक्षकों के रुकने के लिए वातानुकूलित रूम तत्काल उपलब्ध करा दिए। धन्य है हमारे भिण्ड का जिला प्रशासन जो पूरी मुस्तैदी के साथ इस आयोजन को सफल बनाने में जुटा है। जहां कभी जिला स्तर की नौकायन या डोगी दौैड़ प्रतियोगिता न हुई हो उस जिले में बिना किसी रूकावट के राष्टÑीय स्तर का सफल आयोजन बिना किसी सरकारी अनुदान के करके दिखाना कोई मामूली बात नहीं है।

Updated : 2017-05-03T05:30:00+05:30
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