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त्वदीयं पाद पंकजम्, नमामि देवि नर्मदे

त्वदीयं पाद पंकजम्, नमामि देवि नर्मदे
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पूरा प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरा देश इस समय मां नर्मदा सेवा यात्रा प्रकल्प में सम्मिलित होकर अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा है। इस अनूठे आयोजन की परिकल्पना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की स्वयं की वैचारिक अवधारणा तो थी ही, इस प्रकल्प को मूर्तरूप देकर वे निष्ठावान नर्मदा प्रेमी ही नहीं वरन् मां नर्मदा के पुत्र के रूप में प्रस्थापित हो गए हैं। मां नर्मदा उनके रग-रग में बसी हुई है। अपने गृह ग्राम जैत के किनारे से कल-कल बहती मां नर्मदा में तैरते-उतराते ही वे बड़े हुए हैं और नर्मदा को वे मां के स्वरूप में ही देखते रहे हैं। बचपन में मातृ विहीन होने के कारण मां का कर्ज उतारने का एक स्थाई भाव भी है। इस अनूठे और अनोखे जन आंदोलन से वे मां नर्मदा को सातत्य, स्वच्छ, निर्मल और प्रवाहमयी बनाना चाहते हैं। जहां एक ओर ‘‘ नमामि गंगे’’ प्रकल्प केन्द्र सरकार के अधीन है और उस पर वर्षों से काम चल रहा है एवं पूरा का पूरा विभाग इसका दायित्व संभाले हुए हैं। करोड़ों रुपए खर्च भी हो चुके हैं लेकिन प्रगति उस स्तर की नहीं हुई। वहीं दूसरी ओर ‘‘नमामि देवि नर्मदे’’ कार्यक्रम का शुभारंभ कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने नमामि गंगे प्रकल्प के समक्ष अपनी कार्ययोजना का समर्पण कर समस्त भारत वर्ष में नई चेतना जाग्रत कर इस आंदोलन को जनान्दोलन के रूप में परिणित कर दिया है।

दुनिया की सुविख्यात हस्तियों को ‘‘नमामि देवी नर्मदे’’ के प्रकल्प से जोड़कर मुख्यमंत्री ने जो सुचिंतित मानसिकता का प्रस्तुतिकरण किया है वह अनुकरणीय है। मां नर्मदा यात्रा को आज लगभग 147 दिन पूर्ण हो चुके हैं। इस यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, श्री श्री रविशंकर महाराज, बाबा रामदेव, तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा सहित कई राजनेता व फिल्मी हस्तियां मां नर्मदा के तट पर पहुंच कर वहां अपनी आदरांजलि प्रस्तुत कर चुकी हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नर्मदा मैया की सेवा में पूरी तरह सन्नद्ध और समर्पित हैं। यही नहीं उन्होंने राज्य विधान सभा का एक दिनी विशेष सत्र बुलाकर मां नर्मदा को जीवित इंसान का दर्जा देने का काम भी किया है। वे अपनी धुन के पक्के हैं और उन्होंने अकेले ही उस काम का बीड़ा उठाया।

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग जुड़ते ही गए और कारवां बनता गया।

नर्मदा जी के अतिरिक्त भी प्रदेश में कई छोटी-बड़ी नदियां हैं। प्रदेश के ऐसे कई सौभाग्यशाली विधायक व मंत्री भी हैं जिनके क्षेत्र में नदियां हैं लेकिन आज न तो वे प्रवाहमान हैं और ना ही उनमें पानी का अविरल स्रोत है। वे अपने जीवन के लिए आशाभरी निगाहों से जन नायकों की ओर देख रही हैं। कई स्थानों पर तो नदी किनारे ही र्इंट भट्टे बन गए हैं। नदी का थोड़ा बहुत पानी जो जानवरों को पीने के लिए होता है उसका उपयोग भी र्इंटें बनाने में किया जा रहा है। क्या ये जन प्रतिनिधि मुख्यमंत्री के इस आंदोलन से प्रेरित होकर अपने क्षेत्र में बहने वाली नदियों या तालाबों के लिए समर्पण भाव प्रस्तुत नहीं कर सकते हैं। किंतु उनमें अदम्य इच्छा शक्ति का अभाव है।

ये जन प्रतिनिधि अपने मुख्यमंत्री के इस प्रकल्प से भी कुछ सीख ले सकते हैं जो दिन-रात इसी काम में लगे हुए हैं। वे दिल्ली हों या बम्बई। शाम को मां नर्मदा की आरती में जरूर शामिल होते रहे हैं। ग्वालियर चंबल क्षेत्र में सिंध, चंबल, क्वांरी, बेसली, आसन, सोन, महुअर आदि नदियां हैं जो अपने भागीरथ की प्रतीक्षा कर रही हैं। यद्यपि अभी हाल ही में भिण्ड विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह ने शहर के एक मात्र गौरी सरोवर में राष्टÑीय नौकायन प्रतियोगिता आयोजित कराकर चौबीस राज्यों के सात सौ खिलाड़ियों को बुलाकर गौरी सरोवर के साथ ही भिण्ड का नाम भी रोशन किया है। वहीं दतिया के प्रतिनिधि डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने दतिया के सरिता सरोवर का कायाकल्प करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। वे चाहें तो सिंध नदी को भी नया स्वरूप दे सकते हैं, क्योंकि वे दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी हैं और काम कराने की ललक उनके अंदर विद्यमान है। गोहद क्षेत्र के मंत्री लाल सिंह आर्य के क्षेत्र में बेसली बांध व बेसली नदी है वे भी बेसली के पुनरुर्द्धार में जुट सकते हैं। काम करना और कराना उन्हें आता है। प्रशासन के साथ-साथ जन-सहयोग भी लिया जा सकता है। बेसली नदी पर जगह-जगह स्टाप डेम भी बनाए जा सकते हैं। एक अकेले नाना जी देशमुख ने चित्रकूट में जो प्रकल्प तैयार किया है उसे देखने दुनिया भर के लोग आज भी आते हैं। आज गंगा जस की तस बनी हुई है और नर्मदा जी को शिवराज सिंह ने जन-जन से जोड़ दिया है। पुण्य सलिला नर्मदा आज मध्यप्रदेश का कंठ हार बन गई है। जन प्रतिनिधि भी अपने-अपने क्षेत्र की एक-एक नदी को गोद ले सकते हैं, लेकिन शिवराज जैसी क्रियाशीलता, आत्मिक प्रेम और नदी को मां मानने की इच्छा शक्ति और जुनून ही इस प्रकल्प की पहली शर्त है। हमें उम्मीद है कि हमारे जन प्रतिनिधि भी नर्मदा प्रकल्प से अपने-अपने क्षेत्र में जल एवं नदी संरक्षण के क्षेत्र में प्रवृत्त होंगे। यदि नदियों में जल नहीं होगा तो कल कहां होगा।



Updated : 2017-05-14T05:30:00+05:30
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