Top
Home > Archived > केडी हॉस्पिटल में बच्चों के इलाज की भी है समुचित व्यवस्था

केडी हॉस्पिटल में बच्चों के इलाज की भी है समुचित व्यवस्था

मथुरा। घर पर नवजात शिशु की किलकारी गूंजने से जो खुशी होती है, वह उसके बीमार होते ही चिन्ता में बदल जाती है। समझ में ही नहीं आता कि उसका उपचार किससे और कहां कराया जाए। यदि आपके नौनिहाल को किसी भी तरह की परेशानी है तो घबराने की जरूरत नहीं है।

चिकित्सा के क्षेत्र में नित नए प्रतिमान स्थापित कर रहे केडी मेडिकल कालेज-हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर में आधा दर्जन विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम 24 घण्टे आपके नौनिहाल के उपचार को तत्पर है। यहां की बेहतरीन सुविधाओं और कम से कम पैसे में उपचार से अब तक सैकड़ों बच्चे हृदय, फेफड़े और पेट सम्बन्धी बीमारी से लाभान्वित हो चुके हैं। फिलवक्त यहां की नवजात शिशु गहन इकाई में चार नौनिहालों का समुचित उपचार किया जा रहा है।

केडी मेडिकल कालेज-हास्पिटल एण्ड रिसर्च सेण्टर में शिशु रोग विशेषज्ञ एवं विभागाध्यक्ष कर्नल डा. अतुल चौबे, डा. सुनील अग्रवाल, डा. जेबी देशपाण्डेय, डा. कौशलेन्द्र कुमार, डा. कौशकी सिंह और डा. फैजान खान की टीम दिन-रात नौनिहालों पर सतत नजर रखती है। मथुरा में विशेषज्ञ शिशु शल्य चिकित्सकों का सर्वथा अभाव है जबकि केडी हास्पिटल में डा. श्याम बिहारी शर्मा शिशु शल्य चिकित्सक अब तक सैकड़ों दुर्लभ आपरेशन कर एक नजीर स्थापित कर चुके हैं।
डा. अतुल चौबे का कहना है कि केडी हास्पिटल में नवजात शिशु गहन इकाई, शिशु गहन इकाई और शिशु वार्ड के साथ ही उच्चस्तरीय जांच सुविधाएं होने से यहां जो भी बच्चा आता है, वह स्वस्थ होकर ही जाता है। डा. चौबे का कहना है कि बच्चों में कई बीमारियां कामन होती हैं तो कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जिनका यदि समय से उपचार न हो तो वे गम्भीर रूप ले लेती हैं। गैस्ट्रोइसोफेगल रिफलक्स बच्चे के पेट की बीमारी है।

यह नवजात में होने वाली एक कॉमन बीमारी है। बच्चा दूध पीने के बाद डकार लेता है और उसे उल्टी आ जाती है। इसके पीछे कई आम कारण हैं। दूध नहीं पचने या फिर मां का ऐसी चीजें खा लेना जिससे एसिडिटी बढ़ जाए। उल्टी भी बच्चों की एक आम बीमारी है। अगर यह कभी-कभी अपच या गैस्ट्रोइसोफेगल रिफलक्स से होती है तो घबराने की बात नहीं है। मगर जब यह बराबर हो, खासकर दूध पिलाने के बाद तो यह गम्भीर हो सकती है। डायरिया के साथ भी अगर उल्टी आए तो यह गम्भीर मामला है।

डा. चौबे का कहना है कि बुखार होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसमें शरीर संक्रमण से लड़ता है। सामान्य बुखार ज्यादा चिन्ताजनक नहीं है मगर वायरल इंफेक्शन या फिर निमोनिया और टाइफाइड जरूर गम्भीर है। अगर बच्चा एक दिन में तीन घण्टे से ज्यादा रोता है तो यह समझ लेना चाहिए कि उसे पेट या कान में दर्द हो रहा है या कुछ अन्य गड़बड़ी है। पीलिया नवजात बच्चों में एक कॉमन बीमारी हो गई है। मां के गर्भ से निकलते ही कई मामलों में नवजात को पीलिया की शिकायत देखी जा रही है। पीलिया में बच्चे की त्वचा, आंख और छाती का रंग पीला हो जाता है।


अक्सर जन्म के तुरंत बाद कई बच्चों का लीवर सही से काम नहीं करता है, ऐसे केस में पीलिया हो जाती है। जन्म के साथ ही जिस बच्चे को पीलिया की शिकायत होती है उसे मानसिक रोग, बहरापन समेत और भी कई बीमारियां होने की सम्भावना रहती है। वैसे तो बच्चों में हृदय रोग कम होता है लेकिन कई जन्मजात हृदय रोग के मामले सामने आए हैं। ऐसे बच्चों की सांस फूलती है, शरीर नीला पड़ जाता है, विकास अवरुद्ध होने के साथ ही शरीर गम्भीर रूप से कुपोषित हो जाता है। के.डी. हास्पिटल में बच्चों की हृदय और फेफड़े सम्बन्धी सभी बीमारियों की समुचित जांच और इलाज की व्यवस्था है।

Updated : 2017-02-21T05:30:00+05:30
Next Story
Share it
Top