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बहुत ही अच्छा उद्बोधन है, चलने दो...

बहुत ही अच्छा उद्बोधन है, चलने दो...

‘साहित्यिक पत्रिकाओं का योगदान’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

शब्द की शक्ति नहीं होती तो संसार अंधकारमय होता: परिहार


ग्वालियर, न.सं.। प्राचीन काल में जब साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएं नहीं थीं, तब संवाद होता था, जिसमें वटुक प्रश्न करते थे और विद्वतजन उत्तर देते थे, लेकिन आज हमारे परिवार व समाज में सुनने का धैर्य, साहित्य पढ़ने की जिज्ञासा, ज्ञान पाने की लालसा समाप्त हो रही है। यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। साहित्यिक पत्रिकाओं का राष्ट्र निर्माण और शब्द की साधना में बड़ी भूमिका है। यदि शब्द की शक्ति नहीं होती तो यह संसार अंधकारमय होता। साहित्य का एक-एक शब्द दीपक की तरह प्रकाश देने वाला है।

यह बात अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. श्रीराम परिहार ने रविवार को मध्य भारतीय हिन्दी साहित्य सभा एवं भाषा अध्ययन केन्द्र जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर के संयुक्त तत्वावधान में जीवाजी विवि के गालव सभागार में ‘साहित्यिक पत्रिकाओं का योगदान’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता की आसंदी से कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता महापौर विवेक शेजवलकर ने की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में नगरीय विकास मंत्री मायासिंह, विशिष्ट अतिथि के रूप में अ.भा. साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर, राष्ट्रीय महामंत्री ऋषि कुमार मिश्रा, भाषा अध्ययन केन्द्र जीवाजी विवि के निदेशक हेमंत शर्मा एवं मध्य भारतीय हिन्दी साहित्य सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजकिशोर वाजपेयी उपस्थित थे।

मुख्य वक्ता श्री परिहार ने कहा कि आदिकाल के वैदिक ग्रंथों, उपनिषदों से लेकर वर्तमान साहित्य ने समाज को सदैव ही प्रभावित किया है। स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्यकारों के ओजस्वी साहित्य ने बड़ी भूमिका निभाई और समाज को जगाने का काम किया। उन्होंने कहा कि हमारे देश की पहचान हमारी संस्कृति है और साहित्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं एक ऐसा रथ हैं, जो साहित्य को सुदूर अंचलों में सुधी पाठकों तक पहुंचाती हैं। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी साहित्य के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचती हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं में रचना छपने के बाद साहित्यकार के भीतर रचनात्मक विश्वास पैदा होता है। साहित्यिक पत्रिकाएं रचनाकार को बड़े साहित्यिक समाज के साथ उसके समग्र रचना कर्म से समाज को भी अवगत कराने का काम करती हैं। श्री परिहार ने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि वे साहित्य के माध्यम से राष्ट्र के नवनिर्माण में बड़ी भूमिका निभाती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों में साहित्यिक संस्कार और चरित्र निर्माण का काम भी करती हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को एक योग्य व संस्कारवान नागरिक बनाने में साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका स्तुत्य है।

मुख्य अतिथि नगरीय विकास मंत्री मायासिंह ने कहा कि पत्र-पत्रिकाएं हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। हमारे समकालीन साहित्यकारों ने समाज में राष्ट्रीयता का ज्वार पैदा किया, लेकिन आज युवाओं में साहित्य के प्रति आकर्षण कम हुआ है। यह हमारे सामने एक चुनौती है, लेकिन हम सभी मिलकर इस चुनौती का सामना करेंगे और हमारा विश्वास है कि 21वीं सदी भारत की होगी। महापौर विवेक शेजवलकर ने कहा कि व्यक्ति पर साहित्य का असर जल्दी होता है, लेकिन वर्तमान में केवल बाजार में बिकने के लिए जिस प्रकार का साहित्य आ रहा है, उस पर अंकुश लगना चाहिए और हम जिस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं, वैसे ही साहित्य की रचना होना चाहिए। इससे पहले अ.भा. साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री ऋषि कुमार मिश्रा ने विषय की प्रस्तावना रखी और बताया कि इस संगोष्ठी में देश भर के 17 भाषाओं के साहित्यकार शामिल हो रहे हैं। प्रारंभ में अतिथियों ने दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। सरस्वती वंदना कु. नेहा पाण्डे एवं कृति चतुर्वेदी ने प्रस्तुत की। तत्पश्चात स्वदेश के समूह संपादक अतुल तारे, साहित्य सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजकिशोर वाजपेयी, दिलीप मिश्रा, मंत्री अविनाश साहू, डॉ. सुखदेव माखीजा एवं भाषा अध्ययनशाला के निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने शॉल व श्रीफल भेंटकर अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. उर्मिला सिंह तोमर ने एवं आभार प्रदर्शन संजय जोशी ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

हम शब्दों के मामले में गरीब होते जा रहे हैं: पराड़कर

अ.भा. साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्रीधर पराड़कर ने कहा कि आज के वैज्ञानिक युग में हम शब्दों में सिमटते जा रहे हैं। शब्दों के मामले में हम निरंतर गरीब होते जा रहे हैं। इसका कारण अच्छी साहित्यिक पत्रिकाओं का अभाव है, जबकि शब्द भंडार को बढ़ाने में साहित्यिक पत्रिकाओं का बड़ा योगदान है। श्री पराड़कर ने कहा कि आज के वैज्ञानिक युग में साहित्यिक पत्रिकाओं की जरूरत इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि साहित्य पढ़ने के लिए साक्षर होना, सोचना, कल्पना की जरूरत होती है, लेकिन आज टेलीविजनों पर कथानकों का सीधा प्रसारण हो रहा है, इसलिए आज पढ़ने, सोचने, कल्पना की जरूरत ही नहीं रही है। यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि इससे मनुष्य की विचार व कल्पना शक्ति कमजोर और रचनात्मकता समाप्त हो रही है, जबकि साहित्य का निर्माण संवेदना, विचार व कल्पना शक्ति से ही होता है। उद्घाटन सत्र के बाद इसी विषय पर दो और सत्र संपन्न हुए। इसके बाद कवि गोष्ठी हुई, जिसमें मुख्य अतिथि ज्वाला प्रसाद कौशिक थे। अध्यक्षता राजकिशोर वाजपेयी ने की। इस अवसर पर स्थानीय एवं बाहर से आए साहित्यकारों ने अपनी काव्य रचनाएं पढ़ीं। संचालन सुधीर चतुर्वेदी ने किया।

बहुत ही अच्छा उद्बोधन है, चलने दो...

नगरीय विकास मंत्री मायासिंह अस्वस्थ थीं। बावजूद इसके वे राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहुंचीं और उन्होंने न केवल अपना उद्बोधन दिया बल्कि उद्घाटन सत्र में पूरे समय मौजूद रहीं। खास बात यह देखने को मिली कि कार्यक्रम में मुख्य वक्ता श्रीराम परिहार ने बहुत ही ओजस्वी और सभी के दिल को छू लेने वाला उद्बोधन दिया। उनका उद्बोधन थोड़ा लम्बा हो गया तो समय-सीमा का ध्यान रखते हुए मंच संचालक ने जब श्री परिहार को उद्बोधन समाप्त करने का इशारा किया तो नगरीय विकास मंत्री श्रीमती सिंह ने मंच संचालक को ऐसा करने से रोका और कहा कि उनका उद्बोधन बहुत ही अच्छा है, चलने दो।

आज होगा संगोष्ठी का समापन

जीवाजी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान सभागार में सोमवार 25 दिसम्बर सोमवार को सुबह नौ बजे से दो सत्र आयोजित होंगे, जबकि मध्यान्ह तीन बजे से संगोष्ठी का समापन होगा। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि म.प्र. साहित्य अकादमी के निदेशक प्रो. उमेश सिंह एवं मुख्य वक्ता गुजरात साहित्य परिक्रमा की संपादक श्रीमती क्रांति कनाटे होंगी। विशिष्ट अतिथि के रूप में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. रविन्द्र शुक्ल उपस्थित रहेंगे।

Updated : 2017-12-25T05:30:00+05:30
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