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आयोग की सख्ती ने छीनी चुनावी रौनक

♦मतदाताओं की खामोशी से प्रत्याशी विचलित

♦समर्थक कर रहे हैं अपने-अपने प्रत्याशी की जीत का दावा

मथुरा। नामांकन प्रक्रिया पूर्ण होने के उपरांत प्रत्याशियों के प्रचार की श्रंखला शुरु हो जाने के बाद भी चुनावी रौनक नजर नहीं आ रही है। मतदाता अभी खामोश हैं जबकि प्रत्याशी और उनके समर्थक अपने-अपने पक्ष में हवा होने का दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग की सख्ती ने कामगारों की कमाई भी प्रभावित कर दी है।

नाम वापिसी और चुनाव चिन्ह आवंटन के उपरांत विधानसभा चुनाव के समर में उतरे राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों ने प्रचार शुरु कर दिया है। वहीं निर्दलीय उम्मीवार प्रचार शुरु करने की तैयारी में हैं। मतदान को एक पखवाड़ा से भी कम समय बचा है लेकिन जनपद में कहीं भी आम जनता के बीच चुनावी सरगर्मी नजर नहीं आ रही है। इसका प्रमुख कारण चुनाव आयोग की बंदिश है। इस कारण अभी ना तो लाउडस्पीकर से प्रचार शुरु हुआ है और ना ही बैनर-पोस्टर, पंपलेट व बच्चों के बीच आकर्षण का केंद्र बनने वाले बिल्ले ही नजर नहीं आ रहे हैं।

चुनाव समर में उतरे योद्धा अपने समर्थकों के साथ क्षेत्रों में भ्रमण कर मतदाताओं से संपर्क कर अपने पक्ष में मतदान की अपील कर उन्हें लुभावने नारों व वायदों से बरगलाने का प्रयास अवश्य कर रहे हैं।

निर्वाचन आयोग की सख्ती के चलते कामगारों के साथ ही प्रिटिंग प्रेस स्वामी, कपड़ा व कागज व्यवसाईयों के धंधे पर भी मार हो रही है। अब उन्हें पहले जैसा चुनावी कार्य नहीं मिल रहा है।

चुनाव माहौल सिर्फ उम्मीदवारों के कार्यालय या फिर उन क्षेत्रों में थोड़ी बहुत देर को नजर आ रही है, जहां प्रत्याशी समर्थकों के साथ वोट मांगने के लिये जनसंपर्क को पहुंच रहे हैं।

प्रत्याशियों के चुनाव कार्यालय पर कार्यकर्ताओं के खाने व जलपान की गुपचुप व्यवस्था की जा रही है। प्रचार के दौरान भी उम्मीदवार अधिक वाहन व समर्थकों की भीड़ लेकर चलने से कतरा रहे हैं। यह भी आयोग की सख्ती का ही परिणाम है क्योंकि पर्यवेक्षकों ने प्रत्याशियों की निगरानी के माकूल इंतजाम कर दिये हैं। ऐसे में उन्हें खर्चे सीमित रखने के लिये तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पड़ रहे हैं।

आम मतदाता का चुनाव के प्रति कोई विशेष रूझान नजर नहीं आ रहा है। वे अभी अपने-अपने काम में व्यस्त हैं और प्रत्याशियों को तौल रहे हैं। मतदाताओं की चुप्पी के बावजूद प्रत्याशी और उनके समर्थक अपने-अपने पक्ष में हवा होने का ही दावा नहीं कर रहे हैं बल्कि सभी के पास अपनी-अपनी जीत के आंकड़े हैं। जिन्हें वे चौराहे-तिराहे, चाय खान-पान की दुकानों व जलपान गृहों में चुनावी चर्चा के दौरान पेश करने से नहीं चूक रहे हैं।

Updated : 2017-01-31T05:30:00+05:30
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