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सामाजिक परिवर्तन से संभव है आर्थिक उन्नति : विमल

अंबेडकर के निधन के बाद अनुयायियों ने स्वार्थ सिद्ध किये मिशन से

उरई (जालौन)। इतिहास गवाह है जिन लोगों ने गलत चीजों का विरोध किया जिन्होने समाज में व्याप्त सड़ी- गली व्यवस्था को बदलने के लिए संघर्ष किया उनका हमेशा सम्मान होता आया है और आज भी हो रहा है। क्योंकि बिना सामाजिक परिवर्तन के आर्थिक उन्नति संभव नही है। इसलिए हमें आर्थिक उन्नति के लिए समाज में व्याप्त कुरीतियों पर चोट करनी होगी। यह बात आज यहां जालौन रोड बाईपास के समीप पंचशील नगर उरई में नवनिर्माण प्रबुद्ध भारत धम्म मिशन द्वारा आयोजित छह दिवसीय प्रबुद्ध भारत कांफें्रस एवं धम्मदीक्षा समारोह के मुख्य वक्ता ने कही।
सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक मुक्ति विषय पर अपने सम्बोधन मेें डा. एमएस विमल ने बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर के निधन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों और उनके अनुयाईयों के द्वारा उनके मिशन को केवल अपने स्वार्थ भर के लिए अपनाने और उनकी मूल मिशन सामाजिक परिवर्तन को भूलने पर आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि हमारा समाज कुरीतियों के जनजाल में जकड़ा हुआ था जिससे मुक्ति दिलाने के लिए बड़े-बड़े महापुरूष पैदा हुए और उन्होने इन सामाजिक विषगतियों के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया। जिन-जिन लोगों ने सामाजिक विषमता के खिलाफ लड़ाई लड़ी उन्हे हमेशा सम्मान मिला। बाबा साहब डा. भीमराव ने दबे कुचले समाज को उठाने के लिए संघर्ष किया उन्हे 1990 में भारत सरकार ने उन्हे भारत रत्न से विभूषित किया। पाखंडवाद के लिए संघर्ष करने वाले कबीर हो या फिर समाज की सड़ी- गली व्यवस्था के खिलाफ संत शिरोमणि रविदास हो फिर दक्षिण में पाखंडवाद के नंगनाच की धज्जिया उड़ाने वाले ईरामास्वामी पेरियार हो भारत सरकार के द्वारा उनके नाम पर डाक टिकट जारी किए गए। यही नही धर्म चाहे जो रहा हो कोई भी धर्म पाखंडवाद या हिंसा को बढावा नही देता है लेकिन जो सड़ी- गली सामाजिक व्यवस्था है उसके खिलाफ हमेशा महापुरूषों के द्वारा संघर्ष होता चला आया है। आज कबीर से लेकर कांशीराम तक सभी ने गलत चीजो को ठोकर मारी है। बाबा साहब अम्बेडकर बौद्ध धर्म के सच्चे रास्ते पर चलकर अपने रास्ते को सफल बना पाये। उन्होंने कहा कि जब बाबा साहब के नजदीकी नानक चंद्र रत्तु ने आखिरी समय में उनका संदेश जानना चाहा तो उन्होने कहा कि मेरे जीवन के संघर्ष का एक-एक दिन ही हमारा संदेश है।उन्होंने अपने लोगों से कहा कि बुद्धिमत्ता से कभी पीछे ना हटे आराम तलबी की जिंदगी न जिए हमारा मकसद सामाजिक परिवर्तन है जिसे मै पूरा नही कर पाया लेकिन यह तय है जब सामाजि परिवर्तन होना तभी आर्थिक मुक्ति मिलेगी। डा. विमल ने कहा कि बाबा साहब के निधन के साथ उनके अनुयाइयों की संख्या में भारी इजाफा हुआ लेागों ने बाबा साहब के दिए गए आरक्षण लाभ उठाकर शिक्षा व नौकरी हासिल की लेकिन सामाजिक परिवर्तन की दिशा में किसी ने काम नही किया।
आज भी लोग पुराने रीति रिवाज अपनाये हुए है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाबा साहब आरक्षण नही भागीदारी के पक्षधर थे इसलिए वह गांधी जी के पूना पैक्ट के लिए तैयार नही थे। उन्होंने कहा कि हमे आरक्षण के पीछे नही भागना चाहिए क्योंकि यह आरक्षण नही पूना पैक्ट का फिक्सेसन था। आज लोग अपना स्वार्थ देख रहे है लेकिन बाबा साहब के कारवां को आगे बढाने में मान्यवर कांशीराम ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। अगर मान्यवर कांशीराम का उदय ना होता और उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की अलख न जगाई होती थी तो जो स्वतंत्रता मिली हुई है वह कभी नही मिल पाई हम अपनी बात कभी नही कह पाते। उन्होंने महिलाओं के साज श्रंगार को मानसिक एवं सामाजिक गुलामी बताते हुए कहा कि महिलाओं को इस तरह की तमाम कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष करना होगा और जिस दिन महिलाओं सामाजिक कुरीतियों तिलांजलि दे देगी उस दिन ना सिर्फ देश में सामाजिक परिवर्तन की लहर दौड जायेगी बल्कि करोड़ों लोगों को आर्थिक मुक्ति भी मिल जायेगी। उन्होंने कहा कि आज भी समय है कि हम बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर एवं मान्यवर कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष को आगे बढाये तभी सामाजिक परिवर्तन को बल मिलेेगा। इसके पूर्व डा. रघुनाथ पाल ने भगवान बुद्ध के सामाजिक परिवर्तन पर विचार रखे कि किस तरह से उन्होंने पाखंडवाद के खिलाफ लोगों को खड़ा किया।
जयभीम का नारा स्वामी अछूतानंद ने दिया था
उरई। छतरपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. एमएस विमल ने बताया कि ऊमरी निवासी स्वामी अछूतानंद ने सबसे पहले जयभीम का नारा दिया था यह वहीं स्वामी अछूतानंद थे जिन्होने साईमन कमीशन का ऐसे समय स्वागत किया था जब पूरा देश उसका विरोध कर रहा था क्योंकि गांधी जी ने अपने को दलितों का रहनुमा घोषित करते हुए गुजरात के दलितों से इंग्लैंड को तार भिजवाये थे जबाव में स्वामी अछूतानंद ने देश भर के लोगों को जागरूक कर साईमन कमीशन को भारत भेजने के लिए तार भेजकर इंग्लैण्ड पर दबाव बनाया था क्योकि गांधी जी कभी चाहते थे कि भारत के दलितों में सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद जगे और उन्हे आर्थिक गुलामी से मुक्ति मिल सके।

Updated : 2016-02-16T05:30:00+05:30
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