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अरुण यादव विरोधी हुए लामबंद

भोपाल। रविवार को भोपाल के जंबूरी मैदान में भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में एकजुटता, पारदर्शिता व विकास की रणनीति को अंजाम देने के लिए संकल्प ले रही थी तो विरोधी पक्ष कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह को आलाकमान के समक्ष उजागर करने के लिए तमाम दलीलें पेश कर रही थी। जिस तरह कांग्रेसियों का जमावड़ा पिछले दो दिन दिल्ली में लगा उससे लग रहा है कि शहडोल और नेपानगर उपचुनाव की हार अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव के लिए खतरे की घंटी बन गई है। कल सज्जन सिंह वर्मा का पारा सिर से ऊपर था तो शनिवार और रविवार को एक और असंतुष्ट नेता गोविंद गोयल ने अपना मोर्चा खोल दिया है। वे श्री यादव के कार्यकाल का लेखा-जोखा लेकर नई दिल्ली पहुंच गए। जहां मध्यप्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया से मिलकर आगे की रणनीति बना रहे है।

श्री गोयल यह तो नहीं कह रहे है कि हार का प्रमुख कारण कांग्रेसियों की गुटबाजी ही उसे ले डूबी बल्कि हार का ठीकरा अरुण यादव पर फोड़ दे रहे हैं। जिस तरह सत्ता वापसी की दलील गोयल दे रहे है उसके अनुसार क्या प्रदेश नेतृत्व बदलते ही सब ठीक हो जाएगा? जबकि खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह कह चुके है कि प्रदेश में कांग्रेस कमजोर नहीं है कमजोर कांग्रेसी हो गए हैं। गोयल दिल्लीे जाकर खम ठोक रहे है कि अगर पार्टी नेतृत्व उन्हें 100 दिन के लिए प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दे तो वे पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी पर विराम लगाकर पार्टी को 2018 में सत्ता में ले आएंगे।

अल्पसंख्यक नेता अरुण यादव से नाराज
बताया जा रहा है कि श्री यादव को घेरने के लिए गोविंद गोयल ने बड़ी रणनीति बनाई है । इसके लिए उन्होंने पार्टी के अल्पसंख्यक नेता सईद अहमद सुरूर को भी साध लिया है। जो बीते दो दिनों से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं ।
उन्होंने पार्टी आलाकमान को सभी दस्ताबेज सौंप दिए है। इसी तरह पार्टी के पूर्व सचिव अकबर बेग भी मौजूदा नेतृत्व से खिन्न बताए जा रहे हैं। आलाकमान को बताया गया है कि पार्टी का प्रदेश कार्यालय कारपोरेट कार्यालय की तरह चल रहा है जो सुबह साढ़े दस बजे खुलता है और शाम 5 बजे बंद हो जाता है। जहां राजनीतिक गतिविधियां लगभग शून्य हो गई है।

नेतृत्वविहीन है भोपाल इकाई
शिकायत में कहा गया है कि सबसे महत्वपूर्ण इकाई भोपाल बिना नेतृत्व के चल रहा है जिससे हर आंदोलन फीका पड़ जाता है। हाल के दिनों में नोटबंदी को लेकर कांग्रेस की रैली इसी के चलते विफल हो गई थी। जिला अध्यक्ष का पद बीते डेढ़ साल से प्रभार पर चल रहा है। नया जिला अध्यक्ष नहीं बनाया गया है। अल्पसंख्यक समुदाय को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है जो पार्टी का बड़ा वोट है। यदि पार्टी को 2018 के चुनाव में दोबारा सत्ता में काबिज होना था।

Updated : 2016-12-05T05:30:00+05:30
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