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हाथ से न निकल जाए एसपी कार्यालय की जमीन

ग्वालियर। एक और बेशकीमती शासकीय भूमि शासन के हाथ से निकल सकती है। इस जमीन की कहानी भी लोहा मंडी की जमीन के प्रकरण से मिलती-जुलती है। हम बात कर रहे हैं सिटी सेन्टर स्थित उस जमीन की, जिस पर पुलिस अधीक्षक कार्यालय बना हुआ है।
जानकारी के अनुसार म.प्र. शासन ने 1990 में महलगांव स्थित लगभग 13 बीघा भूमि पुलिस विभाग को आवंटित की थी। वहीं पूरन व श्रीलाल ने उक्त जमीन के संबंध में दावा पेश किया, जिसे न्यायालय ने 1992 में स्वीकार कर लिया। तब से लेकर आज तक पुलिस विभाग इस जमीन के स्वामित्व को लेकर संघर्षरत है।
यह बात और है कि जमीन के स्वामित्व का विवाद न्यायालय में लम्बित होने के बाद भी उस भूमि पर पुलिस अधीक्षक कार्यालय का निर्माण कराया गया। विदित रहे कि 18 अगस्त 2001 को तत्कालीन गृह मंत्री महेन्द्र बौद्ध ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय का उद्घाटन किया था।
क्या है मामला
पूरन व श्रीलाल ने व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 के समक्ष ग्राम महलगांव की सर्वे क्रमांक 699 की 13 बीघा 17 बिस्वा भूमि का दावा प्रस्तुत किया, जिसमें यह कहा गया कि उन्हें चालीस साल पहले जमीन पट्टे पर दी गई थी। 1992 में दावा स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद दावा कर्ताओं ने व्यवहार न्यायालय में स्वयं का नाम राजस्व अभिलेख में चढ़ाने के लिए आवेदन दिया। इस पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ग्वालियर ने आपत्ति जताते हुए एक आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें यह कहा गया कि म.प्र. शासन ने उक्त भूमि 19 फरवरी 1990 को उन्हें आवंटित कर दी है। ऐसे में न्यायालय को उनका पक्ष भी सुनना चाहिए था।
जमीन बेशकीमती लेकिन मालिक का अता-पता नहीं
जमीन हाथ से न चली जाए। इसके लिए पुलिस अधीक्षक ने 28 फरवरी 2005 को व्यवहार न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया। जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने पूरन व श्रीलाल को नोटिस भेजे। इसमें केवल पूरन ने नोटिस का जवाब दिया, जबकि श्रीलाल ने न तो नोटिस का जवाब दिया और न ही वो कभी न्यायालय में उपस्थित हुआ। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतनी बेशकीमती जमीन का मालिक नोटिस का जवाब क्यों नहीं दे रहा? ऐसा तो नहीं कि शासन की भूमि को खुर्द-बुर्द कर करोड़ों के वारे न्यारे करने के उद्देश्य से किसी काल्पनिक व्यक्ति के नाम से दावा प्रस्तुत कराया गया?
दो दशक बाद की अपील
1992 में न्यायालय ने पूरन व श्रीलाल के दावे को स्वीकार किया था। इस आदेश के विरुद्ध लगभग बीस साल बाद पुलिस अधीक्षक ने अपील प्रस्तुत की। चूंकि अपील करने में दो दशक का विलम्ब है। ऐसे में अभी शासकीय अभिभाषक को न्यायालय को यह बताना है कि अपील प्रस्तुत करने में उसे इतना समय क्यों लगा? पर्याप्त कारण नहीं बताने पर अपील खारिज भी हो सकती है।
ऐसा ही हुआ था लोहा मंडी मामले में
गिरवर सिंह ने तृतीय अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 में आवेदन करते हुए कहा था कि वह संवत 2009 से ग्राम चिरवई की सर्वे क्रमांक 94 व 140 की कुल 14 बीघा 15 बिस्वा भूमि पर काबिज है, इसलिए उसे भूमि स्वामी घोषित किया जाए। 25 फरवरी 2010 को गिरवर सिंह के पक्ष में निर्णय हुआ, जबकि शासन ने 2007 में यह भूमि ग्वालियर विकास प्राधिकरण को आवंटित की थी। इसके एवज में प्राधिकरण ने उसे लगभग 14 लाख 52 हजार रुपए का भुगतान भी किया था, लेकिन सुनवाई के दौरान इस तथ्य को न्यायालय के सामने ही नहीं रखा गया।

Updated : 2016-01-04T05:30:00+05:30
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