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सामाजिक एकता के बिना राष्ट्र की प्रगति अर्थहीन

ग्वालियर। मुस्लिम, सिख, ईसाई समाजों में जातिगत बंटवारा तो है, लेकिन वहां भेदभाव नहीं है। इन धर्मों या पंथों में किसी भी व्यक्ति पर समस्या आने पर सभी में एकजुटता दिखाई देती है। यह सभी एक जैविक तंतु से जुड़े हैं, जबकि हिन्दू समाज में जातिगत आधार पर बंटवारा है, जो सामाजिक समरसता में सबसे बड़ी बाधा है। इसके बिना राष्ट्र कल्याण और भारत को विश्व गुरु बनाने की कल्पना असंभव है। सामाजिक समरसता हर काल में महत्वपूर्ण रही है और इस काल में भी है। समाज में एकता नहीं है तो समाज और राष्ट्र की प्रगति का कोई मतलब नहीं है। ऐसी प्रगति अर्थहीन है।
यह बात ऑर्गनाइजर एवं पाञ्चजन्य के समूह सम्पादक जगदीश जी उपासने ने रविवार को कही। श्री उपासने मामा माणिकचन्द वाजपेयी स्मृति न्यास ग्वालियर द्वारा आयोजित पत्र लेखक सम्मान एवं मीडिया विमर्श कार्यक्रम को मुख्य वक्ता की आसंदी से संबोधित कर रहे थे। राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक सामाजिक समरसता की दिशा में स्वामी विवेकानंद और बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए श्री उपासने ने जातिगत भेदभाव पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि समरसता शब्द मुस्लिम और ईसाई से जुड़ा होना चाहिए, जबकि हिन्दू समाज में यह समाज से जुड़ा हुआ मुद्दा है। हिन्दू एक होकर नहीं सोचते। इसी कारण हिन्दू समाज का इतिहास पराजय से भरा पड़ा है। इसी कारण भारत में बार-बार मुगलों और इस्लाम का साम्राज्य स्थापित हुआ। हम विविधता में एकता की बात तो करते हैं, लेकिन सही मायने में क्या हम एकजुट हैं।
उन्होंने कहा कि संघ ने छुआछूत व जातिवाद को तोडऩे के लिए बिना कुछ बोले कार्य किया और इसे समाप्त किया। यही कारण है कि संघ की एक आवाज पर पूरा समाज एकजुट हो जाता है। सामाजिक समरसता में आर्य समाज के अतुलनीय योगदान का भी उन्होंने उल्लेख किया। साथ ही कहा कि जातिगत ही नहीं, कार्य के आधार पर भी वर्ण व्यवस्था अस्वीकार होनी चाहिए। सहिष्णुता के नाम पर हम उससे बढ़कर स्वीकार्यता की बात करते हैं, लेकिन क्या राष्ट्र के हमलावरों को भी स्वीकारना समाज की कमजोरी है। उन्होंने कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाना है तो सामाजिक समरसता लानी ही होगी। सामाजिक समरसता में समाचार माध्यमों के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया में दलित समाज के पत्रकारों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि उस समाज की परिस्थितियों से वह भली भांति परिचित होते हैं। इस क्षेत्र में कार्यरत मीडिया कर्मियों का प्रशिक्षण जरूरी है। आज इंटरनेट सबसे सक्षम मीडिया है। इसका सामाजिक समरसता में ठीक उपयोग किस तरह कर सकते हैं। इस बारे में सोचना चाहिए। मामा माणिकचन्द वाजपेयी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे श्रेष्ठ विचारों वाले पत्रकार कम ही मिलते हैं, लेकिन ऐसे सरल, सहज व्यक्तित्व वाले पत्रकार और भी कम मिलते हैं। उनकी लेखनी का समाज पर असर होता था।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भाण्डेर विधायक घनश्याम पिरौनिया ने मामा माणिकचन्द वाजपेयी के साथ अपने स्मरणों को याद करते हुए बताया कि उन्होंने जातिवाद या छुआछूत को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता की दिशा में संघ कहकर नहीं, करके दिखाता है, जबकि कुछ राजनेता वोट बैंक के लालच में जातिवाद और छुआछूत को जीवंत रखकर अपनी दुकानें चला रहे हैं। कार्यक्रम में मामा माणिकचन्द वाजपेयी स्मृति न्यास के अध्यक्ष एवं स्वदेश के संचालक दीपक सचेती भी मंचासीन रहे। कार्यक्रम के आरंभ में न्यास के सचिव एवं स्वदेश के समूह सम्पादक अतुल तारे ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए कहा कि मामाजी आदर्श स्वयंसेवक थे। उन्हें जो भूमिकाएं मिलीं, उन्हें प्रमाणिकता के साथ निर्वहन किया। उन्होंने आज के कई वरिष्ठ पत्रकारों को कलम पकडऩा सिखाया, लेकिन उन्हें इस बात का कभी गुमान नहीं रहा। न्यास का प्रयास रहता है कि मामा जी की याद में पत्र लेखकों को सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाए। कार्यक्रम का संचालन स्वदेश के कार्यकारी सम्पादक प्रवीण दुबे ने किया।
इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती एवं मामाजी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर किया। प्यूश ताम्बे ने राष्ट्र गीत वंदेमातरम की प्रस्तुति दी। अतिथियों का पुष्प एवं श्रीफल से स्वागत किया गया। अंत में सभी का आभार प्रदर्शन प्रवीण प्रजापति ने किया।
पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित
कार्यक्रम से पूर्व पत्र लेखकों की तात्कालिक पत्र लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता में कुल 22 पत्र लेखकों ने भाग लिया। कार्यक्रम में श्रेष्ठ पत्र लेखकों एवं तात्कालिक पत्र लेखकों को पुरस्कृत भी किया गया।
यह हुए पुरस्कृत
श्रेष्ठ पत्र लेखकों में हरिओम जोशी प्रथम, मुकेश घनघोरिया द्वितीय एवं भंवर सिंह नरवरिया तृतीय स्थान पर रहे। इसी प्रकार तात्कालिक पत्र लेखन प्रतियोगिता में विशम्भर गुरु प्रथम, नरेन्द्र कुमार मारकन द्वितीय एवं कु. प्रियंका प्रजापति तीसरे स्थान पर रहीं। इसके अलावा 15 तात्कालिक पत्र लेखकों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए।
यह रहे निर्णायक
श्रेष्ठ पत्र लेखकों के निर्णायक मंडल में श्रीमती सत्या शुक्ला, संजय जोशी, वरिष्ठ पत्रकार हरीश उपाध्याय, राजदेव पाण्डेय और प्रवीण चतुर्वेदी शामिल रहे। अतिथियों ने निर्णायकों को भी मंच से सम्मानित किया।

Updated : 2016-01-18T05:30:00+05:30
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