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हिन्दी आंदोलन के महायोद्धा काशीनाथ जोशी

हिन्दी आंदोलन के महायोद्धा काशीनाथ जोशी

प्रवीण दुबे


राष्ट्रभाषा हिन्दी के उन्नयन तथा प्रचार-प्रसार के लिए श्री काशीनाथ जोशी का जीवन देशवासियों के लिए बेहद प्रेरणादायी है। उन्होंने हिन्दी के उपयोग हेतु न केवल जीवनभर आग्रह किया बल्कि अंधकार से भरे वातावरण में एक नई रोशनी प्रदान की। श्री जोशी ने अंग्रेजी से प्रेम और हिन्दी को दोयम् दर्जे की भाषा मानने वालों के खिलाफ अधिकार की लड़ाई लड़ी और हिन्दी की सेवा में सर्वस्व समर्पण कर दिया। श्री जोशी ने जीवनभर तन-मन-धन से राष्ट्रभाषा हिन्दी और देवनागरी लिपि की जो सेवा की है, ऐसा उदाहरण मिल पाना बेहद कठिन है। श्री जोशी ने ''हिन्दी के पांच प्यारे'' नाम से राष्ट्रभाषा आंदोलन चलाया। हिन्दी में हस्ताक्षर करने, व्यापारी प्रतिष्ठानों के बोर्ड हिन्दी में लिखने, हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु देशभर में सत्याग्रह चलाने, रथयात्रा निकालने, हिन्दी परिषद की स्थापना, व्यावसायिक परीक्षा का माध्यम हिन्दी में किए जाने, ग्वालियर व्यापार मेले का प्रतीक चिन्ह हिन्दी में किए जाने, मूलभूत नियमों की जानकारी हिन्दी में किए जाने आदि विषयों को लेकर हिन्दी को जो सम्मान दिलाया वह बेहद आदरणीय और प्रशंसनीय कार्य कहा जा सकता है।
यहां लिखने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि हिन्दी को लेकर आज राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जो सकारात्मक बातें की जा रही हैं, उसका श्रेय काशीनाथ जोशी जैसे हिन्दी के महान योद्धा को ही जाता है। आज हिन्दी दिवस के अवसर पर उनके जीवन के बारे में हिन्दी प्रेमियों को जानना बेहद आवश्यक है।
हिन्दी सेवी श्री काशीनाथ जोशी का जन्म देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में 7 जुलाई 1933 को हुआ। प्रारंभिक शिक्षा झांसी में पूर्ण करने के बाद, ग्वालियर आ गए और यहां से स्नातक शिक्षा प्राप्त की। श्री जोशी यहां महालेखाकार कार्यालय में शासकीय सेवा से जुड़े और यहीं से उनके भीतर हिन्दी के प्रति लेखन, व अनुवाद की प्रेरणा जाग्रत हुई। शुरूआत में श्री काशीनाथ जोशी ने हिन्दी, मराठी में लेखन प्रारंभ किया।

हिन्दी के पांच प्यारे

श्री काशीनाथ जोशी को सदैव यह बात खटकती थी कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी होने तथा ग्वालियर क्षेत्र हिन्दीभाषी होने के बावजूद यहां के व्यावसायिक प्रचार पटल (दुकानों के बोर्ड) अंग्रेजी में क्यों लिखे जाते हैं? उन्होंने कई बार यह बात अपने लेखों के माध्यम से और स्वयं आग्रह करके उठाई। लेकिन जब किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो श्री जोशी ने ''हिन्दी के पांच प्यारे'' नाम से एक संस्था का गठन किया। इसमें उन्होंने अपने पांच निकट हिन्दी प्रेमीजनों को शामिल किया। ये लोग थे साहित्यकार डॉ शिव बरूआ, अशोक संत, लाजपत आहूजा, सुनील जोटनकर और उनके पुत्र हेमन्त जोशी। पांच प्यारे के गठन की प्रेरणा उन्हें गुरु गोविन्द सिंह से प्राप्त हुई। श्री जोशी ने इस संस्था के माध्यम से हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए आंदोलन का शंखनाद किया।
उनके द्वारा गठित हिन्दी के पांच प्यारे संस्था का काम था अंग्रेजी पटल लगाने वाले व्यापारियों को पहले बोर्ड लगाकर सावधान करना, उनमें राष्ट्रीयता की भावना जगाना, सावधान करने व आग्रह न मानने वाले व्यापारियों के अंग्रेजी के पटलों पर रातों-रात काला रंग पोतने का काम भी श्री जोशी ने किया। कुछ विरोध के बाद व्यापारियों ने श्री जोशी की बात को समझा और हिन्दी के सम्मान में अपने व्यापारिक पटल हिन्दी में लिखना प्रारंभ किया। वे इस बात पर सहमत भी हुए कि हिन्दी भाषी क्षेत्र के पटल हिन्दी में होना गौरव की बात है।

हिन्दी परिषद की स्थापना
महालेखाकार कार्यालय में राजभाषा अधिनियम लागू होने के बावजूद अंगेजी में कामकाज होने पर राजभाषा अधिनियम केवल औपचारिकता मात्र बन जाने से काशीनाथ जी जोशी बेहद व्यथित हुए और उन्होंने महालेखाकार कार्यालय में केन्द्रीय सचिवालय में हिन्दी को बढ़ावा देने की मांग उठाई। उन्होंने अधीनस्थ लेखा परीक्षा का माध्यम हिन्दी में करने के लिए उच्च न्यायालय में याचिका भी लगाई जिससे इसका माध्यम हिन्दी हुआ। बाद में यह समस्या आई कि पुस्तक हिन्दी में न होने से छात्र कैसे अध्ययन करें? इसका समाधान करते हुए श्री जोशी ने फंडामेंटल रूल अर्थात मूलभूत नियम की पहली हिन्दी पुस्तक लिखी जो बेहद लोकप्रिय हुई और समस्या का समाधान भी हुआ। उन्होंने इंजीनियरिंग सहित कई व्यावसायिक परीक्षाओं का माध्यम हिन्दी में करने के लिए भी संघर्ष किया और सफलता प्राप्त की।

मेला प्राधिकरण का प्रतीक चिन्ह हो हिन्दी में
ग्वालियर के प्रसिद्ध ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण का प्रतीक चिन्ह जब मध्यप्रदेश शासन ने अंग्रेजी में जारी किया तो जोशी जी बेहद व्यथित हो गए। उन्होंने मध्यप्रदेश शासन को इसके लिए कई पत्र लिखे। जब सुनवाई नहीं हुई तो जोशी जी ने बाकायदा अपनी मांग पूर्ण करने और हिन्दी को सम्मान दिलाने संघर्ष प्रारंभ किया अंतत: जोशी जी की मांग पूर्ण हुई और मेला प्राधिकरण ने प्रतीक चिन्ह को बदलकर हिन्दी में कर दिया।

कई पुस्तकों का लेखन व अनुवाद
काशीनाथ जोशी की कई प्रकाशित कृतियां हैं जिनमें प्रमुख हैं इंदिरा गांधी दिवास्वप्न, मूल नियम परिचय, लेखा परिचय, प्रशासनिक हिन्दी, रामायण-प्रथम राष्ट्रनायक सीताराम, देशालावणी (मराठी) विश्व इतिहास का मुकुटमणि छत्रपति शिवाजी अनुवाद:- गो.नी. दांडेकर रचित स्मरण गाथा का मराठी से हिन्दी में साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित सावरकर समग्र (छह खण्डों में)
संस्थापाक- अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, हिन्दी के पांच प्यारे, वन मित्र न्यास, तुलसी सेना, दिवेकर स्मारक समिति व पुस्तकालय, शरद व्याख्यान माला व देवलिपि परिषद।
सम्मान:- मध्यभारत हिन्दी साहित्य सभा द्वारा बाजारों से अंग्रेजी पटल हटाने के सफल अभियान हेतु ''हिन्दी सेवी सम्मान'' श्री काशीनाथ जोशी अमृत महोत्सव के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखक व स्तंभकार वेदप्रताप वैदिक द्वारा हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए सम्मानित।

शिवराज बधाई के पात्र : जोशी

जीवन पर्यन्त हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए तन-मन- धन से संघर्ष करने वाले हिन्दीसेवी श्री काशीनाथ जोशी मध्यप्रदेश में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के सफल आयोजन से बेहद प्रसन्न दिखाई दिए। वयोवृद्ध श्री जोशी ने हिन्दी दिवस पर स्वदेश से विशेष बातचीत में अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हिन्दी को सम्मान दिलाने जो लड़ाई जीवन पर्यन्त लड़ी वह अब सही मार्ग पर है और इसके लिए एकजुटता दिखाई दे रही है यह खुशी की बात है। श्री जोशी ने कहा कि मुख्यमंत्री ने हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर सरकारी कामकाज हिन्दी में किए जाने की जो घोषणा की है उसके लिए वे बधाई के पात्र हैें। श्री जोशी ने कहा कि यह काम तो बहुत पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था, उन्होंने भी इसके लिए 1958 से ही लड़ाई प्रारंभ कर दी थी।

Updated : 2015-09-14T05:30:00+05:30
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