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दलितों की अटकी राहत राशि

प्रताडि़त मामलों में दी जाना है अजा-अजजा के प्रभावितों को राहत राशि

अशोकनगर। दलितों के साथ हुए उत्पीडऩ के मामले में उन्हें राहत देने के लिए शासन द्वारा उन्हें राहत राशि प्रदान की जाती है लेकिन जिले में ऐसे पीडि़तों को न केवल उत्पीडऩ सहन करना पड़ा है बल्कि उन्हें अब राहत राशि के लिए भी मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान होना पड़ रहा है जो खुद एक तरीके से उत्पीडऩ की श्रेणी में ही आता है। राहत राशि पाने के लिए दलित वर्ग के ये लोग पुलिस विभाग, प्रशासन और आदिमजाति कल्याण विभाग के दफ्तरों में घूम रहे हैं ताकि आर्थिक सहायता मिल सके लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते उन्हें नियमों का हवाला देकर टरकाया जा रहा है। हरिजन एवं आदिवासियों के साथ होने वाले अपराधों को लेकर सरकार गंभीर है और उन्हें फौरी राहत देने के लिए तत्काल मामले की धाराओं के आधार पर राशि स्वीकृत करती है। यह हजारों रुपये से लेकर लाखों तक में हो सकती है जिसमें से करीब 20 प्रतिशत राशि पीडि़त व्यक्ति या पक्ष को मामला स्वीकृत होने के बाद उसके बैंक खाते में डाल दी जाती है एवं अगर न्यायालय से फैसला उनके पक्ष में आता हैतो पूरी राशि पीडि़त व्यक्ति को मिल जाती है लेकिन पिछले वर्ष हुए दलित वर्ग के साथ अत्याचारों के मामलों में 33 प्रकरण जिला उत्पीडऩ राहत समिति में स्वीकृत किए गए थे लेकिन अभी तक हितग्राहियों को राशि नहीं मिल पाई है। समिति में कलेक्टर, एसपी एवं आदिमजाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक शामिल होते हैं। आदिमजाति कल्याण विभाग का दावा है कि राशि स्वीकृत होकर एक-दो दिन पहले ही खातों में डाल दी गई है जबकि शनिवार को ईद और रविवार को अवकाश होने के कारण राशि डालना संभव नहीं है। यही नहीं हितग्राही खुद परेशान हो रहे हैं एवं यहां-वहां चक्कर लगा रहे हैं। जनसुनवाई से लेकर विभाग में भी ऐसे उत्पीडऩ का शिकार हुए लोग राशि पाने के लिए आए दिन बैठे हुए देखे जा सकते हैं जबकि विभाग का दावा है कि एससी वर्ग के प्रकरणों में 20 लाख 21 हजार 125 रुपये खातों में डाल दिए गए हैं जबकि 10 प्रकरण एसटी वर्ग के थे। जिनकी राशि 9 लाख 67 हजार 500 रुपये स्वीकृत हो चुकी है लेकिन राशि न होने के कारण खातों में राशि नहीं डाली जा पा रही है। आदिमजाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक बीएल परमार की कार्यप्रणाली शुरू से ही विवादों में घिरी रही है। इस मामले में उनका कहना था कि हमारे यहां से जितने भी प्रकरण आते हैं, एक-दो दिन में ही प्रशासन के लिए भेज दिए जाते हैं। जहां बैठक में प्रकरण स्वीकृत किए जाते हैं।
इस साल नहीं हुई बैठक:
जिला उत्पीडऩ राहत समिति प्रकरण की सत्यता के आधार पर इन्हें स्वीकृत करती है। इस वर्ष 36 प्रकरण पंजीबद्ध हो चुके हैं लेकिन अभी तक बैठक नहीं हुई है, जिससे राशि स्वीकृत नहीं हो पा रही है। पिछली बैठक मार्च 2014 में हुई थी। विभागीय सूत्रों के मुताबिक अगली बैठक तभी आयोजित होगी, जब पिछले प्रकरणों की राशि संबंधित पक्षों के खाते में डाल दी जाएगी। चूंकि अभी एसटी वर्ग की राशि उपलब्ध ही नहीं है, इस कारण बैठक नहीं हो पा रही है। जाहिर है कि इससे उत्पीडऩ का शिकार हुए लोगों को राहत राशि पाने में विलंब होगा। नए नियमों के मुताबिक अब राहत राशि संबंधित व्यक्ति के खाते में सीधे डाली जाएगी। ई-पेमेंट होने से भी फिलहाल परेशानी आएगी।
अजाक थाने में कम आते हैं मामले:
हरिजन एवं आदिवासियों के साथ होने वाले अपराधों के मामलों को पंजीबद्ध करने के लिए शासन ने अजाक थाना की स्थापना की है। पहले इन थानों में बड़ी संख्या में प्रकरण दर्ज होते थे लेकिन अब यह संख्या कम होती जा रही है। दरअसल विभागीय मंशा एवं शासन के निर्देशानुसार इन वर्गों से संबंधित अपराधों को लेकर पुलिस संवेदनशील हुई है और ज्यादातर संबंधित थाना क्षेत्र में ही प्रकरण दर्ज कर लिए जाते हैं। पहले पुलिस का रवैया ऐसे प्रकरण दर्ज करने में कम रहता था, इस कारण पीडि़त पक्ष अजाक थाना तक आता था। इससे झूठे प्रकरण भी कम दर्ज हो पाते हैं क्योंकि संबंधित थाना क्षेत्र की पुलिस मामले की सत्यता ज्यादा अच्छे तरीके से जांच पाती है।

Updated : 2015-07-21T05:30:00+05:30
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