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दर-दर की ठोकरें खा रहे माता-पिता

अंशुल वाजपेयी / ग्वालियर। जब बेटे का जन्म होता है, तो माता-पिता का मन आनन्दित हो उठता है। उन्हें ऐसा लगता है कि यही बेटा बड़ा होकर उनके कुल का नाम रोशन करेगा, परिवार को आगे बढ़ाएगा और बुढ़ापे में उनके सहारे की लाठी बनेगा, लेकिन आज के बेटे ये सब न करते हुए उल्टा अपने माता-पिता को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताडि़त कर रहे हैं। इस काम में उनकी पत्नियां भी बखूबी साथ दे रही हैं।
कलयुग के प्रभाव का प्रत्यक्ष उदाहरण एसडीएम, लश्कर के कार्यालय में देखने को मिल रहा है, जहां प्रत्येक बुधवार को कई दुखी माता-पिता अपने बेटा-बहू से भरण पोषण दिलवाने और उन्हें सुधारने की गुहार लगाने आते हैं। किसी का बेटा विवाह के बाद से अपने माता-पिता को घर से निकालने पर आमादा है, तो किसी बेटे ने ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी हैं कि माता-पिता रहते तो घर में हैं, लेकिन खाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। कुछ कलियुगी बेटे-बहू ऐसे भी हैं, जिन्होंने माता-पिता को घर से ही निकाल दिया है और यदि वे घर पर रहने की जिद करते हैं तो वे उन पर हाथ उठाने से भी नहीं चूकते।
एसडीएम लश्कर की अनूठी पहल
बेटों-बहुओं से पीडि़त माता-पिता अपना दुखड़ा रोने और न्याय की गुहार लगाने के लिए पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाते हैं, लेकिन कम ही प्रकरणों में उनकी समस्या का निराकरण हो पाता है। ऐसे में एसडीएम लश्कर की यह अनूठी पहल प्रशंसनीय है। वे प्रत्येक बुधवार को एसडीएम न्यायालय में गुहार लगाने वालों से बकायदा आवेदन लेते हैं और माता-पिता भरण पोषण अधिनियम-2007 में विदित प्रावधानों के आधार पर कार्यवाही करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में तीन से चार सुनवाई में प्रकरण का निराकरण भी कर रहे हैं।
बढ़ती जा रही है पीडि़तों की संख्या
जैसे जैसे न्यायालय की सुनवाई की खबर आमजन तक पहुंच रही है, वैसे-वैसे ज्यादा से ज्यादा पीडि़त माता-पिता अपनी समस्या लेकर एसडीएम कार्यालय पहुंच रहे हैं। केवल दो माह पहले शुरू हुई इस अनूठी पहल के तहत चार से अधिक प्रकरणों का निराकरण भी कर दिया गया है, लेकिन इसके बाद भी प्रकरणों की संख्या प्रत्येक सुनवाई के बाद बढ़ती ही जा रही है।

''माता-पिता भरण पोषण अधिनियम-2007 के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही की जा रही है। जो भी बच्चे अपने माता-पिता की उपेक्षा कर रहे हैं, उनके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की जाएगी। ये उनकी नैतिक जिम्मेदारी है जिससे वे मुंह नहीं मोड़ सकते। ''
महिप तेजस्वी
एसडीएम, लश्कर

केस-1
ओमप्रकाश अरोरा व उनकी पत्नी अपने दोनों बेटों सोनू, मोनू से परेशान थे। दोनों बेटे अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे जिसके चलते अरोरा दंपत्ति ने एसडीएम को आवेदन देकर उन्हें घर से बाहर निकालने की गुहार लगाई थी। दो सुनवाई के बाद माता-पिता बेटों को साथ रखने के लिए राजी हो गए वहीं दोनों बेटे प्रतिमाह अपने माता-पिता को दो-दो हजार रुपए देने पर।


केस-2
रामबाबू अग्रवाल के बड़े बेटे रवि अग्रवाल अपने परिवार के साथ झाबुआ में रहते है। पहले पिता को कुछ राशि भेज दिया करते थे लेकिन बाद में वह भी बंद कर दी। पिता ने भरण पोषण दिलवाने आवेदन दिया जिस पर न्यायालय ने बड़े बेटे रवि को प्रति माह आठ हजार रुपए पिता के खाते में जमा कराने का आदेश दिया। ़तों की सुनवाई पर टिकी निगाह

आवेदक का नाम समस्या
* बैकुंठी बाई बेटा ने मकान पर कब्जा कर लिया, खाने को नहीं देता। किशन राठौर बेटा-बहू ने घर से निकाल दिया, चाय का ठेला लगाकर जीवन-यापन कर रहे हैं।
* सुधा पाराशर मकान पर कब्जे को लेकर बेटा प्रताडि़त करता है।
गयाप्रसाद जाटव बेटा-बहू झगड़ा करते हैं, खाने को नहीं देते।
*शकुंतला जैन छोटा बेटा व बहू परेशान करते हैं, अनुपस्थिति में कमरों व अलवारियों के ताले तोड़ देते हैं।
* शान्ति नागपाल बेटा-बहू परेशान करते हैं, खाना भी नहीं देते।
* श्रीमती सोना बाई बेटा खाने को नहीं देता।
*पुष्पादेवी सिसौदिया बेटे ने मां को उसके हाल पर छोड़ दिया ।
* श्यामबाबू गुप्ता बेटे ने गृहस्थी का सामान हथिया लिया, खाने को भी नहीं देता।
*मोहनदास केसवानी बिजली, पानी के बिल नहीं भरते, प्रताडि़त करते हैं।
*प्रेम सिंह कुशवाह बेटा शराब पीकर मारता-पीटता है।

Updated : 2015-06-29T05:30:00+05:30
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