Top
Home > Archived > हाथों में हुनर जुबान पर दर्द समेटे हैं बांस शिल्पी

हाथों में हुनर जुबान पर दर्द समेटे हैं बांस शिल्पी

कच्चे माल की कमी से दम तोड़ रही है कला, बांस बैंक स्थापना से हो सकता है समस्या का समाधान

ग्वालियर। भारतीय संस्कृति और पर्यावरण के प्रति बांस का जितना महत्व है, उससे कहीं ज्यादा लोक शिल्प कला का एक बड़ा हिस्सा बांस पर निर्भर है। इसका जीता जागता प्रमाण वन विभाग द्वारा फूलबाग मैदान में आयोजित बांस मेले में देखने को मिला। जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए शिल्कारों ने बांस से निर्मित तमाम अद्भुत वस्तुओं का प्रदर्शन किया है। सोफा सेट, बैड, डायनिंग टेबल, स्टूल, रैक, लोन चेयर, गार्डन चेयर सहित घरेलू साज-सज्जा की तमाम वस्तुएं शामिल हैं। बांस मेले में आए अधिकांश शिल्पकारों की एक ही शिकायत है कि उन्हें कच्चा माल विशेषकर मोटा बांस, बूम बांस, कनक काइच, मूली बांस बड़ी मुश्किलों से मिलता है, जिससे उनका कारोबार प्रभावित होता है। शिल्पकार चाहते हैं कि उन्हें बांस संबंधी सभी जरूरी कच्चा माल आसानी से मिले। इसके लिए केन्द्र व राज्य सरकारों को प्रमुख स्थानों पर बांस मटेरियल बैंक स्थापित करना चाहिए।
बांस मेले में बरेली उ.प्र. से आए मोहम्मद नदीम का बरेली में अपना स्वयं का कारखाना हैं, जिसमें करीब एक दर्जन कारीगरों की मदद से वह हस्त निर्मित बांस के फर्नीचर एवं घरेलू साज-सज्जा की वस्तु बनाते हैं। इसके लिए वह आसाम, त्रिपुरा, मेघालय से कच्चा माल लेकर आते हैं, लेकिन कई बार उन्हें उनके मन मुताबिक गुणवत्ता का कच्चा माल नहीं मिल पाता है, इसलिए वह चाहते हैं कि शिल्प मेलों के माध्यम से सरकारें जिस प्रकार शिल्पकारों को बाजार उपलब्ध कराने में मदद करती हैं, उसी प्रकार कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बांस मटेरियल बैंक भी स्थापित किए जाना चाहिए। मो. नदीम का कहना है कि पांच दिवसीय इस बांस मले में ग्वालियर के लोगों ने भी बांस निर्मित वस्तुओं को काफी पसंद किया और उनकी डेढ़ लाख से अधिक की विक्री हुई। उनका कहना था कि यह मेला कम से कम दस दिन और चलना चाहिए था।

लगातार घट रहे हैं बांस के पेड़
बांस मेले में आए शिल्पकारों के अनुसार देश में बांस के पेड़ लगातार घट रहे हैं। उदाहरण के लिए नेपाल से लगे बिहार के सीमाई इलाके आज भी बांस वन के नाम से जाने जाते हैं, लेकिन आज वहां बांस के पेड़ों के निशान तक नहीं बचे हैं। समूचे पूर्वोत्तर और मध्य भारत की भी यही कहानी है। कभी यह दोनों क्षेत्र बांस की देशी प्रजाति की खेती के लिए दुनिया भर में जाने जाते थे। हालांकि बांस की खेती को लेकर कोई सर्वेक्षण तो नहीं हुआ है, लेकिन बांस के पेड़ लगातार घटते जा रहे हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर केन्द्र सरकार ने वर्ष 2006 में बांस की खेती को बढ़ावा व संरक्षण देने की दृष्टि से 'राष्ट्रीय बांस मिशनÓ योजना की शुरुआत की थी, लेकिन म.प्र. व छत्तीसगढ़ को छोड़ दें तो देश के कई राज्यों में आज तक इस योजना की शुरुआत तक नहीं हुई है। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने वन अधिनियम कानून के माध्यम से बांस को लघु वनोत्पाद भी घोषित किया था, ताकि किसान बांस को औद्योगिक और वाणिज्यिक इस्तेमाल में ला सकें, लेकिन कई राज्य सरकारों ने इस कानून का भी पालन नहीं किया है।

इसलिए घटी बांस की खेती
वनस्पति विज्ञान बांस को घास मानता है, जबकि भारतीय वन अधिनियम के अनुसार बांस एक लकड़ी अर्थात वृक्ष है। इस कारण बांस पर वन विभाग का पूर्ण अधिकार है। अत: जो किसान बांस की खेती करते हैं, वह भी वन विभाग की अनुमति के बिना बांस नहीं काट सकते। इस व्यवस्था के चलते किसानों को बांस काटने की अनुमति के लिए कागजी खाना पूर्ति की जटिलताओं से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा कई राज्यों में बांस के परिवहन के लिए भी अलग से ट्रांजिट पास लेना पड़ता है। ऐसे ही कारणों से किसान बांस की खेती से दूर होते जा रहे हैं। हालांकि बांस घास है या वृक्ष? इस पर बहस शुरू हुई तो तत्कालीन केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वनस्पति विज्ञान से सहमति जताते हुए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि वे वन प्रशासन को बता दें कि बांस एक घास है, वृक्ष नहीं। अत: बांस पर किसानों का ही पूर्ण अधिकार है। 

Updated : 2015-05-13T05:30:00+05:30
Next Story
Share it
Top