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सिजेरियन की नही हैं व्यवस्थाएं

अशोकनगर। जिला अस्पताल में जटिल प्रसव के दौरान अगर ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है तो ऑपरेशन की व्यवस्था न होने के कारण गर्भवती को भोपाल रिफर करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कई बार जच्चा-बच्चा की जान पर भी बन आती है। कई बार तो जच्चा या बच्चा की जान भी गई है। जिला अस्पताल में आने वाले जटिल प्रसव के मामले सुलझ नही पा रहे हैं। परिजन इस उम्मीद से की जिला अस्पताल बड़ा अस्पताल है जहां आसानी से प्रसव हो सकता है। अपनी बहु बेटी को अस्पताल लाते हैं मगर अस्पताल में सुरक्षित प्रसव के लिए ऑपरेशन की व्यवस्था नही है। इससे गर्भवती महिलाओं को भोपाल रिफर किया जा रहा है। मगर सबसे अधिक परेशानी ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हो रहे सरकारी अस्पतालों से रिफर होकर आने वाली महिलाओं को है। ग्रामीण गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए जब निकट के सरकारी अस्पताल में लेकर पहुंचते हैं तो गंभीर स्थिति देखकर डॉक्टर महिला को जिला अस्पताल रिफर कर देते हैं। कम से कम एक और कई बार पांच घण्टे बाद जिला अस्पताल में पहुंचने के बाद डॉक्टर महिला का चैकअप करते हैं एवं ऑपरेशन की स्थिति होने पर परिजनों से भोपाल ले जाने को कह देते हैं। प्रसव पीड़ा से कराहती महिला को लेकर परिजन जब तक भोपाल पहुंचते हैं तब तक कुछ मामलों में अनहोनी घटित हो जाती है।
अस्पताल में ये नही है सुविधा
जिला अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के सिजेरियन ऑपरेशन हेतु व्यवस्थाएं नही है। जिनमें प्रशिक्षित स्टाफ की कमी और ब्लड बैंक न होना सबसे महत्वपूर्ण है। ऑपरेशन के दौरान अगर रक्त की आवश्यकता होती है तो अस्पताल में इसका न होना गर्भवती के लिए जानलेवा हो सकता है। इस कारण महिला डॉक्टर रिस्क लेने के बजाय महिला को रिफर करना ज्यादा उचित समझती हैं। जबकि यह स्थिति ज्यादा गम्भीर है क्योंकि भोपाल की दूरी अधिक हैं और यह दूरी भी जच्चा-बच्चा के लिए खतनाक साबित हो जाती है।
पूर्व में हो चुकी हैं मौतें
जिले में गर्भवती महिलाओं की जांच और ऑपरेशन की व्यवस्था नही है। इस कमी के चलते पूर्व में कई मौतें भी हो चुकी है। जिले के दूरस्थ अंचल के रहवासी प्रसव पीढ़ा होने पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुंचते हैं। वहां डॉक्टर खून की कमी बताकर जिला अस्पताल अशोकनगर के लिए रिफर कर देते हैं। जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा ऑपरेशन से प्रसव होने की बात कहकर भोपाल रिफर कर दिया जाता है। पूरे जिले में ऐसे कई मामले है जब समय पर ऑपरेशन की सुविधा न मिल पाने के कारण जच्चा-बच्चा की असमय मौत हुई है।
स्वास्थ्य सेवाओं की खुल रही पोल
एक ओर शासन और स्वास्थ्य विभाग मातृ मृत्युदर को लुभावने आंकड़े पेश करके कम होने का दावा कर रहे हैं। दूसरी ओर बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और समय पर सही उपचार न मिलने के कारण गर्भवती माताएं असमय काल के गाल में समा रहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा आरोग्य केन्द्रों को संचालन किया जा रहा है। वहीं महिला बाल विकास विभाग द्वारा गर्भवती एवं धात्री महिलाओं के लिए विभिन्न योजनाएं एवं कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इनके अलावा आशा कार्यकर्ताएं और आंगनवाडी कार्यकर्ताएं भी स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी उठा रहीं हैं। फिर भी गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी होना बताता है कि जिम्मेदारी में लापरवाही बरती जा रही है। अगर ठीक से आयरन की गोलियों का वितरण, टीकाकरण, गर्भवतियों की जांच आदि किए जाएं तो प्रसव के समय आने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है एवं गंभीर स्थिति वाले मामले में गर्भवती को समय से पहले अस्पतालों में पहुंचाया जा सकता है।

Updated : 2015-12-17T05:30:00+05:30
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