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सामाजिक गतिविधियों का स्व-निर्धारण ही शिक्षा नीति का प्राण तत्व

सामाजिक गतिविधियों का स्व-निर्धारण ही शिक्षा नीति का प्राण तत्व

भारतीय शिक्षण मण्डल के चतुर्थ अधिवेशन में चर्चा सत्र आयोजित

ग्वालियर। शिक्षा की जडें इस भूमि के चितत्व को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए। समाज अपना चिंतत्व निश्चित करता है। इस चिंतत्व पर शिक्षा नीति की रचना होनी चाहिए। अर्थात शिक्षा नीति का प्राण तत्व समाज में चलने वाली गतिविधियों को स्व-निर्धारित करने वाला होना चाहिए। यह बात आईपीएस महाविद्यालय में आयोजित भारतीय शिक्षण मण्डल के चतुर्थ राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन आयोजित चर्चा सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख अनिरुद्ध जी देशपाण्डे ने कही।
श्री देशपाण्डे ने कहा कि आज शिक्षा अर्थ के चंगुल में आ चुकी है। इस कारण शिक्षा को लेकर सब परेशानी हो रही है। उन्होंने कहा कि हमें अर्थविद्या का दास नहीं बनकर समाज रचना को शिक्षा में समावेशित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति के तहत स्कूलों की रचना बदलनी होगी। आज के युग में अर्थ आवश्यक है लेकिन एसी क्लास रूम, समरूप गणवेश की अनिवार्यता, सभी विद्यार्थियों पर लेपटॉप की अनिवार्यता, मातृभाषा में नहीं बोलने जैसी शिक्षा नीति में दखल देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि 30 वर्ष बाद शिक्षा नीति आ रही है। इस शिक्षा नीति में सबको ऊपर लाने का समीकरण जरूरी है। क्योंकि हमारी शिक्षानीति सर्वे भवन्तु सुखिन: तक जाने वाली रही है।

भारतीय शिक्षण मण्डल के अखिल भारतीय सहसंगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने कहा कि धर्मदण्ड को धारण करने का सामर्थ, चरित्र पवित्रता का सामर्थ छात्रों में पैदा करना होगा। पहले खुद की शुद्धि करनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि हम में से प्रत्येक को आत्मावलोकन करना पड़ेगा। जीवन का त्याग करना पड़ेगा। इसके लिए सभी को अपना थोड़ा-थोड़ा समय समाज और राष्ट्र को देना पड़ेगा। प्रत्येक कार्यकर्ता संकल्प के साथ समय देगा तभी शिक्षा नीति बनेगी। उन्होंने सरकार को नई शिक्षा नीति के निर्माण में आवश्यक रूप से अपने सुझाव देने का अनुरोध भी किया।
सुश्री इन्दुमति बेन काटदरे, संचालक पुनरुत्थान विद्यापीठ अहमदाबाद ने अपने उद्बोधन में कहा कि पुनरुत्थान विद्यापीठ मनुष्य की आजीवन शिक्षा का विचार करने वाला पीठ है। उन्होंने पीठ की स्थापना के तीन आधारभूत सिद्धांतों को समझाते हुए कहा कि पीठ शासन की मान्यता और सहायता से नहीं चलेगा। बल्कि इसके लिए विद्यानों और समाज की मान्यता चाहिए। क्योंकि शिक्षा व्यक्ति और समाज का चरित्र बनाती है। इसी प्रकार शुद्ध भारतीय ज्ञान धारा के आधार पर ही सभी शैक्षणिक पाठ्यक्रम चलाना पीठ का द्वितीय आधारभूत सिद्धांत है। तीसरा सिद्धांत नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था है। अर्थात शिक्षा को अर्थ निरपेक्ष बनाना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति में सुधार के प्रस्तावों में यह कभी नहीं कहा गया कि शिक्षा भारतीय हो। वैश्विकता की संकल्पना तो भारत ने ही दी है। इसलिए भारतीयता होना पूरे विश्व के कल्याण के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा शिक्षक के अधीन होती है इस कारण समाज में अनैतिक कार्यों का जवाब शिक्षक को देना होगा। हमें यह तय सत्यापित करना होगा कि व्यक्ति का व्यक्तित्व और समाज का भाग्य विद्यालय की कक्षा में ही बनता है। विद्यार्थी में श्रद्धा का भाव समाप्त हो चुका है, इसे फिर से जागृत करना होगा।
सत्र का आरंभ श्री विजय द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रभक्ति गीत 'हम विजय की ओर बढ़ते जा रहे -- से किया। कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन भारतीय शिक्षण मण्डल की प्रकाशन विभाग की अखिल भारतीय प्रमुख सुश्री अरुणा सारस्वत ने किया। अतिथियों को सम्मानित कर स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। इस दौरान भारतीय शिक्षण मण्डल से जुड़े धर्मनारायण अवस्थी जी की पत्रिका 'पथ प्रदर्शक का विमोचन भी किया गया।

Updated : 2015-11-21T05:30:00+05:30
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