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प्रसंगवश

हर-हर मोदी से डर-डर भाजपा क्यों ?

  • लोकेन्द्र पाराशर 

इसमें कोई शक नहीं है कि कुछ शब्द ऐसे गूढ़ हो जाते हैं कि उनका शाब्दिक अर्थ ढूंढो तो चित्र उभरता है। यानि वे किसी चित्र और चरित्र का पर्याय बन जाते हैं। लेकिन 'शब्द' जिसे हम ब्रह्म कहते हैं, क्या उसे व्यापक स्वरूप में, शब्दार्थ में, भावार्थ में, निहितार्थ में देखा जाना अपराध हो जाता है? दो दिन से चैनलों पर चिल्ल-पौं मची है कि हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा लगाकर भगवान शंकर का अपमान किया गया है।
जिन्होंने यह मुद्दा उठाया, उनके द्वारा ऐसा किया जाना स्वाभाविक ही था। श्रद्धेय स्वामी स्वरूपानंद जी गाहे बगाहे अपनी अनोखी भावनाएं व्यक्त करते रहते हैं। अपने कुछ विशेष शिष्यों की शैली कभी-कभी वे भी आत्मसात कर आत्मश्लाघा में फूले नहीं समाते। इतिहास गवाह है कि वे कभी भी ऐसे लोगों पर फूल नहीं बरसाते जो भारत की मातृवेदी पर स्वयं को तिल-तिल कर होम कर जाते हैं। स्वाभाविक है एक धर्मगुरु होने के नाते उन्हें सनातन धर्म के सम्मान में सलाह से संहार तक की सीमा पार करने में संकोच नहीं करना चाहिए। लेकिन तनिक उस शब्द की मर्यादा भंग होने के प्रपंच से तो बचना चाहिए जिस शब्द के तहत उन्हें 'शंकराचार्य' जैसा सम्मान प्राप्त है।
उन्होंने जैसे ही हर हर मोदी पर आपत्ति की, तो सबसे पहले प्रतिक्रिया व्यक्त की दिग्विजय सिंह ने। कौन नहीं जानता कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद और दिग्विजय सिंह के गुरु-शिष्य संबंध कितने प्रगाढ़ हैं। स्वामी जी ने कहा और शिष्य ने तुरंत लपका! क्या यह मैच फिक्सिंग नहीं है? स्वरूपानंद जी को हो सकता है लगा हो कि हिन्दुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं। लेकिन क्या यह विद्वान महाशय यह बताने का प्रयत्न करेंगे कि यदि शब्द ब्रह्म है तो फिर क्या उसकी व्यापकता को सीमाओं में समेटना सूरज को चिराग की तरह देखने का संकुचित सोच नहीं है?
हमारी समृद्ध परंपरा रही है कि जिसने शौर्य, पराक्रम, उदय और समर्पण के प्रतीक भगवा वस्त्र धारण किया है, प्रथम दृष्टया वह हमारी श्रद्धा का पात्र है। लेकिन इस श्रद्धा के सम्मुख अवनत समाज को अनवरत यह अधिकार भी हमारी संस्कृति देती है कि वह समीक्षा करे। आज समीक्षा का विषय है कि स्वामी जी के उवाच ऐसे विशेष अवसरों पर ही क्यूं सामने आते हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद जब अटल जी ने भरी संसद में इंदिरा जी को दुर्गा कहा तब स्वरूपानंद जी को उसमें आदि शक्ति का अपमान क्यों नहीं दिखाई दिया। जब सोनिया जी के दुर्गा स्वरूप चित्र अधिवेशनों में लगाए जाते हैं तब स्वामी जी के पेट में दर्द क्यों नहीं हुआ? जब कश्मीर से हजारों हिन्दुओं का कत्ल कर उन्हेें अपने ही देश में शरणार्थी बना दिया गया, तब स्वामी जी ने आमरण अनशन क्यों नहीं किया? जो स्वामी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों की दुहाई देकर हर-हर का विरोध कर रहे हैं, उन्हें अपने परम शिष्य दिग्विजय की उस आंख में खोट क्यूं नहीं दिखाई देता जिन्हें हर बुरे काम में संघ का हाथ दिखाई दे जाता है। शहीद हेमंत करकरे की मौत हो या बटला हाऊस में इंस्पेक्टर मोहनदत्त शर्मा की शहादत, कब-कब स्वरूपांनद जी ने सच बोलने का साहस किया। आज ताजा-ताजा कपिल सिब्बल ने कह दिया है कि दो दिन में जो आतंकवादी पकड़े गए हैं वे उन्हें आतंकवादी दिखाई नहीं देते। कहें स्वामी जी, इस पर भी कृुछ कहें।
स्वरूपानंद जी ने क्या कहा? दिग्विजय सिंह जी ने उसे कैसे आगे बढ़ाया और चैनलों की चौबीसों घंटे के मसाले की मजबूरी समझी जा सकती है। लेकिन यह समझने में हमारा सिर चकरा रहा है कि भाजपा नेताओं को इस कदर भयभीत होने की आवश्यकता क्यूं आ पड़ी। क्या अपने मौलिक सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता की परिपाटी भाजपा में टूट रही है! ठीक है स्वरूपानंद जी की चिट्ठी को 'इच्छा ही आदेश मानकर उनके सम्मानस्वरूप नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं से यह नारा नहीं लगाने की अपील कर दी होगी। सदाशयता दिखाने से व्यक्तित्व और निखरता ही है। लेकिन मोदी जी और पूरी भाजपा को स्वरूपानंद जी से यह तो कहना चाहिए कि पूरे राष्ट्र का अपमान करने वाले औवेसी के बारे में आप बोलिए और अपने शिष्य से भी बुलवाइए। शिवजी पर अपमानजनक कविता पढऩे वाले कुमार विश्वास से उठक बैठक लगवाइए। भाजपा को यूं रक्षात्मक खेलने की जगह स्वामी जी से सवाल करना चाहिए था कि केदारनाथ में हुई सदी भी सबसे भीषण त्रासदी के वक्त उनका संतत्व कहां सो गया था।
भाजपा को भयभीत होने से पहले कम से कम हर-हर शब्द की व्याख्या के लिए विद्वानों से राय तो लेनी चाहिए थी। जितना हमें पता चला है वह तो यही है कि 'हर' एक ऐसा शब्द है जिसमें कष्टों को दूर करने की एक अपील, एक अपेक्षा छिपी हुई है। चूंकि सनातन धर्म में शंकरजी को देवाधिदेव का स्थान प्राप्त है, इसलिए सभी देवता अपने और मानव जाति के कष्ट निवारण की प्रत्याशा में शंकर जी से कहते थे 'हर-हर महादेव। दूसरे इस शब्द का प्रयोग गंगा मैया के लिए प्रचलन में है, जिनका महादेव से संबंध व्याख्या का विषय नहीं है। इसका आशय यह कैसे हो सकता है कि यदि किसी मनुष्य के भीतर कुछ लोग कष्ट निवारण का माद्दा देखकर अपनी भावनाएं प्रकट करने के लिए 'हर-हर' का उच्चारण करते हैं तो यह भोले का अपमान हो गया। 'राम-लीला' नाम से अश्लील फिल्में बनने पर स्वरूपानंद जैसे संत मुंह नहीं खोलते तो फिर...... फिर राजनीति की वर्तमान तंग गलियों की घुटन को समझने में राष्ट्रवाद से अनुप्राणित भाजपा जैसे संगठन को दिक्कत क्यूं आ रही है। कहीं सत्ता को आसन्न देखकर भाजपा के स्वभाव में यह ताजातरीन अफरातफरी तो नहीं देखी जा रही। जो सच है वह सच है। उसे झूठ बनाने के झांसे में अभी से आएंगे तो आगे क्या होगा? और सच यही है कि ईश्वर भी उन्हीं का साथ देता है जो दृढ़ प्रतिज्ञ और साहसी होते हैं। अब भाजपा का नेतृत्व तय करे कि उसे अपनी सेना को क्या संदेश देना है।

Updated : 2014-03-25T05:30:00+05:30
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