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जनमानस

मंजिल से भटकते भारतवासी

निकले थे कहां के लिए खाई ऐसी ठोकर की मंजिल ही बदल गई। आज ऐसी ही स्थिति हो गई है, हम भारतवासियों की।
विश्वगुरु बनने की राह में निकला था भारत पर विश्वकी विलासिता को देखकर मेहनत और त्याग का जीवन भूलकर एक की टोपी दूसके के सिर रखकर अपना काम चला रहे है आज पूरा विश्व हमारे ही सिद्धांत पर चलकर तरक्की की राह पर चल निकला है और हम उनकी तरह चलकर अवनति की ओर।
क्या ये उस देश के लिए शोभायमान है जिस देश ने सम्पूर्ण विश्व को जीने की रहने की समाज और घर बनाने की एक दूसरे की मदद और हर्ष और शोक में एक दूसरे का साथ देने की कला सिखाई है। हमारा सौभाग्य है कि हमने भारत की पवित्र भूमि पर जन्म लिया है और हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने देश की मूल विधा के अनुरूप अपना जीवन-यापन नहीं कर रहे, ये सच में दुर्भाग्यपूर्ण है।
बदलना है हमें खुद को समाज को
फिर से बढऩा है उस राह पर
छोडऩा है ऐसी जीवन का तरीका
जो रोड़ा बने भारत के विकास पर

गौरब बाजपेयी, ग्वालियर

असुरक्षा का बढ़ता खतरा


देश में बढ़ती महंगाई एवं भ्रष्टाचार से आम नागरिक त्रस्त है। दूसरी ओर महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों व शोषण की खबरों से मानवीय मूल्य तार-तार होते जा रहे हैं। दुर्भाग्य की बात है कि राजनीतिक दल अभी भी किसी ऐसे उपायों को नहीं ढूंढ सके, जिससे लड़कियां सुरक्षित अकेले आ जा सके। क्या देश को यह जानने का हक है कि सरकार ने असुरक्षा खत्म करने के क्या उपाय किए।

सुरेश अग्रवाल, ग्वालियर


Updated : 9 March 2013 12:00 AM GMT
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