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ज्योतिर्गमय

असफलता भी दे जाती है खुशी

कृष्ण भगवान गीता में कहते हैं , 'देवी ध्येषा गुणमयी मम माया दुरंत्यया अर्थात यह जो माया है, दैवी गुण युक्त है।
यह दिव्य है, दुरंत्य है। इससे आसानी से पार नहीं हो सकते, बिना मेरी कृपा के। मेरी ही कृपा से मेरी माया से तुम बाहर आ सकते हो। तुम शरणागत होकर, मेरे कृपा पात्र हो जाओ। तुम्हें और कुछ नहीं करना है। तुम मुझको प्यारे हो जाओ। तो तुम्हारे करने-कराने के लिए तो कुछ नहीं छोड़ा भगवान ने।
तुम तुम्हारे कर्ताभाव से मुक्त हो जाओ, फिर तो वही करने वाले हैं। एकदम खेल ही तो है यह, और क्या है? वह भी खेल का ही एक अंग है इसीलिए तो ज्ञानी विचलित नहीं होता। नहीं तो ज्ञानी, अज्ञानी को देखकर विचलित हो जाएं तड़प जाएं। ज्ञानी तड़पते नहीं, विचलित नहीं होते, वे तो अज्ञानी को भी सहन कर लेते हैं। अज्ञानी को सहन करना, शब्द भी ठीक नहीं है। ज्ञानी तो उसका भी आनन्द लेते हैं। अत: अज्ञान की भी अपनी जगह है।
भगवान की लीला हमेशा चलती रहती है। इसलिए कहते हैं कि बांसुरी की धुन कभी नहीं रुकती है। यदि वह रुक जाये तो दुनिया रुक जाये। आप इसे इस तरह देखें कि अगर कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी का पूरा आनंद ले सकता है, तो आप वही आनंद क्यों नहीं ले सकते? आपको जिंदगी का आनंद लेने से कौन रोक रहा है? आपका मन। आपका मन भूतकाल और भविष्यकाल के बीच घूमता रहता है, उसको आराम देने की जरूरत है. तब ही आप सही मायने में खुश रहेंगे। मान लीजिए आप कोई खेल-खेल रहे हैं। उस खेल में सारा समय अगर आप ही जीतेंगे तो क्या वह खेल आनंद दे सकेगा। इसी तरह जिंदगी में कहीं छोटी सी निष्फलता मिली तो क्या हो गया?
वही छोटी निष्फलता आपके 'कल की कोई बड़ी सफलता का कारण बनती है। उदाहरण के तौर पर जब आप छोटे थे, स्कूल जाते समय आप बड़े ट्रक से प्रभावित हो गये। मन में निश्चय कर लिया कि बड़ा होकर ट्रक ड्राइवर ही बनूंगा या फिर रेल को देखकर रेल-चालक बनने की ठान ली। पर बड़े होकर न ट्रक-ड्राइवर बने न रेल-चालक। एक तरह से यह निष्फलता ही है, पर असल में सफलता हुई। क्योंकि आप कुछ और बने जिस पर आप अभी खुश हैं। यानी आप अपनी निष्फलता पर खुश हैं।

Updated : 24 Dec 2013 12:00 AM GMT
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