Home > Archived > सम्पादकीय

सम्पादकीय

आलोचना पर बवाल क्यों

किसी ने ठीक ही कहा है ''निंदक नियरे राखिए अर्थात निंदकों को नजदीक ही रखना चाहिए जिससे अपनी गलतियों का पता चल सके यदि निंदक या आलोचक नहीं होंगे तो स्वयं के श्रेष्ठ होने का दंभ आ सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो विश्व प्रसिद्ध पत्रिका टाइम्स मैग्जीन द्वारा हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह के क्रियाकलापों का जो विश्लेषण किया है और उन्हें उम्मीद से कम सफल प्रधानमंत्री बताया है तो क्या गलत है? कुछ नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लग रही कि अमेरिका से प्रकाशित विदेशी पत्रिका आखिर हमारे देश के प्रधानमंत्री के कामकाज का विश्लेषण क्यों कर रही है? आश्चर्य तो तब हुआ कि जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक शरद यादव ने इस आलोचना को सिरे से नकारते हुए पत्रिका पर व्यंगात्मक टिप्पणी कर डाली। आश्चर्य इस बात का है कि शरद यादव एक बार फिर भूल गए कि वह केन्द्र सरकार के नहीं उसके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी गठबंधन राजग के संयोजक हैं और यह उनका राजनीतिक धर्म है कि वह सरकार की किसी भी कमी के सामने आने पर उसका इस्तेमाल सरकार पर हमला बोलने के लिए करें। परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया, अब तो यह वह स्वयं जानें कि उनके मन में क्या है? जो लोग आज टाइम पत्रिका द्वारा प्रधानमंत्री की निंदा से नाखुश नजर आ रहे हैं और टाइम पत्रिका को विदेशी कहकर उस पर हमला बोल रहे हैं, उनमें से बहुत से वे लोग भी हैं जो तीन वर्ष पहले इसी टाइम पत्रिका द्वारा दुनिया के 100 सबसे ताकतवर लोगों में मनमोहनसिंह को 19वें स्थान पर रखे जाने के लिए इस पत्रिका का उदाहरण देते नहीं थकते थे। इसको लेकर कांग्रेस ने विज्ञापन तक प्रकाशित कराए और विपक्षियों पर खूब हमला बोला था, आज जब उसी टाइम पत्रिका ने डॉ. मनमोहनसिंह को फिसड्डी निरुपित कर दिया तो उन्हीं लोगों के पेट में मरोड़ होने लगी और उसकी निंदा कर रहे हैं हम भी इस बात से सहमत हैं कि किसी विदेशी व्यक्ति अथवा मीडिया को हमारे देश में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है परन्तु हम इस बात के भी पक्षधर हैं कि सरकार की गलत नीतियों, क्रियाकलापों का विश्लेषण होना ही चाहिए। क्या मनमोहन सिंह एक नाकाम प्रधानमंत्री साबित नहीं हुए हैं? क्या उनके नौ साल के शासन काल में देश महंगाई से त्राहि-त्राहि नहीं कर रहा? क्या भारत भ्रष्ट देशों की सूची का सिरमौर नहीं बन गया है? क्या खराब आर्थिक नीतियों से भारत की साख दुनियाभर में नहीं गिरी है? क्या देश की आंतरिक सुरक्षा कमजोर नहीं हुई है? क्या आतंकवादी घटनाएं नहीं बढ़ी हैं? क्या पाकिस्तान जैसा कमजोर पड़ोसी भी हमें आंख नहीं दिखाता है? यह वह बातें हैं जो देश बोल रहा है, आज वही दुनिया बोल रही है और वही टाइम पत्रिका ने छापा है। अभी तक देश यह चिल्ला रहा था डॉ. मनमोहन सिंह दब्बू और असहाय प्रधानमंत्री हैं अब पूरी दुनिया यही बोल रही है। आखिर किस-किस का मुंह बंद किया जाए? यह वह देश है जहां अटलजी के शासन में परमाणु परीक्षण हुआ था और कारगिल पर हमला बोलने वाले पाकिस्तान को करारा जवाब दिया गया था, उस समय भारत ने अमरीका के आर्थिक प्रतिबंधों की भी चिंता नहीं की थी तब पूरी दुनिया ने भारत की ताकत और तेजस्विता को स्वीकार किया था। आज हम कहां से कहां आ गए आखिर कौन है इसके लिए जिम्मेदार? यह विश्लेषण तो होना ही चाहिए।


Updated : 2012-07-10T05:30:00+05:30
Next Story
Share it
Top