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राजनीति में शुचिता की प्रतिमा का अनावरण 

  • लोकेन्द्र पाराशर

तीस  सितंबर 2001 की दोपहर को ग्वालियर के आसमान पर जैसे किसी बवंडर ने कब्जा कर लिया। लोगों की आंखों के सामने गहरा धुंधलका था और कान उस वीभत्स वायुयान दुर्घटना के समाचार का खण्डन सुनने के लिए तड़प उठे थे, जिस दुर्घटना ने ग्वालियर के दैदीप्यमान नक्षत्र को सदैव के लिए सुला दिया था। भरी दोपहरी जैसे सूर्यास्त हो गया। सिंधिया राजपरिवार और ग्वालियर वासियों पर भीषण विपत्तियों का पहाड़ दूसरी बार महीनों के भीतर ही टूट पड़ा। श्रीमंत माधवराव सिंधिया अपनी मां की बरसी भी नहीं मना पाए कि विधाता ने उन्हें भी छीन लिया। यद्यपि उनके जीवनकाल में मां-बेटे के संबंधों को लेकर कई प्रकार की बातें की जाती थीं, लेकिन पुत्र के भीतर अपनी मां के प्रति संवेदनाओं से भरे सम्मान को हजारों लोगों ने अपनी नंगी आंखों से तब देखा जब मां चिता पर लेटी थी और अग्नि देने से पहले पुत्र फूट-फूटकर रो रहा था। उनका शरीर जैसे सुध बुध खो बैठा। अश्रुधारा ऐसी कि अत्येष्टी स्थल पर हजारों आंखें छलछला आईं। यह अपनी मां के प्रति उनका पवित्र और भावुक प्रेम था। शायद इसी प्रेम ने उन्हें यह कहते हुए झकझोर दिया कि उनके संबंधों में खटास की चर्चा भी क्यों होती रही? सच्चाई भी यही है कि श्री माधवराव सिंधिया ने अपने पूरे जीवनकाल में राजमाताजी के विरुद्ध कभी एक शब्द नहीं बोला। इतना ही नहीं उनके इर्द गिर्द भी कोई ऐसा व्यक्ति फटक नहीं पाया। उन्होंने अपने लंबे राजनैतिक जीवन में कभी टकराव का रास्ता नहीं अपनाया। वे सदैव अजातशत्रु की तरह जिए। चुनावी सभाओं में भी वे अपने प्रतिद्वन्द्वी की व्यक्तिगत आलोचना से बचते थे। यद्यपि उन्हें व्यक्तिगत रूप से लांछित करने के प्रयत्न खूब हुए। ऐसे आरोपों का वे जवाब दे भी क्या सकते थे कि वे सामंत हैं, श्रीमंत लिखवाते है, पैर छुलवाते है। अरे भाई, वे भारत की आजादी से दो वर्ष पूर्व यानि राजशाही में ही पैदा हुए थे। स्वाभाविक रूप से ग्वालियर रियासत में उन्हें महाराजा और उनकी माता को राजमाता का दर्जा समाज देता रहा। आज की राजनीति में तो जरा जरा से पद मिलने के बाद लोग न जाने क्या-क्या अलंकरण स्वयं ही लगा लेते हैं। एक दिन उन्होंने व्यक्तिगत चर्चा में कहा ''आप बताइए कि मैं किससे कहता हूं कि मेरे पैर छुओ? यह प्रश्न उन्होंने मुझसे उस समय पूछा जब वे हवाला के आरोप को चुनौती देने के लिए धौलपुर से एक विराट रैली के साथ दहाड़ते हुए ग्वालियर आए थे। तब पहली बार उनका चुनौती भरा भाषण ग्वालियर ने सुना 'मैंने चंबल का पानी पिया है, मैं किसी से नहीं डरता। उन्होंने विकास कांग्रेस की स्थापना कर लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरु कर दी । तब उनकी सर्वस्वीकार्यता के विराट दर्शन हुए। भारतीय जनता पार्टी ने उनका अघोषित समर्थन करते हुए अपने प्रत्याशी श्री माधवशंकर इंदापुरकर को मैदान से हटा लिया और कांग्रेस प्रत्याशी श्री शशीभूषण वाजपेयी अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। श्री सिंधिया को सबसे बड़ी विजय प्राप्त हुई। ग्वालियर की धरती पर दुनियां के अत्यंत लोकप्रिय राजनेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित कर उन्होंने सबको चौंका दिया था। अटल जी उनसे बहुत प्रभावित थे। जब श्री सिंधिया नहीं रहे तब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा-'देश ने एक करिश्माई लोकप्रिय नेता खो दिया है। अटलजी के बाद वे ग्वालियर के ऐसे नेता थे जो लोकसभा का सबसे लंबा अनुभव रखते थे। वे लोकसभा में विपक्ष के उप नेता थे। यदि काल की कुदृष्टि नहीं पड़ती तो वे शायद ग्वालियर से दूसरे प्रधानमंत्री होते। उनकी अकाल मौत के बाद ऐसे तमाम सवाल भी उठे कि वे प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर तेजी से बढ़ रहे थे शायद इसीलिए...। चलिए छोडि़ए! ऐसी बात तो श्री राजेश पायलट की मौत पर भी उठी थी।
बहरहाल जहां तक ग्वालियर क्षेत्र और सिंधिया राजपरिवार के संबंधों का प्रश्न है तो इसमें अंध भक्ति कहीं दिखाई नहीं देती। लोगों ने वह दिन भी देखे हैं जब राजमाता विजयाराजे सिंधिया अस्पताल में ही बनी रहीं और गुना, शिवपुरी की जनता उन पर वोट की भारी बलिहारी हुई। राजनैतिक क्षेत्र में इस परिवार का रिश्ता दो तरफा है। आज जहां लोकतांत्रिक भारत में नेताओं और जनता के बीच अविश्वास तेजी से बढ़ रहा है। भ्रष्टाचार बेशर्मी जैसे शब्दों की सीमाएं भी ध्वस्त कर चुका है। तब भी इस परिवार के किसी सदस्य के नाम ऐसा आरोप नहीं है। उनके रहन सहन, चमक दमक, ऊंचे महल को देखकर र्ईष्र्या की जा सकती है, लेकिन एक ऐसा उदाहरण नहीं दिया जा सकता कि राजमाता से लेकर माधवराव जी और यशोधरा जी से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया जी तक किसी ने कभी सांसद निधि में तांकझांक की हो। किसी थानेदार, तहसीलदार की पदस्थापना में रूचि दिखाई हो। व्यक्तिगत स्वभाव किसी का गरम, किसी का नरम हो सकता है, लेकिन राजनीति में शुचिता का पाठ तो इन सभी ने अपने पुरखों से सीखा ही है। इस परिवार के प्रति सम्मान का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जिनकी संवेदनाओं की प्राथमिकता समाज के अंतिम व्यक्ति से प्रारंभ होती है, उन्होंने राजमाता की बेटी और ग्वालियर की सांसद यशोधरा राजे सिंधिया को 'श्रीमंत लिखे जाने के लिए गजट नोटीफिकेशन कराया।
यह सिंधिया परिवार के प्रति श्रद्धा नहीं तो और क्या है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और ग्वालियर में भाजपा की नगर निगम। फिर भी पूरी चिंता और सम्मान के साथ स्वर्गीय महाराजा माधवराव सिंधिया की प्रतिमा स्थापित की गई है। स्वयं मुख्यमंत्री उस प्रतिमा का अनावरण करने आ रहे हैं। प्रतिमा की यह स्थापना सम्मान है उन कार्यों का जो श्री माधवराव सिंधिया ने पूरी लगन के साथ किए। वे किसी विभाग में मंत्री बने, सबसे पहले उन्होंने ग्वालियर के विकास की फाइल बनाई। रेलवे पुलों की श्रृंखला, विश्व स्तरीय शैक्षणिक संस्थान, नई नई रेलें और हवाई अड्डा। बहुत लंबी सूची है उनकी दूरदृष्टि से मिली सौगातों की। भले ही प्रदेश में उनकी ही पार्टी की सरकार ने उन्हें कभी सहयोग नहीं किया, लेकिन उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। उनकी बहिन को भी आज ग्वालियरवासी खेलों के विकास के पुरोधा के रूप में देख रहे हैं। पुत्र के राजनीति में बढ़ते दबदबे से ग्वालियरवासियों ने नई नई उम्मीदें लगा रखी हैं। यह दोनों भी अपने इस पूर्वज का अनुसरण कर इस अंचल को देश का श्रेष्ठ अंचल बनाने की दिशा में अग्रसर होंगे। यही असमय कालकवलित हुए श्री माधवराव सिंधिया को असली श्रद्धांजलि होगी।

Updated : 2012-11-19T05:30:00+05:30
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