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दीपावली पर्व का धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व

दीपावली पर्व का धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व
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नई दिल्ली। कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला त्योहार दीपावली हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मुख्यतया यह पर्व भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण पर विजय हासिल करने और अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। इसे ‘प्रकाश-पर्व’ भी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब श्रीराम, माता सीता एवं लक्ष्मण जी अयोध्या वापस लौटे थे, तो नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाईं थीं। इसी पौराणिक मान्यतानुसार प्रतिवर्ष घर-घर घी के दीये जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं। एक अन्य पौराणिक घटना के अनुसार इसी दिन श्री लक्ष्मी जी का समुन्द्र-मन्थन से आविर्भाव हुआ था। इस प्रसंगानुसार ऋषि दुर्वासा द्वारा देवराज इन्द्र को दिए गए शाप के कारण श्री लक्ष्मी जी को समुद्र में जाकर समाना पड़ा था। लक्ष्मी जी के बिना देवगण बलहीन हो गए। इस परिस्थिति का फायदा उठाकर असुर सुरों पर हावी हो गए। देवगणों की याचना पर योजनाबद्ध ढ़ंग से सुरों व असुरों के हाथों समुद्र-मन्थन करवाया। समुन्द्र-मन्थन से अमृत सहित चौदह रत्नों में श्री लक्ष्मी जी भी निकलीं, जिसे श्री विष्णु ने ग्रहण किया। श्री लक्ष्मी जी के पुनार्विभाव से देवगणों में बल का संचार हुआ और उन्होंने पुनः असुरों पर विजय प्राप्त की। लक्ष्मी जी के इसी पुनार्विभाव की खुशी में समस्त लोकों में दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाईं गई। इसी मान्यतानुसार प्रतिवर्ष दीपावली को श्री लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। दीपावली के दीपों के सन्दर्भ में देवी पुराण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। इसी दिन दुर्गा मातेश्वरी ने महाकाली का रूप धारण किया था और असंख्य असुरों सहित चण्ड और मुण्ड को मौत के घाट उतारा था। मृत्युलोक से असुरों का विनाश करते-करते महाकाली अपना विवके खो बैठीं और क्रोध में उसने देवों का भी सफाया करना शुरू कर दिया देवताओं की याचना पर शिव महाकाली के समक्ष प्रस्तुत हुए। क्रोधावश महाकाली शिव के सीने पर भी चढ़ बैठीं। लेकिन, शिव-शरीर का स्पर्श पाते ही उनका क्रोध शांत हो गया। किवदन्ती है कि तब दीपोत्सव मनाकर देवों ने अपनी खुशी का प्रकटीकरण किया। दीपावली पर्व के साथ धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। एक ऐतिहासिक घटना के अनुसार गुप्तवंश के प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के राज्याभिषेक के समय पूरे राज्य में दीपोत्सव मनाकर प्रजा ने अपने भावों की अभिव्यक्ति की थी। इसके अलावा इसी दिन राजा विक्रमादित्य ने अपना संवत चलाने का निर्णय किया था। उन्होंने विद्वानों को बुलवाकर निर्णय किया था कि नया संवत चैत्र सुदी प्रतिपदा से ही चलाया जाए। दीपावली के दिन ही महान समाज सुधारक, आर्य समाज के संस्थापक और ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के रचयिता महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने नश्वर शरीर को त्यागकर निर्वाण प्राप्त किया था।


Updated : 2012-11-12T05:30:00+05:30
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