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कानपुर में नहीं चलता जातिवाद, मुद्दों और लहर में होता है मतदान

कानपुर में नहीं चलता जातिवाद, मुद्दों और लहर में होता है मतदान

कानपुर। 17वीं लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और सभी पार्टी के उम्मीदवार मतदाताओं को रिझाने में जुटे हुए हैं। लेकिन कानपुर नगर सीट का इतिहास रहा है कि यहां का मतदाताओं ने कभी भी जातिवाद के चलते मतदान नहीं किया। यहां सदैव मुद्दों और लहर में वोट पड़े हैं, जिसके चलते मजदूर नेता एमएस बनर्जी ने निर्दलीय के तौर पर चार बार जीत दर्ज की। वहीं जातिवाद को लेकर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियां बसपा और सपा ने भरसक प्रयास किया पर उन्हे कभी भी सफलता नहीं मिल सकी।

कानपुर लोकसभा सीट का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां के मतदाताओं ने कभी भी जाति को आधार मानकर अपना प्रतिनिधि नहीं चुना। लगभग साढ़े पन्द्रह लाख मतदाताओं वाले कानपुर लोकसभा क्षेत्र को यहां के राजनीतिक गलियारे में जातिगत आबादी के आधार पर ब्राह्मण बहुल माना जाता है। अगर जातीय आंकड़े जेब में लेकर घूमने वाले नेताओं की मानें तो इस शहर में ब्राह्मण मतदाताओं की तादाद 30 से 35 फीसदी के बीच है। लेकिन 1952 के पहले ही आम लोकसभा चुनाव में यहां की जनता ने जातिवाद को तरजीह नहीं दी और हरिहरनाथ के माथे पर जीत का तिलक लगा दिया था।

इसके बाद मजदूर नेता एमएस बनर्जी ने चार बार लगातार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की। यही नहीं वह पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे और कानपुर में रहकर कानपुरवासी हो गये। इसके बाद यहां से कांग्रेस के नरेश चंद्र चतुर्वेदी जीते, जिसे जातीय आंकड़ेबाज अपने दृष्टिकोण से ''ब्राह्मण नेता की जीत' ठहराने का प्रयास करते हैं। जबकि हकीकत में चतुर्वेदी ने जातीय आधार पर खुले या गुपचुप तरीके से वोट कभी नहीं मांगे। उन्होंने चुनाव के मौके पर भी अपने नाम के आगे पंडित नहीं लिखा। 1984 में हुई उनकी जीत को एक बारगी यह माना भी जा सकता है कि वह 84 में इन्दिरा गांधी की हत्या के कारण उपजी देशव्यापी सहानुभूति की लहर में जीते।

इसी तरह चुनावी आंकड़ेबाज उनके अलावा दो अन्य नेताओं भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को ब्राह्मण मतों के आधार पर जीता बताने का प्रयास करते हैं। हकीकत में इन दोनों नेताओं ने ब्राह्मण के आधार पर कभी वोट नहीं मांगे। द्रोण की जीत अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. जोशी की जीत नरेन्द्र मोदी की लहर के चलते हुयी।

विधानसभा सीटों पर भी नहीं दिखती जातीयता

इसी तरह नगर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा सीटों की बात करें तो यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं शहर के अन्य जातियों के मतदाता भी कभी जातीय बंधन में नहीं बंधे। उदाहरण के तौर पर आज का आर्यनगर व पूर्व का जनरलगंज विधानसभा क्षेत्र वैश्य बहुल है, लेकिन यहां के वैश्य मतदाताओं ने भी कभी स्वजातीय उम्मीदवार को जिताने के लिये वोट नहीं किया। इसका परिणाम है कि इस विधानसभा क्षेत्र से सलिल विश्नोई के अलावा कभी किसी वैश्य प्रत्याशी को जीत हासिल नहीं हुयी। इस वैश्य बहुल सीट से जटाधर बाजपेयी, सुमनलता दीक्षित, रेवतीरमण रस्तोगी, वीरेन्द्र नाथ दीक्षित, नीरज चतुर्वेदी और बीते चुनाव में अमिताभ बाजपेयी आसानी से वैश्य मतदाताओं का समर्थन पाकर जीत दर्ज कराते रहे हैं।

ऐसे ही ब्राह्मण बहुल किदवईनगर (पूर्व में गोविंदनगर का हिस्सा) से बीते विधानसभा चुनाव से पहले लगातार तीन बार अजय कपूर व इसी क्षेत्र से पूर्व में भी गैर ब्राह्मण प्रत्याशियों की जीत का अर्थ तो यही है कि इस शहर का मतदाता कभी जाति बंधनों में नहीं बंधा। यही नहीं परिसीमन से पूर्व आर्यनगर विधानसभा मुस्लिम बहुल मानी जाती थी, लेकिन वहां से भी हमेशा मुस्लिम ही जीता हो, ऐसा नहीं रहा। सत्यदेव पचौरी जैसे भाजपा के नेता भी यहां से जीत दर्ज करा चुके हैं।

छावनी विधानसभा भी परिसीमन से पूर्व ब्राह्मण बहुल मानी जाती रही है, लेकिन यहां से कभी कांग्रेस के पशुपति नाथ मेहरोत्रा तो कभी भाजपा के सतीश महाना (पांच बार) की जीत यही साबित करती रही कि यहां के मतदाता के लिये जातीयता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण देश, प्रदेश या क्षेत्र के मुद्दे हैं।

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Swadesh Digital ( 10109 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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