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हिन्दी साहित्य के बड़े योद्धा पद्मश्री गिरिराज किशोर नहीं रहे

हिन्दी साहित्य के बड़े योद्धा पद्मश्री गिरिराज किशोर नहीं रहे

कानपुर। साहित्यकार, कथाकार, नाटककार और उपन्यासकार पद्मश्री गिरिराज किशोर नहीं रहे। रविवार सुबह करीब 10 बजे कानपुर के सूटरगंज स्थित आवास पर अंतिम सांसे लीं। वह अपने पीछे पत्नी, दो बेटी और एक बेटे का भरापूरा परिवार छोड़ गए। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जन्मे गिरिराज किशोर उपन्यासकार, कथाकार, नाटककार के अलावा सशक्त आलोचक रहे। उपन्यास ढाईघर के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। पहला गिरमिटिया के लिए केके बिरला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान से नवाजा गया। 23 मार्च 2007 को साहित्य और शिक्षा के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें देश के चौथे बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा।

8 जुलाई 1937 को मुजफ्फरनगर में जन्मे गिरिराज किशोर के पिता मुजफ्फरनगर के जमींदार थे। कम उम्र में ही घर छोड़ दिया और स्वतंत्र लेखन शुरू किया। कई सरकारी नौकरी की और छोड़ा लेकिन लेखन जारी रहा। आईआईटी रजिस्ट्रार पद से रिटायर होने के बाद 14 साल तक आईआईटी के रचनात्मक लेखन केंद्र के अध्यक्ष रहे। इसके बाद शहर के सूटरगंज स्थित घर पर भी उनका लेखन जारी रहा। रविवार सुबह करीब 10 बजे अचानक तबीयत बिगड़ी। परिवार के लोगों ने एंबुलेंस बुलाई लेकिन उससे पहले ही सांसे थम गईं। घर में पत्नी मीरा किशोर के अलावा बेटी जया, शिव और बेटा अनीश किशोर हैं। निधन की सूचना पर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया। शहर के बड़े साहित्यकार, पत्रकार, जनप्रतिनिधि और आम लोगों ने श्रद्धांजलि दी। उनका देहदान सोमवार को सुबह 10 बजे होगा।

चेहरे-चेहरे किसके चेहरे नाटक के लिए यूपी हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेंदु सम्मान

यूपी हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान

यूपी हिन्दी संस्थान का साहित्यभूषण सम्मान

भारतीय भाषा परिषद का शतदल सम्मान

23 मार्च 2007 में देश का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म श्री से नावाजा गया

संप्रति

मास्टर आफ सोशल वर्क में 1960 में आगरा विश्वविद्यालय से डिग्री ली

1960 से 1964 तक प्रदेश में सेवायोजन अधिकारी व प्रोबेशन अधिकारी रहे

1964 से 66 तक इलाहाबाद में स्वतंत्र लेखन

1966 से 1975 तक कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक और उप कुलसचिव रहे

1975 से 1983 तक आईआईटी कानपुर में कुलसचिव रहे

1983 से 1997 तक आईआईजी में रचनात्मक लेखन केंद्र के अध्यक्ष रहे

एक जुलाई 1997 को सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन जारी रहा

कहानी संग्रह : नीम के फूल, चार मोती बेआब, पेपरवेट, रिश्ता, शहर-दरशहर, हम प्यार कर लें, जगत्तारनी, वल्द रोजी, यह देह किसकी ? मेरी राजनीतिक कहानियां, हमारे मालिक सबके मालिक

उपन्यास : ढाईघर, लोग, चिड़ियाघर, इंद्र सुनें, दावेदार, तीसरी सत्ता, यथा प्रत्तावित, असलाह, अंर्तध्वंस, यातनाघर के अलावा 8 लघु उपन्यास अष्टाचक्र के नाम से प्रकाशित हुए

पहला गिरमिटिया को व्यास सम्मान मिला। यह उपन्यास गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका यात्रा के अनुभव पर आधारित है।

नाटक : नरमेध, प्रजा ही रहने दो, केवल मेरा नाम लो, जुर्म आयद, काठ की तोप, (लघु नाटक) मोहन का दुख (बच्चों के लिए)

निबंध : संवादसेतु, लिखने का तर्क, सरोकार, कथ-अकथ, समपर्णी, एक जनसभा की त्रासदी, जन-जन सनसत्ता

फेलोशिप और उपाधि

संस्कृति मंत्रालय में 1998-1999 तक एमेरिट्स फेलोशिप

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास शिमला में मई 1999-2001 तक फेलोशिप

23 मार्च 2007 को राष्ट्रति ने साहित्य और शिक्षा के लिए पद्म श्री से विभूषित किया

2002 में छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय से डीलिट की मानद उपाधि

साहित्य अकादमी नई दिल्ली के कार्यकारिणी सदस्य रहे

हिन्दी सलाहकार समिति रेलवे बोर्ड के सदस्य रहे

स्वतंत्र लेखन और आकार का संपादन किया

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Swadesh Digital ( 0 )

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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