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एनकाउंटर से तिलमिलाये लोगों की बेटियों के साथ ऐसा हुआ होता तो?

विजय कुमार गुप्ता

मथुरा। हैदराबाद में पुलिसकर्मियों द्वारा अपना कर्तव्य निभाकर जनता के दिलों को जीत लिया है। वहीं कुछ लोग इससे तिलमिला उठे हैं और न्याय प्रक्रिया से दंड दिये जाने का प्रलाप कर रहे हैं। अगर इनकी बेटियों के साथ ऐसा वीभत्स कांड हुआ होता तो क्या वे तब भी यही रवैया अपनाते? शायद नहीं।

न्याय प्रक्रिया के द्वारा दंड दिये जाने का रोना रोना वालों से पूछा जाये कि निर्भया कांड को आज कितना लंबा अरसा हो गया। आज तक उन्हें फांसी नहीं दी जा सकी। उससे भी ज्यादा न्याय प्रक्रिया की हास्यास्प्रद बात यह है कि जिस मुस्टंडे ने सबसे ज्यादा हैवानियत की, उसे नाबालिग होने का हवाला देकर बरी कर दिया गया और तो और उस पिशाच को न्यायालय द्वारा पुलिस सुरक्षा भी दे दी गयी।

आखिर यह कैसा कानून है जो ऐसे नीचे पिशाचों को सजा तो दूर, संरक्षण और देता है कि शाबास बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया, मौज करो। तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी भी हम लेते हैं। नाबालिग कहलाने वाला यह चांडाल पुलिस कस्टडी में जब न्यायालय आता था तब हंस-हंस कर खूब मटकता था और इतरा-इतरा कर हिजड़ों की तरह नाचता था। यह बात समाचार पत्रों में खूब छपी थी।

इस न्याय प्रक्रिया का प्रलाप करने वालों के पास इस बात का कोई जबाव है कि एक नहीं अनेक ऐसे जघन्य कांड करने वालों को फांसी क्यों नहीं हो पा रही। देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारे अभी भी सुरक्षित जीवन काट रहे हैं। विवाह-शादियों के नाम पर पैरोल के द्वारा बाहर आ जाते हैं।

कुछ लोग मानवाधिकार के नाम पर जो रोना रो रहे हैं। उन्हंे इस बात का उत्तर देना चाहिये कि मानवाधिकार इन नरपिशाचों के लिये ज्यादा जरूरी है या उस बेचारी अबला महिला चिकित्सक के लिये? जब उस बेचारी के साथ पैशाचिक हैवानियत हो रही होगी, तब क्या बीत रही होगी उस पर और जब उसे जिंदा जलाया जा रहा होगा तब कैसे तड़प-तड़प कर उसकी जान निकली होगी? धिक्कार है ऐसे लोगों को। बल्कि ऐसा होना चाहिये कि जो लोग उन चारों नराधमों के मरने का प्रलाप कर रहे हैं। उनके विरुद्ध कानून का शिकंजा कसा जाना चाहिये।

सऊदी अरब में ऐसों को चैराहे पर तुरंत मार दिया जाता है

सऊदी अरब में ऐसे जघन्य अपराधियों को सार्वजनिक रूप से तुरंत गोलियों से भून कर मार दिया जाता हैं। यही कारण है कि वहां अपराध नाम मात्र के होते हैं।

विश्व में और भी कई देश ऐसे हैं जहां जघन्य अपराध करने वालों को कठोर से कठोर सजा दी जाती है। यदि अपराध बड़ा हो तो फांसी निश्चित है। इसी वजह से उन देशों में लोग अपराध करने से पहले सौ बार सोचते हैं।

जो लोग मानवीयता का हवाला देकर फांसी की सजा का विरोध करते हैं। उन्हें यह सोचना चाहिये कि जब यहां फांसी की सजा का प्रावधान है तब तो यह हाल हो रहा है और जब फांसी की सजा ही बंद हो जायेगी तब तो देश अराजकता के गर्त में समा जायेगा तथा आजीवन कैद के नाम पर जीवन भर सरकार इन नरपिशाचों का खर्चा और उठायेगी। जेल में रखने का मतलब है जनता की गाड़ी कमाई से जिंदगी भर इन नराधमों की मेहमानबाजी हो।

धन्य हैं वे पुलिस वाले जिन्होंने एनकाउंटर किया और धिक्कार है उनको जो छाती पीट कर प्रलाप कर रहे हैं।

स्वदेश मथुरा ( 0 )

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