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राजनीति का अखाड़ा बना बीएसए काॅलेजः नाम और नामे के खेल में छात्रों के हित ताक पर, पढ़ाई लिखाई चौपट

बीएसए काॅलेज विवाद ने कराई अग्रवाल समाज की फजीहत, फिजां में तैर रही है तरह-तरह की चर्चाएं

राजनीति का अखाड़ा बना बीएसए काॅलेजः नाम और नामे के खेल में छात्रों के हित ताक पर, पढ़ाई लिखाई चौपट

मथुरा। नगर की सर्वाधिक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्था बीएसए कालेज का विवाद दिन प्रति दिन उलझता जा रहा है और छात्रों की पढाई लिखाई चैपट है। प्राचार्य सुमन कुमार और प्रबन्धक श्याम सुन्दर बंसल की लड़ाई से परेशान कुलपति त्रिपाठी और आगरा स्थित उच्च शिक्षा अधिकारी कालेज की बागडोर केआर डिग्री कालेज की तरह जिला अधिकारी को कभी भी सौंपने का फैसला ले सकते हैं। सरकारी खजाने से बिना व्यवधान के ऊँचे वेतनमान की पगार लेने वाले शिक्षकों की दिलचस्पी इस लड़ाई को हवा देने में है। शिक्षकों की बेरूखी और छात्रों की उदासीनता से कालेज की कक्षाएँ खाली पड़ी है।

जानकार सूत्रों के मुताबिक बीएसए कालेज में उपजे इस बेतुके विवाद की जड़ धन है। प्रबन्धक श्याम सुंदर बंसल ने एक पखवाड़े पूर्व प्राचार्य सुमन कुमार को निलंबित करने के बाद उन पर आर्थिक अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। इसी प्रकार प्राचार्य सुमन कुमार ने पिछले दिनों कुर्सी पर फिर से बैठने के बाद प्रवन्धक बंसल पर आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं।

मालूम हो निलंबित होने के बाद प्राचार्य सुमन कुमार को विवि के अन्य कालेजों के प्राचार्यों, कुलपति और संघ के नेताओं ने समर्थन दिया था और प्रबंधक बंसल अलग-थलग पड़ गए थे, यहाँ तक अग्रवाल शिक्षा मंडल के सदस्य भी गुपचुप तरीके से निलंबित प्राचार्य को सलाह-मशवरा देकर अपने ही साथी बंसल को नीचा दिखाने में मशगूल बताये गए थे। शिक्षा मंडल में जबरदस्त गुटबाजी चरम पर बताई जा रही है।

मजेदार खबर यह है अग्रवाल शिक्षा मंडल की इस स्तरहीन गुटबाजी का इल्म श्याम सुन्दर बंसल को भी है। सूत्रों के मुताबिक एक जमाने में शहर में बेहतरीन उच्च शिक्षा संस्थान माना जाने वाले बीएसए कालेज में जब स्ववित्त पोषित कक्षाओं की नीव पड़ी और इंजीनियरिंग कालेज की शुरूआत हुई तभी से कालेज में तरह तरह के विवाद शुरू हुए। कालेज में छात्रों की फीस से धन की आमद बेहद बढ़ गई और शिक्षा मंडल के व्यापारी सदस्यों में कालेज के मंत्री या अध्यक्ष बनने की लिप्सा ने जन्म ले लिया।

मालूम हो कालेज के मंत्री या अध्यक्ष को करोड़ों रूपये खर्च करने, अपने चहेतों को नौकरी देने और बिना श्रम के शहर के प्रमुख लोगों से ताल्लुकात बढ़ाने का आनंद मिलना शुरू हो जाता है। करोड़ों खर्च करने वाले मंत्री की कहीं भी, कभी भी कोई जबाबदेही नहीं होती है। श्री बंसल के विरोधी बने प्राचार्य सुमन ने इसी मौके का लाभ उठाते हुए बंसल पर करोड़ों के लेन देन पर सवाल उठाये हैं।

एक कालेज शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कालेज में बिल्डिंग निर्माण में प्रबन्धक की सर्वाधिक रूचि रहती है। बीएसए कालेज में गल्र्स कालेज के नाम पर बिल्डिंग बनाई गई, करोड़ों खर्च हुए लेकिन इस खर्चे को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया। पूर्व प्राचार्य और कुछ शिक्षकों ने अतिरिक्त लाभ बटोरा तो मामला आज भी दबा-ढका है। इसी प्रकार पिछले दस साल में करोड़ों रूपये यूजीसी, दिल्ली से कम्यूटर, प्रिंटर, फोटोस्टेट मशीन आदि की खरीद के लिए मिले। इस अनुदान का क्या हुआ, प्राचार्य और प्रबंधक के अलावा किसी अन्य को नहीं मालूम। कुछ दिनों निलंबन का दर्द झेलने वाले प्राचार्य सुमन कुमार के सीने में ऐसे तमाम रहस्यों की फेहरिस्त हिलोर ले रही है। चर्चा है प्रबंधक से उनकी जंग दूर तलक गई तो ये राज सीने से बाहर जरूर आएंगे।

जानकारी के मुताबिक इस कालेज में जब-जब भौतिक सुख सुविधाओं के बंटबारे को लेकर प्रबंधक और प्राचार्य में नहीं पटी, दोनों की लड़ाई उजागर हो गई और सर फुटव्वल की नौबत आ गई। ऊँचे वेतनधारी शिक्षकों को किसी एक के पाले में जाकर अपने निजी हित साधने में देर नहीं लगती। प्रबंधक बंसल ने एक दशक पूर्व प्राचार्य वीरेंद्र मिश्रा को भी प्रबंधक की पोल खोलने पर निलंबित किया था। तब भी श्री बंसल को अपमान झेलना पड़ा था। बीएसए कालेज में एक दशक पहले का इतिहास एक बार फिर दोहराया गया है। प्राचार्य नया है लेकिन प्रबंधक वही हैं श्याम सुन्दर बंसल।

नगर के बुद्धिजीवियों की अपील है कि छात्र हित में कालेज में रिसीवर यानि नियंत्रक का नियुक्त किया जाना जरूरी है ताकि छात्रों के फीस के पैसे छात्र हित में ही खर्च हो सके, न कि निजी लोगों की शान शौकत और जलबे पर।

नोटबंदी, जीएसटी के बाद राजनीति का अखाड़ा बन गया शिक्षा मंडल

एक और दिलचस्प बात ये है कि जब से देश में नोटबंदी और जीएसटी लागू हुई है तब से करोड़ों की संपत्ति वाला अग्रवाल शिक्षा मंडल राजनीति का बड़ा अखाड़ा बन गया है। उसकी ठोस वजह भी है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद अग्रवाल समाज के कई धनाढ्य लोग कर्ज के बोझ तले दबे है। ऐसे में उनकी निगाह अग्रवाल शिक्षा मंडल की संपत्ति और इसकी संस्थाओं से होने वाली आमदनी पर टिक गई है। ये ही वजह है कि कभी समाज के लिए बड़ा योगदान देने वाला अग्रवाल समाज आज राजनीति का अखाड़ा बन गया है, गुटबाजी हावी है। संस्था में पदों को हथियाने की होड़ लगी है, पद न हासिल होने पर एक दूसरे को नीचा दिखाने की जिंग छिड़ी है।

स्वदेश मथुरा ( 0 )

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