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अपने ही बुने जाल में फंस गईं बहनजी

वक्त के साथ खुद को ढ़ाल नहीं पाई मायावती

अपने ही बुने जाल में फंस गईं बहनजी

नई दिल्ली/स्वदेश वेब डेस्क। राजनीति में वक्त की नजाकत और जनता की नब्ज की जिसे पहचान हो, सही मायने में नेता वही कहलाता है। रूढ़वादिता और हठधर्मिता कभी-कभी व्यक्ति को काफी पीछे कर देती है। जिस दल में सामूहिक निर्णयशीलता न हो उसे दलदल में जाने से कोई नहीं रोक सकता। और फिर अर्श से फर्श पर आने में देर नहीं लगती। आजकल बसपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। कभी दलितों के नाम पर राजनीति करने वाली मायावती फर्श से अर्श तक पहुंची थीं तो आज उन्हें व उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी के अपने वजूद के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 2014 के आम चुनाव में शून्य के धरातल पर पहुंच जाने के बाद मायावती ने 2019 में अवसरवाद की राजनीति को हवा देते हुए सपा के साथ एक बेमेल सा गठबंधन करके अपनी गिरती साख को बचाने का दुस्साहस किया था। इस नए और अनूठे प्रयोग से वे कुछ सीटें तो बचा ले गई पर इस कदम से उन्होंने अपने भविष्य की राजनीति पर सवालिया निशान जरूर लगा लिए हैं। मायावती दोबारा अपना राजनीतिक रसूख बना पाएंगी या मोदी-शाह के रचे गए तिलिस्म में खो जाएंगी। वैसे भी राज्य में बसपा की जमीन काफी हद तक बंजर हो चुकी है। जिन जनाधार वाले नेताओं ने बसपा को पल्लवित किया, उनमें ज्यादातर नेता तड़ीपार हो गए। बसपा में आज कोई भी ऐसा नेता नहीं जो मायावती को चुनौती दे सके। यही कारण है कि मायावती पार्टी में सर्वेसर्वा है और अकेली नेता। वरना, एक समय था जब बसपा में एक से बढ़कर ऐ नेता थे जो विपक्षी दलों में धमाल मचा देते थे। बाबूलाल कुशवाहा, रामवीर उपाध्याय, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, तिलक यादव, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे ताकतवर नेताओं ने मायावती को बार-बार उत्तर प्रदेश का सिरमौर बनवाया। उनके अड़ियल रवैये, हठवादिता और अधिनायकवाद के चलते बड़े-बड़े नेता पार्टी से एक-एक करके जमीन छोड़ते गए। उनके जमीन छोड़ते ही बसपा की जमीन आज बंजर हो गई है। मायावती ने हाल ही में अपने भाई आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाया था। यानि मायावती सहित उनके उत्तराधिकारियों के अलावा बाकी जितने भी नेता हैं वे सब के सब आम कार्यकर्ताओं की श्रेणी में गिने जाएंगे।

गुरूवार को इन्हीं आनंद कुमार की गौतमबुद्ध नगर में बेनाम संपत्ति को आयकर विभाग ने निशाना बनाया। आयकर विभाग ने इस बेनाम चार सौ करोड़ की संपत्ति वाले भूखंड पर कब्जा कर लिया है। दिल्ली स्थित बेनामी निषेध इकाई ने 16 जुलाई को 28328.07 वर्ग मीटर के इस सात एकड़ के भूखंड को जब्त करने का आदेश दिया था। आयकर विभाग की इस कार्यवाही के साथ ही मायावती और उनके भाई आनंद कुमार पर सीधे तौर पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़ते नजर आ रहे हैं। सवाल है कि आखिर एक क्लर्क के पद पर रहते अति साधारण से व्यक्ति आंनद के पास कैसे इतनी अकूत संपत्ति आई? कोई पैत्रिक संपत्ति नहीं होने के बावजूद राजसी ठाठ और आलीशान रहन-सहन ने मायावती व उनके परिजनों की निजी जिंदगी की हकीकत अब प्याज के छिलकों की तरह उतरती नजर आ रही है। भ्रष्टाचार के द्वारा इस तरह अकूत संपत्ति बनाकर उसे दूसरे के नाम दिखाकर मायावती का फैलाया गया जाल अब उन्हीं के गले पड़ता नजर आ रहा है। आज दलितों की ही सकरी गलियों व सघन इलाकों के चैराहों व नुक्कड़ो पर दलित वर्ग के लोग पूछ रहे हैं कि उनकी गरीबी का मजाक उड़ाकर अपना घर बनाने वाली बहिन जी के पास इतनी अकूत संपत्ति कैसे और कहां से आ गई? अब यह आम जन को भी पता है कि मायावती पर आयकर विभाग का शिकंजा कसने के बाद कार्रवाई हुई तो वे न केवल सात साल के लिए जेल जाएंगी बल्कि उन पर कुल संपत्ति का 25 प्रतिशत जुर्माना भी वसूला जाएगा।

बसपा के जन्म से लेकर उसके उत्थान तक पार्टी के जन्मदाता कांशीराम भरोसे का प्रतीक बने रहे। मायावती उनकी अनुचर थीं और बहन जी दलितों को उच्च वर्ग के खिलाफ मनुवादी साये से दूर रखने की कवायद मे ंलगी रहीं। उन्होंने एक ऐसे वर्ग विशेष को राजनीति का ढ़ाल बनाया, जो आंख बांधकर लंबे समय तक उनके पद चिन्हों पर चलता रहा हो। भूख और गरीबी से पार पाने की उम्मीद में यह वर्ग वहीं खड़ा नजर आ रहा है जबकि उसे न्याय व रास्ता दिखाने वाली बहन जी कहीं दूर जाकर ऐसे आसन पर विराजमान हो गई जहां तक उस गरीब का पहुंच पाना, मानो दिवास्वप्न ही होगा।

कांशीराम से पार्टी हथियाने के बाद मायावती ने जिस तरह बसपा में अपने चाल और चलन की छाप छोड़ी, उससे बसपा दलितों की पार्टी न रहकर महज बहन मायावती की जागीर बनकर रह गई। तभी मायावती ने एक-एक करके पार्टी के प्रमुख कददावर नेताओं को किनारे लगाया ताकि उन्हें कोई चुनौती न दे सके। मोदी सरकार की प्रचंड वापसी बताती है कि उत्तर प्रदेश में दलितों ने बसपा में तेजी से पनपते दलित ब्राहम्णवाद के विरोध में भाजपा और नरेंद्र मोदी को वोट दिया। कल तक जो दलित समाज मायावती का अनुगामी था, अब शिक्षित दलित समाज काफी कुछ समझने के बाद भाजपा और नरें्रद मोदी में अपना भरोसा व्यक्त कर रहा है। कभी पार्टी को चंदा के नाम पर तो कभी जन्मदिन पर मिलने वाली बेशुमार खैरात बटोरकर मायावती खुद को ऐसे प्रस्तुत करती रहीं, मानो वो इंद्रासन से उतरने वाली कोई अप्सरा हों। जन्मदिन पर मिलने वाले महंगे व वेशकीमती उपहार उनके अधिनायकवाद को जैसे और हवा देने का काम करते रहे। सत्ता में आने के बाद मायावती ने उसी समाज से दूरियां, बढ़ाई जिसने उन्हें सर-आंखों पर बिठाकर बहनजी से नवाजा। आज दलित समाज दलित ही रह गया और गरीब, गरीब।

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