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नुक्स निकालते हैं वो इस कदर मुझ में...!

और राज्याभिषेक हो गया।

नुक्स निकालते हैं वो इस कदर मुझ में...!

मुम्बई में अनेक ऐतिहासिक भूमिकाओं के गवाह क्रांति का जज्बा देने वाला शिवाजी मैदान स्वार्थ , लोलुपता और अवसरवादिता की दुरभिसंधि का साक्षी बन गया।

लोकतंत्र के प्रति षड़यंत्रों की तुरपन ने इसमें जनता की विवशता की सिलाई को उधेड़ दिया। प्रहसन पर प्रहसन। लालचभरे कार्यों , धोखे और विश्वासघात आम जीवन का हिस्सा होते जा रहे हैं अब।

नैतिक मूल्य , निस्वार्थ समाज सेवा , मैत्री और भाईचारे के अर्थ विद्रूप होते जा रहे हैं।

असहनशीलता सहनशीलता का पर्याय बनती जा रही है। सब कुछ गड्डमड्ड हो रहा है। एक सुनिश्चित विचारधारा वाले दल के लिए अब एक नया शब्द सामने आ रहा है ' सेकुलर फलां और सेकुलर ढिकां.... ' यह शब्द गढ़कर उन लोगों ने ऐसे लोगों को गले लगा लिया जो अब तक इन्हें पानी पी - पीकर कोसते रहे हैं। अब वे ही एक दूसरे को वैसाखी बनाकर अपनी सांसों में ताजा आक्सीजन आने का आनंद ले रहे हैं।

वाह जी ! जो पहले कट्टर दुश्मन होते थे वे अब वे गलबहियां डाले जश्न मना रहे हैं , जो दोस्त ही नहीं , दोस्ती की मिसाल थे वे ही अब बेगाने हो रहे हैं। क्या जमाना आ गया , उनका गठबंधन था इनसे , इन्हें कोई और भा गया ।

झगड़े का कारण भी मजेदार है -- जो चांद उनके लिए जनता ने तय किया गया था उस पर इनका मन आ गया । उनने अपनी बात कही तो बुरा मान गए। चले गए उसकी गोदी में जिसे अभी तक गंदा , गलत , अस्पृश्य मानते रहे , चरण चुंबन करने लग गए हैं। जो अब तक अपने थे उनके विरूद्ध मुंह ही नहीं फ्रंट खोले जा रहे हैं।

इधर ये सोच रहे हैं ----

*नुक्स निकालते हैं वो इस कदर मुझ में.......,*

*जैसे उन्हें खुदा चाहिए था और हम इंसान निकले !*

आज के युग में तो अपना स्वार्थ ही व्यक्ति के लिए खुदा हो गया है। पूरा हुआ तो जय जय नहीं हो पाया तो तुम कौन और हम कौन ?

लगता है कि हम ऐसे समय में रह रहे हैं जहां निज स्वार्थ के सामने सम्बन्धों का कोई महत्व नहीं है। बात बनी तो काकाजी , नहीं मानो तो हम आपको जानते ही नहीं जी। इस तरह से भिड़े दोनों कि लेने के देने पड़ गए। नतीजा जो हम सब देख रहे हैं।

कार्टून बनाने वाले का बेटा कार्टून बनकर इतरा रहा है। उसे चने के झाड़ पर चढ़ानेवालेे गाल बजा रहे हैं। जिनके पास रिमोट रखा है उन्हें इसी मस्ती में आनंद आ रहा है । कई प्रज्ञावान प्राणी प्रज्ञा हीन हो रहे रहे हैं। कलियुग का प्रभाव है शायद। तभी तो यह स्वर गूंज रहे हैं --- "" दोस्त दोस्त ना रहा "" ।

( तूणीर - नवल गर्ग )

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