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तीन तलाक असमंजस : कांग्रेस की उगलत बने, न लीलत केरी वाली स्थिति

विशेष प्रतिनिधि

तीन तलाक असमंजस : कांग्रेस की उगलत बने, न लीलत केरी वाली स्थिति

नई दिल्ली। दोबारा सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की कुप्रथा से बाहर निकालने के संकल्प को पूरा करने एक बार फिर लोकसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 को पेश किया गया। बिल पेश नहीं हो, इसके लिए विपक्ष द्वारा फिर अड़ंगा लगाया गया। विपक्ष को मत-विभाजन की मांग पर मुंह की खानी पड़ी। यह बिल 74 के मुकाबले 186 मतों के समर्थन से पेश हुआ। तीन तलाक को लेकर कांग्रेस असमंजस में दिखी। वहीं सांसद असदुद्दीन ओवैसी भी इस बार अलग-थलग पड़ गए हैं।

बिल पेश किए जाने के दौरान सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफ कहा कि 70 साल बाद क्या संसद को तीन तलाक से पीडि़त महिलाओं के न्याय की गुहार को नहीं सुनना चाहिए। वहीं सांसद असदुद्दीन ओवैसी द्वारा बिल को मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ करार देने वाला राग अलापा गया। कानून मंत्री ने इस बिल को मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा का बताते हुए कहा कि 70 साल बाद क्या संसद को नहीं सोचना चाहिए कि तीन तलाक से पीडि़त महिलाएं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी न्याय की गुहार लगाती रहें। क्या उन्हें न्याय नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने सदन में तीन तलाक के मामलों की फेहरिस्त रखते हुए कहा कि 2017 से जो 543 केस तीन तलाक के मामले आए उसमें 239 सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आए हैं। कानून मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा अध्यादेश लाने के बाद 31 मामलों का सामने आना क्या प्रदर्शित करता है। उन्होंने कहा कि इसीलिए हमारी सरकार महिलाओं के सम्मान और गरिमा के साथ है। रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हम संसद हैं कानून बनाना हमारा काम है। अदालत का काम कानून को इन्टरप्रेट करना है, संसद को अदालत मत बनाइए। तीन तलाक को लेकर कांग्रेस असमंजस में दिखी। वह न विरोध कर पा रही थी, न समर्थन। लिहाजा, पार्टी की तरफ से कूटनीतिक असहमति जताई गई। सदन में कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि मैं तीन तलाक का समर्थन नहीं करता, लेकिन इस बिल के विरोध में हूं। यह बिल संविधान के खिलाफ है, इसमें सिविल और क्रिमिनल कानून को मिला दिया गया है। ओवैसी द्वारा विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी गैर मुस्लिम पर इस मामले में केस होता है तो उसे एक साल की सजा होती है लेकिन मुसलमान को तीन साल की सजा का प्रावधान क्या अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन नहीं है। ओवैसी द्वारा तलाक के बाद मुस्लिम महिला को गुजारा-भत्ता देने का सवाल भी खड़ा किया गया।

लोकसभा में पिछली बार यह विधेयक पारित हो गया था। लेकिन सोलहवीं लोकसकाा का कार्यकाल खत्म होने के कारण और राज्यसभा में लंबित रहने के कारण यह निष्प्रभावी हो गया। अब सरकार इसे दोबारा सदन में लेकर आई है। मोदी सरकार द्वारा सितंबर 2018 और फरवरी 2019 में 2 बार तीन तलाक पर अध्यादेश जारी किया था, क्योंकि यह राज्यसभा से पारित नहीं हो सका था। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई तो यह अध्यादेश की जगह ले लेगा। इस विधेयक के तहत मुस्लिम महिलाओं को एक बार में तीन तलाक कहकर वैवाहिक संबंध समाप्त करना गैरकानूनी होगा। विधेयक में ऐसा करने वाले पति के लिए तीन साल के कारावास और जुर्माना की सजा का प्रावधान प्रस्तावित है।




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