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सामाजिक जारूकता ही है स्वस्थ गणतंत्र की आधारशिला

अम्बुज भारद्वाज

सामाजिक जारूकता ही है स्वस्थ गणतंत्र की आधारशिला

सामाजिक जारूकता ही है स्वस्थ गणतंत्र की आधारशिला।देश अपना 71वां गणतंत्र मना रहा है। आज से ठीक 70 वर्ष पूर्व 1950 में लंबे विचार-विमर्ष के बाद जिस संविधान को पूरे देश में लागू किया गया था, उसका प्रमुख उद्देश्य ही एक स्वस्थ, प्रगतिशील, न्यायप्रिय गणतांत्रिक राज्य की स्थापना थी। कई दशकों बाद आज जब भारत की आजादी पश्चात की यात्रा का विश्लेषण किया जाएगा तो निश्चित ही इसे उन उम्मीदों पर खड़ा पाया जाएगा, जिसकी कल्पना गांधी, अम्बेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं ने की थी। आज जिस भारतीय गणतंत्र की चर्चा वैश्विक स्तर पर होती है उसके पीछे हमारे गणतंत्र की विशेषता और हमारे देश की जनता का खुला गणतांत्रिक विचार है। गणतंत्र सिर्फ कागजोंपर नहीं होता, गणतंत्र सड़कों पर होता है, समाज में होता है, न्यायपालिका में होता है, गणतंत्र देश की जनता के विचार और सोच में होता है, गणतंत्र जनता के साथ-साथ सत्ता वर्ग की शासकीय प्रणाली में होता है और गणतंत्र एक-एक जनमानस के व्यवहारमें होता है। एक स्वस्थ गणतंत्र की स्थापना अकेले का कार्य नहीं होता, इसकी स्थापना की जिम्मेदारी सत्ता वर्ग और जनता वर्ग दोनों की सामूहिक रूप से होती है, और इस जिम्मेदारी पर कुछ एक सत्ताधीश छोड़कर सभी खड़े उतरते आये हैं। भारत का गणतंत्र इसलिए भी महान माना जाता है, क्योंकि यह जनकल्याण का गणतंत्र है, यह सामूहिक जिम्मेदारी का गणतंत्र है, यह सशक्तिकरण का गणतंत्र है, यह खुले विचारों का गणतंत्र है, यह सम्पूर्ण विश्व को अपना मानने का गणतंत्र है, यह मानव कल्याण का गणतंत्र है, यह राष्ट्र प्रथम की भावनाओं से ओतप्रोत गणतंत्र है।

लेकिन इन सभी तथ्यों के बीच गणतंत्र की राह में आये संघर्षों से और उस संघर्ष के दौर में स्तंभ की तरह खड़े होकर लड़ने और इसे पुनर्स्थापित करने वालों की चर्चा करना भी आवश्यक है। भारतीय गणतांत्रिक इतिहास के सबसे काले दिन 25 जून 1975 को भी याद करना आवश्यक है जब उस वक़्त की इंदिरा सरकार ने लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकार और जनभावना को कुचलते हुए देश में आपातकाल लागू कर दिया। लेकिन दो वर्षों के लगातार संघर्ष से जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी,जॉर्ज फ़्र्नाडीज़ की मदद से इसकी पुनर्स्थापना हो पाई।

इसके इतर भारतीय गणतंत्र को एक ऐसे रूप में भी देखा जाता है जहां सभी के पास समान अवसर हों, जहां कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपने जिम्मेदारियों का सही रूप में निर्वहन करे, समाज की पंक्ति में सबसे अंत में खड़ा व्यक्ति को भी न्याय मिले, जहां चुनी हुई सरकार जनता के सामाजिक, आर्थिक हितों की रक्षा करे। लेकिन आंतरिक रूप से देखने पर पता चलता है की हाल के दिनों में भारतीय गणतंत्र को खोखला करने और इसकी जड़ें कमजोर करने का प्रयास किया गया है। एक आदर्श गणतंत्र दो स्तंभों पर टिका होता है, एक सामाजिक रूप से जागरूक जनता और दूसरा राजनीतिक पार्टी के नेता। जागरूक जनता ही एक अच्छे राजनीतिक पार्टी के नेताओं की सहायता से एक सशक्त गणतंत्र की नींव रख सकता है। लेकिन निजी स्वार्थ और किसी भी स्तर पर जाकर सत्ता पाने की जिद ने राजनीतिक पार्टियों की साख को बट्टा लगा दिया है। सत्ता प्राप्ति के बाद कुछ पार्टी और नेता धन और पद के पीछे पड़ जाते हैं, इसी कारण धीरे-धीरे उनमें जनता का विश्वास कम होता जा रहा है। ऐसा कई बार प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है की दिन-रात लोकतंत्र को बचाने की रट लगाने वाले की स्वयं की पार्टियां और संगठनों का स्वरूप अलोकतांत्रिक होता जा रहा है। संविधान, कानून और चुनाव आयोग जैसे मजबूत नियामक प्रणाली होने के बावजूद भी राजनीतिक पार्टियों के नेता कई बार अपने ही कार्यकर्ताओं और जनता की भावनाओं को नजरअंदाज करते हुए स्वहित साधने में संलिप्त रहते हैं और सत्ता भोग के लिए विपरीत विचारधाराओं की पार्टियों से जाकर समझौता कर बैठते हैं और इसलिए चुनावों में ऐसे दलों को जनता सबक भी सिखाती रहती है।

ऐसी पार्टियां और उसके नेतागण कभी भी लोकहित की रक्षा नहीं कर सकते , इसके उलट लोकहित को ही अपनी रक्षा ऐसे पार्टियों और नेताओं से करना पड़ता है, और लोकहित की रक्षा तभी होगी जब हम और हमारा समाज जागरूक, सशक्त और शिक्षित होगा। इसी सम्बंध में संविधान निर्माता कहे जाने वाले बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की एक कथन मुझे याद आती है। उन्होंने कहा था "बिना चरित्र और बिना विनम्रता, शिक्षित राजनीतिक व्यक्ति जानवर से ज्यादा खतरनाक है। यह समाज के लिए अभिशाप होगा।"

इसलिए अब जरूरी है की स्वस्थ गणतंत्र की आधारशिला रखने के लिए जनता स्वयं को जागरूक रखे साथ ही राष्ट्र के उत्थान और पतन के विचारों में अंतर करना और उससे जुड़े लोगों को चिन्हित करना सीखे।

छात्र, पत्रकारिता, द्वितीय वर्ष

दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म

दिल्ली विश्वविद्यालय

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स्वदेश वेब डेस्क ( 0 )

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