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संविधान के सनातन स्तंभ और सेक्युलरिज्म की राजनीति

गणतंत्र दिवस विशेष

संविधान के सनातन स्तंभ और सेक्युलरिज्म की राजनीति

- डॉ. अजय खेमरिया

देश भर में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में लोग सड़कों पर संविधान की किताब,बाबासाहब अंबेडकर की तस्वीर और तिरंगा लेकर आंदोलन कर रहे है।इस दलील के साथ कि मौजूदा केंद्र सरकार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के रास्ते पर ले जा रही है। क्या वाकई भारत का संविधान हिन्दू धर्म से निरपेक्ष होकर बनाया गया था?क्या हिन्दू सनातन प्रतीकों और मानबिन्दुओं से हमारा संविधान उस प्रतिक्रियावादी दूरी को बनाकर चलता है जैसा शाहीन बाग या जेएनयू औऱ एमएमयू के आंदोलनकारियों के प्रलाप में सुनाई देता है।इस सवाल को सेक्यूलरिज्म के आलोक में विश्लेषित किये जाने की आवश्यकता है ।क्योंकि मूल संविधान की इबारत में तो यह अवधारणा कहीं थी ही नही ।इसे तो 1976 में प्रस्तावना में जोड़ा गया है।यहां सवाल उठाया जाना चाहिये कि जिस दलित चेतना के नाम पर अक्सर संविधान को बाबा साहब अंबेडकर की अस्मिता के साथ जोड़ा जाता है क्या उसके साथ बुनियादी खिलवाड़ 1976 में ही नही हो गया है।दलित वर्ग को यह भय अक्सर दिखाया जाता रहा है कि कतिपय मनुवादी तत्व बाबा साहब के बनाये संविधान को बदलना चाहते है। लेकिन कभी इस विमर्श को नही खड़ा किया जाता कि मूल संविधान के साथ बुनियादी छेड़छाड़ क्यों और किस मानसिकता के साथ1976 में की गई है? क्या मौलिक रूप से भारत का संविधान उस हिन्दू जीवन दृष्टि से गणराज्यीय तंत्र को दूर रहने की हिदायत देता है क्या?अगर हम मूल संविधान के पन्नों को पलटते है तो हमें उसमें सुविख्यात चित्रकार नन्दलाल बोस की कूची से बनाये हुए कुल 22 चित्र नजर आते है।इन चित्रों के आधार पर समझा जा सकता है कि हमारे संविधान निर्माताओं के मन और मस्तिष्क में कैसे आदर्श भारतीय समाज की परिकल्पना रही होगी।इन चित्रों की शुरुआत मोहनजोदड़ो से होती है, फिर वैदिक काल, महाकाव्य काल लंका पर प्रभु राम की विजय,गीता का उपदेश देते श्री कृष्ण,भगवान बुद्ध महावीर, अशोक का बौद्ध धर्म का प्रचार,(मौर्य काल),गुप्त वंश की कला पर केंद्रित हनुमानजी के दृश्य है।विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा विश्वविद्यालय, उड़िया मूर्तिकला में नटराज की प्रतिमा, भागीरथ की तपस्या से गंगा का अवतरण,मुगलकाल में अकबर का दरबार, शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह ,टीपू सुल्तान, महारानी लक्ष्मीबाई,गांधी जी का दांडी मार्च, और नोआखली में दंगा पीड़ितों के बीच का चित्र,नेताजी सुभाषचंद्र बोस,हिमालय ,रेगिस्तान और महासागर के कुल 22 दृश्य शामिल है।

इन सभी चित्रों के जरिये भारत की महान परम्परा की कहानी बयां की गई है।

संविधान की मूल रचना में राम कृष्ण,हनुमान, बुद्ध,महावीर,विक्रमादित्य,गोविंद सिंह, अकबर,टीपू सुल्तान, लक्ष्मीबाई,गांधी,सुभाष, ही क्यों है?क्या केवल संविधान की किताब को कलात्मक कलेवर देने के लिये ? बिल्कुल नही ।असल में यह चित्र भारत के लोकाचार और जीवनमूल्यों का गणराज्यीय स्वरूप में प्रतिनिधित्व देने के लिये नन्दलाल बोस से बनबाया गया था।इन चित्र के जीवनसन्देश को संविधान की इबारत के जरिये शासन और सियासत के अभीष्ट निर्धारित किये गए ।सवाल यह है कि इन्ही 22 चित्रों में नन्दलाल बोस ने रंग क्यों भरा है संविधान की पुस्तक में?इसका बहुत ही सीधा जबाब है।ये चित्र भारत की महान सांस्कृतिक विरासत के ठोस आधार है ।ये हमारीअस्मिता के प्रमाणिक दस्तावेज है ।जिनके साथ हर भारतवासी एक तरह के रागात्मक अनुराग जन्मना महसूस करता है।राम,कृष्ण,हनुमान, गीता,बुद्ध,महावीर,नालंदा,गुरु गोविंद असल मे हजारों साल से भारतीय लोकजीवन के दिग्दर्शक है।जाहिर है संविधान की मूल रचना में इन्हें जोड़ने के पीछे यही सोच थी की भारतीय गणराज्य की विकास यात्रा इन प्रतीकों के आलोक में ही आगे बढ़ेगी।लेकिन दुःखद अनुभव यह है कि पिछले कुछ दशकों ने भारतीय संविधान निर्माताओं की भावनाओं के उलट देश के शासनतंत्र और चुनावी राजनीति को विकृत धर्मनिरपेक्षता से दूषित करने का प्रयास किया है। परम्परागत भारत और आधुनिक भारत के मध्य संविधान के जिस धर्मनिरपेक्ष प्रावधान को अलगाव का आधार बनाया जाता है असल में वे आधार तो कहीं संविधान के दर्शन में है ही नही।

जिन राम,कृष्ण,हनुमान,शिवाजी को शासन के स्तर पर सेक्युलरिज्म के शोर में अछूत मान लिया गया क्या वे संविधान निर्माताओं के लिये भी अश्पृश्य थे?क्या राम की मर्यादा,कृष्णा का गीता ज्ञान हनुमान की निष्ठा,बोस की वीरता,गुरुकुल की शैक्षणिक व्यवस्था , गांधी का राम राज्य,अकबर का सौहार्द,बुद्ध की करुणा,महावीर की शीलता, गुरुगोविंद सिंह का बलिदान,टीपू और लक्ष्मीबाई के शौर्य का अक्स भारत के साथ समवेत होने से हमारी आधुनिक गणतंत्रीय व्यवस्था में कोई ग्रहण लग जाता है?हमारे पूर्वजों ने तो ऐसा नही माना इसीलिए मूल संविधान में इन सभी प्रतीकों का समावेश डंके की चोट पर किया है।वह भी नेहरू जी के आग्रह पर।असल में भारत कोई जमीन पर उकेरी गई या जीती गई या समझौता से बनाई गई भौगोलिक सरंचना मात्र नही है ।यह तो एक जीवंत सभ्यता है ।जो सृष्टि के सर्जन के समानांतर चल रही है।26 जनवरी 1950 को जिस संविधान विलेख को लागू किया गया असल मे वह परम्परा और आधुनिक भारत के सुमेलन का उदघोष था।लेकिन कालान्तर में यह धारणा मजबूत हुई कि आधुनिक गणतंत्रीय भारत का आशय सिर्फ पश्चिमी नकल, परंपरागत भारत के विसर्जन के साथ हिन्दू जीवन शैली को अपमानित करने में ही है।इसी बुनियाद पर भारत के शासन तंत्र को बढ़ाने की कोशिशें की गई।जबकि यह भूला दिया गया कि जिन सनातनी संस्कार से परम्परागत भारत भरा है वही आधुनिक भारत को वैश्विक स्वीकार्यता दिला सकता है।दुनिया में शांति,सहअस्तित्व, पर्यावरण सरंक्षण, जैसे आज के ज्वलंत संकटों का समाधान आखिर किस सभ्यता और सेक्युलरिज्म के पास है?सिवाय हमारे उन आदर्शो के पास जिन्हें आधुनिक लोग पिछड़ेपन की निशानी मानते है।

हमें यह याद रखना चाहिये कि जब तक परम्परागत सभ्यता की व्याप्ति सशक्त नही होगी हम दुनिया में अपनी वास्तविक हैसियत हासिल नही कर सकते है।दुर्भाग्य से इसी आधार को शिथिल करने में एक बड़ा वर्ग लगा हुआ है।हमारे पूर्वजों के पास अद्भूत दिव्यदर्शन था इसलिए उन्होंने भारत को धर्मनिरपेक्ष नही बनाया बल्कि धर्मचित्रों को आगे रखकर लोककल्याण के नैतिक निर्देश स्थापित किये।धर्म हमारी सनातन निधि में इस्लाम या ईसाइयत की तरह पूजा पद्धति नही कर्तव्य का विस्तार है।इसे समझने के लिये भारत की संसद के द्वार पर उकेरी गई पंक्ति को देखिये

"लोक देवेंरपत्राणर्नु

पश्येम त्वं व्यं वेरा"

मतलब-लोगों के कल्याण का मार्ग का खोल दो उन्हें बेहतरीन सम्प्रभुता का मार्ग दिखाओ।

संसद के सेंट्रल हाल के द्वार पर लिखा है

"" अयं निज:परावेति गणना लघुचेतसाम

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम""' भारत सरकार का ध्येय वाक्य "सत्यमेव जयते " है।इन उद्घघोष में सम्पूर्ण मानव के कल्याण और सद्गुणों की चर्चा है इसलिए संविधान निर्माताओं की गहरी अंतर्दृष्टि को हमें समझना होगा।

आज योग दुनिया में लोकस्वास्थ्य का मंत्र बन रहा है ।डेटा की ताकत ने आज हमारे युवाओं को राम,कृष्ण,गांधीऔर गीता के प्रति सजग किया है तो यह उन पूर्वजों के सपने को साकार करने की चहलकदमी ही है।

आशा कीजिये आने वाले भारत में नन्दलाल बोस के उकेरे गए चित्र आमजन और नेतृत्व को अनुप्राणित और आत्मप्रेरित करते रहेंगे।एक भारत श्रेष्ठ भारत के निर्माण के एकमात्र उत्प्रेरक होंगे।

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