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पल भर की पहचान: संवेदनाओं से झरे हुये मोती

पल भर की पहचान: संवेदनाओं से झरे हुये मोती

'पल भर की पहचानÓ सच्चिदानंद जोशी का हालिया प्रकाशित बोध कथा संग्रह है। इसे अल्प विराम-दो भी कहा जा सकता है। जीवन में ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं जिन्हें हम प्राय: नजरअंदाज कर देते हैं उनसे ही जीवन में सबक सीखने को मिलते हैं। इन रचनाओं में लेखक ने अपनी चिर-परिचित सरल और बोधगम्य शैली में उन तथ्यों के ऊपर प्रकाश प्रक्षेपित कर किया है जो देखन में भले छोटे लगे पर घाव गंभीर करते हैं और ऐसा एक संवेदनशील हृदय ही कर सकता है। लेखक पाठक से अपेक्षायें करता है तो पाठक की अपेक्षायें भी लेखक से है। बकौल शीन का$फ निज़ाम पाठक के लिये तालीम और तरबियत का होना बहुत जरूरी हैं। लफ्जों के महीन रेशों से बुनी हुई और नरमियत ओढ़े हुए सच्चिदानंद की बोध कथायें जीवन की सच्चाइयों को उजागर करती हैं। जीवनानुभवों से नि:सृत लेखन ही सच्चा लेखन है। लेखक ने अपने मनोगत में इसका उल्लेख करते हुए कहा है, कि संग्रह में ऐसे प्रसंगों को लाने का प्रयास किया गया है जिनकी सकारात्मकता हमें नई दृष्टि देती है। बिना शब्दों के आडंबर रचे और अतिरंजना किए व्यक्तियों और घटनाओं को सीधी सरल भाषा में हिन्दी के प्रति अनुराग और आकर्षण उत्पन्न करने का प्रयास 'पल भर की पहचानÓ में किया गया है और यही इन बोध कथाओं की उपादेयता भी है।

संकलन में कुल मिलाकर 24 घटनाक्रम अलग-अलग संदर्भों में संग्रहीत हैं। 'अट्टहासी रूद्र से विषपान की सौगंध ओ माँÓ में लेखक आदरेय स्व. अटल जी का स्मरण करते हुए उनके सहज और सरल स्वभाव के प्रति प्रणत-विनत हैं 'वहीं अपने नाम को जी गए नामवर जीÓ की उदारता और उनके वैदुष्य का चित्रण है। 'आज बाबा को होना थाÓ लेख में लेखक ने अपने 'पिताश्रीÓ के स्वभाव का वर्णन करते हुए उनके हृदय की निश्छलता को निरूपित किया है वहीं खुशी के अवसरों पर उनके न होने का अहसास उसे विचलित भी करता है। 'मेरी दाढ़ी मेरा मुल्कÓ में लेखक ने दाढ़ी से व्यक्ति की धर्म और नीयत का अनुमान लगाने वालों को आड़े हाथों लिया है वहीं भारतीय समाज को नफरत की आग में झांकने वालों की अच्छी खबर ली है। लेखक ने हिन्दू आतंकवाद शब्द पर प्रहार करते हुए रेखांकित किया कि आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद होता है वह किसी मजहब अथवा धर्म का नहीं होता। 'जिंदगी मेरे घर आनाÓ में यात्रा वर्णन करते हुए लेखक ने सहयात्रियों के वार्तालाप उनके अनुभव और अपने के साथ वर्ष में एकाधिक बार यात्रा करने का वर्णन किया है। प्रवास के लिए उम्र कोई बाधक नहीं है। सहयात्रियों की आत्मीयता या उन्हें जानने के लिए बरसों नहीं लगते है- दिल के तार ही भावनाओं से जोडऩे के लिए पर्याप्त हैं। 'लो हैंगिंग फ्रूट्सÓ में प्रबंधन के गुर हैं तो असुरक्षा भय पर नसीरुद्दीनशाह के वक्तव्य को सिरे से नकारा गया है। 'संपूर्ण जीवन कैसा होÓ में लेखक ने जीवन की प्राथमिकताओं के साथ भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में संकल्प, संयम, संतोष, सहिष्णुता, सहजीवन, सदाचार और सौजन्य (सात-स) समग्र जीवन शैली के उपादान निरूपित किए है। 'बात कुछ अपनी कुछ हिन्दी कीÓ में भाषा के गौरव बढ़ाने और हिन्दी की भूमिका पर बुनियादी सवाल उठाए गए हैं वहीं 'माता खीर भवानी और ढूलÓ में आत्म स्वीकारोति के साथ परंपरा और आस्था के प्रति ईमानदारी का बहुत ही सुंदर शब्दचित्र उकेरा गया है। लेखक ने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उन छोटी-छोटी घटनाओं को शब्द चित्र के माध्यम से इस तरह सम्पादित किया है कि पल भर को लगता है कि ये घटना तो हमारे साथ भी घटी थी- पर संवेदना के धरातल पर हम इस संदर्भ में इस तरह सोच भी नहीं पाये। इन रचनाओं में साफगोई के साथ-साथ आत्म स्वीकृतियों के स्वर भी झलकते हैं।

सच्चिदानंद जोशी की भाषा बेहद सधी हुई है। साधारण बोलचाल की भाषा में लिखी ये कथायें पाठक पर अपना प्रभाव डालने में सफल हुई हैं। शिल्प इतना सहज है, कि हर तरह का पाठक इनसे सीधे तौर पर अपने आपको जुड़ा हुआ पाता है। संस्मरणात्मक शैली में लिखी इन कथाओं को भले ही किसी भी विधा विशेष में सम्मिलित करने में हैरानी हो सकती है- किन्तु सच्चा साहित्य वही है जो आम पाठक के हृदय में उतरकर उसे अपना मुरीद बना ले। इस लिहाज से सच्चिदानंद अपने लेखन में सवा सोलह आने खरे सिद्ध हुये हैं। निश्चित ही 'पल भर की पहचानÓ संग्रह के पढऩे के बाद लेखक से आजीवन पहचान का भाव हृदय में उमड़ता है और यही इस संग्रह की सफलता का कारक है। साहित्यजगत में इसे यथोचित प्रतिसाद मिलेगा।

लेखक- डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन

समीक्षक- अनिल अग्निहोत्री

मूल्य: 300/- रुपये


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