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अभद्र और उद्दण्ड नहीं शालीन होना होगा

यह शीर्षक रागा, ममता, आकाश सहित उन जैसे सभी के लिए है।

अभद्र और उद्दण्ड नहीं शालीन होना होगा

तूणीर : नवल गर्ग

इधर रागा अब तक हार के सदमे से बाहर नहीं आ पाये हैं या कहिए कि बेचारे बाल बबुआ जी ने अपने मनोराज्य को बुनते हुए प्रधानमंत्री बनने का दिवास्वप्न देखते हुए , प्रधानमंत्री को गालियां देने का अभियान चलाकर इस आम चुनाव में जो बिसात बिछाई थी , उसे मतदाताओं ने नमो के पक्ष में आंधी चलाकर पूरी की पूरी उलट दी तो रागा भैया इसे लोकतंत्र की कमजोरी मानते हुए सदैव के लिए रूठे रहना चाहते हैं। उनका यह कहना भी नासमझी व बुद्धि की अपरिपक्वता ही समझा जाएगा कि चुनाव जीतने से भ्रष्टाचार के आरोप समाप्त नहीं हो जाते। भैया जी ! यदि तुमने अपना पूरा अभियान नमो को भ्रष्ट व चोर कहते हुए , मात्र इसी बिंदु पर केंद्रित करके नहीं रखा होता , चोर चोर के नारे नहीं लगवाए होते और प्रथमदृष्ट्या कोई ठोस साक्ष्य तुमने जनता के सामने या अब किसी फोरम पर अपने आरोप के समर्थन में रखा होता तब तो तुम्हारी बात में कुछ वजन माना जा सकता था। यहां तो तुमने इस चुनाव को इस बिंदु पर रिफरेंडम की तरह लड़ा और लड़वाया था , इसके बाद भी अपना वही राग अलाप रहे हो तो लगता है कि तुम्हारा भाव ' हम नहीं सुधरेंगे ' वाला ही है। जो तुम्हारी बची खुची पार्टी को मटियामेट करके ही दम लेगा।

यह उनका बचपना ही है कि अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश करके उन्हें लगा था कि जनता उनसे आग्रह करने के लिए उतावली हो जाएगी। हुआ उलटा। जनता तो दूर की बात उनके अपने दल के क्षत्रपों ने ही कोई ज्यादा खुशामद , भाटगिरी नहीं की। अब बेचारे मजबूर हैं। अपने ही जाल में फंस गए हैं। इस्तीफा वापिस लें तो भारी किरकिरी । नहीं लें तो खुद झुकी नजरों के साथ कुर्ते की बांयी जेब में हाथ रखकर तेजी से चलते हुए , 90 साल के बूढ़े बोरा जी या ऐसे ही अन्य किसी स्वामीभक्त को कैसे दौड़ा पायेंगे ?

अब वे दिखावे के लिए सात पन्ने के इस्तीफा पत्र में हार की जिम्मेदारी स्वयं ओढ़ने की बात कहते हुए भी , इसके लिए सरकारी मशीनरियों के दुरूपयोग , वैधानिक संस्थाओं के दबाब में रहने व पक्षपातपूर्वक काम करने जैसे बेबुनियादी आरोप लगाने में जुटे हुए हैं। इसे देख लोग आपस में बतिया रहे हैं कि

*जब गुनाहों के दाग़, चेहरे पे मचलते हैं...!*

*तो लोग आदत नहीं, बस आईने बदलते हैं...!!*

रागा भी अपनी तथा संगठन की कमियां दूर करने के बजाय सचाई से बचते हुए , आईना ही बदल रहे हैं। वे अब भी आम जन के मन को नहीं पढ़ पा रहे और पुन : अनर्गल बातें करने में जुट गए हैं। वह स्वयं के और अपने दल के चेहरों पे मचलते अतीत से अब तक के गुनाहों के दाग देखने को तैयार ही नहीं है। इसीलिए किसी कठपुतली को अध्यक्ष बनाने की जुगाड़ में लगे हुए हैं। उनके यहां ऐसे लोगों की भरमार है जो कठपुतली बनकर नवनीत लेपन की शाश्वत कला में भी माहिर हैं।

वैसे *नवनीत लेपन कला* का वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य में भी उज्जवल भविष्य दिखाई देता है। दल कोई भी हो , कमोबेश हर जगह इसका प्रभाव और इसके शौकीन मौजूद हैं। हमारे इंदौर को ही ले लीजिए ---- सत्तारूढ़ दल के एक प्रभावी नेता के चिरंजीव और नवोदित विधायक / नेता ने क्रिकेट बैट का हिंसक प्रयोग किया तो पहले तो समर्थक बड़े जोरशोर से " मैं भी बल्लेबाज "" का नारा हर्ष फायर करते हुए लगाते नजर आये। नेतासुत भी जमानत पर छूटने के बाद उसी अकड़ , हैंकड़ी और धाकड़पन के साथ घूमते दिखे , पर जैसे ही नमो ने आंखें तरेरी , सब के सब शर्म और हया के समुंदर में छिप गये। नमो को पितातुल्य कहकर , आज्ञाकारी बनने और आदर्श बघारने में जुट गए हैं।

हिंसा करना , उसके लिए उकसाना और उसका समर्थन करना , भले ही वह नवोदित विधायक के पिता श्री को नवनीत लेपन के लिए किया गया हो , किंतु स्वच्छ व आदर्श मूल्यों पर आधारित राजनीति की पुनर्स्थापना के लिए यह शुभ संकेत तो नहीं है। चूंकि नमो ने अपने नये नारे में *सबका विश्वास* शब्द भी शामिल किया है , इसलिए उनकी इस घटना पर नाराजगी व रोषपूर्ण प्रतिक्रिया अत्यंत स्वाभाविक है। उनकी मंशा के अनुसार यदि नवोदित जी और उनकी हिंसक प्रवृत्ति का समर्थन करने वाले सभी छोटे - बड़ों के विरूद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही तुरंत होती है तो यह अन्य के लिए भी एक बड़ा सबक होगा , जो लोकतंत्र की मजबूती व इसके बेहतर भविष्य के लिए बहुत जरूरी है।

नमो अभी भी जिस तरह जमीन से जुड़े रहकर , समाज के सबसे निचले तबके की चिंता करते हुए उनके विकास व उत्थान के लिए सक्रिय हैं , पसीना बहा रहे हैं , इससे स्पष्ट है कि उन्होंने इतनी ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी विनम्रता से ओतप्रोत हैं वह नवोदितों व इन जैसे सभी के लिए एक मिसाल है। मानो नमो रहे हों कि --

*हमने सूरज की रोशनी में भी कभी अदब नहीं खोया... !*

*कुछ लोग जुगनुओं की चमक में ही मगरूर हो गए....!!*

जुगनुओं की चमक में ही मगरूर हो जाने वालों के लिए बाबा तुलसीदास जी ने ठीक ही लिखा है " प्रभुता पाए काहे मद नाहीं "। किसी और ने भी कहा है -- "" एक कतरा जो आज उभरता है / समंदरों के ही लहजे में बात करता है। "" अराजकता फैलाना , गुंडागर्दी करना , कानून हाथ में लेना , हेंकड़ी , रंगदारी , भाईगिरी दिखाना , अभद्र व डराने वाली भाषा बोलना , रंगदारी , हफ्ता , कट मनी अवैध धन के रूप में वसूल करना राजनीति को गंदा और जनमानस को आतंकित करते हैं। यह लोकतंत्र पर ऐसे बदनुमा दाग हैं जो समूचे समाज को दूषित कर रहे हैं। इन्हें दूर करने के लिए केवल नमो को ही नहीं , सभी को गंभीरतापूर्वक प्रयास करना चाहिए।

भाषा और भाव दोनों ही शालीन हों तो पूरा वातावरण गरिमा , सकारात्मकता और संस्कारपूरित दिखने लगता है। इस पृष्ठभूमि में रचे बसे अनेक - अनेक व्यक्तित्व पूर्व में व वर्तमान में हैं किंतु यदि उदाहरणस्वरूप कुछ को गिनना हो तो जिन्होंने भारतमाता मंदिर के संस्थापक ब्रह्मलीन श्री स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी को , महामंडलेश्वर श्री अवधेशानंद जी को , भारतरत्न स्वर्गीय अटल जी को , आदरणीया सुषमा स्वराज जी , सुविख्यात युवा कवि व चिंतक कुमार विश्वास व कवियत्री कविता तिवारी को सुना है , वे मानेंगे कि भाव और भाषा का सामंजस्य , कैसे किसी व्यक्ति ही नहीं पूरे वातावरण को सुरभित और शोभायमान कर देता है।

आज की राजनीति में इस तत्व का पुन : प्रवेश जरूरी है। माया , ममता , अखिलेश , लालू व अन्य अनेक क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों और उनके अंध अनुयायियों को यह समझना चाहिए कि आज का युवा गाली गलौज , मारपीट नहीं -- शालीन , अहिंसक और सुसंस्कृत व्यवहार व आचरण चाहता है। यदि आम भारतीय गाली गलौज , हिंसा, मारपीट और उद्दण्डता का हामी होता तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे की मनसा , उ प्र में माया , अखिलेश , बिहार में लालू वंश , बंगाल में ममता व कम्युनिस्ट और पूरे देश में रागा की पार्टी की इस तरह मिट्टी पलीत नहीं होती। यदि नेतासुत आकाश एवं उन जैसे ही अनेक छुटभैये व बड़भैये , चाहे वे किसी भी दल या समाज में हों भद्रता , शालीनता , विनम्रता , निरभिमानता , सत्य व ईमानदारी आदि सद्गुणों से स्वयं को विभूषित नहीं करेंगे तो आम जन और स्वयं नमो उन्हें कचराघर का रास्ता दिखाने में परहेज नहीं करेंगे।

भारत में अब सकारात्मकता के नये युग की नींव रखी जा चुकी है , जो इससे इतर सोचेगा वह मुंह की खाएगा , इतिहास के पन्नों में , गुमनामी के घटाटोप में विलीन हो जाएगा । अत: समाज व राजनीति के बिगड़ैल जनों संभल जाओ -- अन्यथा नमो के विराट स्वच्छता अभियान यज्ञ में अगली आहुति तुम्हारी ही होगी।

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