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ब्रज की होली की सतरंगी छटा...

ब्रज की होली की सतरंगी छटा...

समरसता का संदेश देती है होली

भारत के हर त्यौहार में एक भाव भरा संदेश होता है। होली का त्यौहार सारे बंधनों को खोलकर समरसता का संदेश देता है। इस दिन सारे लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूल कर गले लगते हैं और एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। वर्तमान में देश में जिस प्रकार से सामाजिक समरसता में जहर घोलने का प्रयास किया जा रहा है, उसके कारण समाज के बीच खाई भी बढ़ती जा रही है। ऐसे कुत्सित प्रयास करने वाले निश्चित ही देश की एकता को खंडित करने का सपना देख रहे हैं। हम अपने मूल भाव के अनुसार त्यौहार मनाएंगे तो स्वाभाविक है कि हमारे त्यौहार जिन्दा रह पाएंगे, नहीं तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि आने वाली पीढिय़ां हमसे ही सवाल करेंगी कि यह होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है। हम यह भी भली भांति जानते हैं कि होली के पारंपरिक स्वरुप को आधुनिकता के नाम पर बिगाडऩे का भी दुष्चक्र चल रहा है। कहीं से आवाज आती है कि होली पर पानी का अपव्यय नहीं करें। ऐसा कहने वाले लोग पूरे साल भर पानी बचाने के बारे में कोई चिंता नहीं करते। जबकि पूरे साल भर पानी बचाने का अभियान चला सकते हैं। होली परंपरा के अनुसार खेली जानी चाहिए। हालांकि केवल गुलाल से होली खेलने का समर्थन करने वाले लोग बहुत ही सकारात्मक कार्य करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इनका यह कार्य केवल होली पर क्यों होता है? साल के और दिनों में इनकी सक्रियता क्यों नहीं दिखती?

इन सारे सवालों के जवाब खोजे जाएं तो यही दिखाई देता है कि यह सब एक योजना के अनुसार ही किया जा रहा है। भारतीय त्यौहार अपने मूल पारंपरिक भाव से मनाए जाएंगे तो स्वाभाविक ही है कि विश्व में सामाजिक समरसता का संदेश प्रवाहित होगा। हम जानते हैं कि भारतीय दर्शन में विश्व के कल्याण का भाव समाहित रहा है और यह दर्शन भारतीय त्यौहारों में प्रकट होता है। इसलिए देश की एकता के लिए, विश्व के कल्याण के लिए यह जरुरी है कि भारतीय त्यौहारों को परंपरा के अनुसार मनाने का मार्ग प्रशस्त करें।

कौन के हाथ कनक पिचकारी

रंग-गुलाल का अनूठा पर्व होली अपने देश में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है परंतु ब्रज की होली अपनी अनूठी और अनोखी परम्पराओं के कारण सारे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां होली का रंग बसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक पूरे पचास दिनों समूचे ब्रज के कण-कण में छाया रहता है। चैत्र कृष्ण द्वितीया से चैत्र कृष्ण पंचमी तक तो यहां होली अपने पूरे शबाब पर होती है।

समूचे ब्रज मंडल में होली की शुरूआत बसंत पंचमी से हो जाती है। इस दिन से ब्रज के सभी मंदिरों में ठाकुर जी के नित्यप्रति के श्रंृगार में गुलाल का प्रयोग होने लगता है। हुरिहारे भांग और ठंडाई की मस्ती में गा उठते हैं।

आजु बिरज में होरी रे रसिया

होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया

आजु बिरज में होरी रे रसिया

कौन के हाथ कनक पिचकारी

कौन के हाथ कमोरी रे रसिया।

ब्रज में होली की विधिवत् शुरूआत फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मथुरा मांट मार्ग पर मथुरा से १८ किलोमीटर दूर स्थित मानसरोवर गांव में लगने वाले राधा रानी के मेले से होती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल नवमी को बरसाना में नंदगांव के हुरिहारों और बरसाना की गोपिकाओं के मध्य विश्व प्रसिद्ध ल_मार होली होती है।

इस होली में नंदगांव के गुसाई अपने को श्रीकृष्ण का प्रतिनिधि मान कर राधारानी के प्रतीक के रूप में बरसाना के गुसाइयों को और बरसाना के गुसाई अपने को राधारानी का प्रतिनिधि मान कर नंदगांव के गुसाइयों को रंग की बौछारों के मध्य प्रेम भरी गालिया देते हैं। साथ ही श्रंृगार रस से परिपूर्ण हंसी मजाक भी करते हैं। तत्पश्चात् बरसाना की गोपिकाएं अपने-अपने घूंघट की ओट से नंदगांव के हुरिहारों पर लाठियों की बौछार करती हैं। इन प्रहारों को नंदगांव के हुरिहारे रसिया गा- गाकर अपनी ढालों पर रोकते हैं। गोपिकाओं की लाठियों के प्रहारों से नंदगांव के हुरिहारों की ढाले देखते ही देखते छलनी हो जाती हैं।

अगले दिन यानि फाल्गुन शुक्ल दशमी को इसी प्रकार की लट्ठमार होली नंदगांव में खेली जाती है। इस होली में नंदगांव की गोपिकायें बरसाना के गुसाइयों पर लाठियां चलाती हैं।

नंदगांव की होली हो चुकने के अगले दिन समूचे ब्रज में रंग भरी एकादशी का पर्व बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन ब्रज के प्राय: सभी मंदिरों में ठाकुरजी के समक्ष रंग-गुलाल, इत्र केवड़ा और गुलाब जल आदि की होली होती है। कुछ मंदिरों से राधा और कृष्ण के स्वरूपों की झांकियां भी निकलती है। इन झांकियों के साथ बहुत बड़ी मात्रा में रंग-अबीर रूपी कृपा प्रसाद साथ चलता है। यह कृपा प्रसाद लोगों पर इस कदर उलीचा जाता है कि देखते ही देखते ब्रज का हरेक कोना इंद्रधनुषी हो जाता है।

फाल्गुन शुक्ल एकादशी से फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी तक पूरे पांच दिन वृंदावन के ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में सुबह-शाम गुलाल, टेसू के रंग और इत्र व गुलाब जल आदि से बड़ी ही जबरदस्त होली खेली जाती है। इस अवसर पर लड्डू और जलेबी की होली होती है।

ब्रज में वन-उपवनों एवं उद्यान वाटिकाओं की मरमार है। जिनमें शीत ऋतु के बाद सुहानी बसंत ऋतु के आने पर नाना प्रकार के फूल खिलते हैं। अत: ब्रज में होली पर रंग-बिरंगे, कोमल मृदुल महकते-मुस्कराते फूलों से भी होली खेली जाती है। फूलों की यह होली वृंदावन में रासलीलाओं के दौरान राधा व उनकी सखियाँ तथा कृष्ण व उनके सखा फूलों से परस्पर इस कदर होली खेलते हैं कि राधा-कृष्ण फूलों की वर्षा से उसके अंदर दब-ढक जाते है और लीला स्थल पर फूलों का एक विशाल ढेर बन जाता है। इस ढेर में से निकलते हुए राधा-कृष्ण जब इन फूलों को अपने दोनो हाथों से चारों ओर उछालते हैं तो बड़ा ही मनोरम दृश्य उत्पन्न होता है।

फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होलिकादहन होता है। इस दिन मथुरा के फालैन और जटवारी ग्राम में जिस प्रकार होली जलाई जाती है, वह अप्रतिम है। यहाँ फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी को विशालकाय होली सजाई जाती है। इस होली को यहाँ के प्रहलाद मंदिर का पण्डा प्रहलाद कुण्ड में स्नान करने के बाद प्रज्ज्वलित करता है तथा इस होली को उसकी ऊंची-ऊंची लपटों के मध्य में से नंगे पांव पार करता है परन्तु उसका बाल तक बांका नहीं होता।

मथुरा से लगभग 52 किलोमीटर दूर स्थित छाता तहसील के जटवारी गांव में भी होलिका दहन के दिन एक पण्डा जलती हुई होली की विशालकाय तेज लपटों के मध्य में से नंगे पांव सकुशल बाहर निकलता है। होलिका दहन के अगले दिन यानी धुलेंड़ी को समूचे ब्रज में रंग और गुलाल की बड़ी ही विकट होली खेली जाती है।

धुलेंड़ी के दिन सारे देश में होली समाप्त हो जाती है परन्तु ब्रज में इसके दस दिन बाद तक भी होली किसी न किसी रूप में निरन्तर चलती रहती है। धुलेंड़ी के दिन से चार दिन बाद तक समूचे ब्रज में तानों के गायन का क्रम चलता है। यह ब्रज की एक विशेष समूह गायन शैली है। अपने देश में ब्रज के अलावा कहीं भी तान-गायकी सुनने को नहीं मिलती है।

चैत्र कृष्ण द्वितीया को मथुरा से 22 कि.मी. दूर बलदेब (दाऊजी) के ठाकुर दाऊदयाल मंदिर में दाऊजी का हुरंगा होता है, जो कि अत्यधिक लोकप्रिय है। इस हुरंगे में गुसाई समाज के हुरिहारे व हुरिहारिनें गोप व गोपिका के स्वरूप में होली खेलते हैं। हुरिहारे मंदिर में बने हुए कुण्ड में से पिचकारियों व बाल्टियों में रंग भर-भर कर हुरिहारिनों को रंग से सराबोर कर देते है। चैत्र कृष्ण तृतीया को बठैन में लट्ठमार हुरंगा होता है। इस हुरंगे में राधा रानी रूपी हुरिहारिनें बलराम रूपी हुरिहारों पर लाठियों से प्रहार करती है जिन्हें बलराम रूपी हुरिहारे अपनी ढालों पर रोकते है। अन्त में यह हुरंगा जय जय कार के साथ समाप्त होता है। ब्रज में होली की मस्ती में धुलेंडी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक जगह-जगह चरकुला नृत्य, हल नृत्य, हुक्का नृत्य, बम्ब नृत्य, तख्त नृत्य, चांचर नृत्य एवं झूला नृत्य आदि अत्यन्त्र मनोहारी नृत्य भी होते हैं।

-गोपाल चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार


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