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मोदी-योगी ने सरकार और संगठन कर्मयोगी की तरह चलाया

मोदी-योगी ने सरकार और संगठन कर्मयोगी की तरह चलाया

नई दिल्ली। राजनीति में चुनावी सफलता बड़े मुश्किल से दोहराई जाती है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने यह कमाल करके दिखाया। हालांकि, 2004 और 2009 में कांग्रेस नीत यूपीए ने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए थे लेकिन तब कांग्रेस को 2004 में केवल 145 सीटें और 26.5 प्रतिशत वोट मिले थे। 2009 में 206 सीटें और 28.5 मत प्रतिशत था। 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई तब उसे 282 सीटें और 31.5 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में भाजपा का स्कोर तीन सौ के पार पहुंचा और 49 प्रतिशत मत मिले। 17 राज्यों में उसका मत प्रतिशत पचास के पार जा पहुंचा। इससे यह साबित हो गया कि 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा महज जुमला न होकर हकीकत बन गया है। 2014 में नरेंद्र मोदी जनता की उम्मीद बनकर आए और 2019 में भरोसा बनकर उभरे। इस धारणा के साथ कि नेक इरादों के साथ केवल जनता के साथ जुड़े रहिए, सफलता आपके कदम चूमेगी। मोदी ने नेक इरादों पर चलते हुए देश में राजनीति की दिशा ही बदलकर रख दी है। उत्तर प्रदेश में जातिवाद और परिवारवाद का पर्याय रहीं दो पार्टियां सपा-बसपा के अवसरवादी महागठबंधन को जनता ने सिरे से खारिज करते हुए दूसरे राज्यों से मिलने वाले जनादेश के सुर में मिलाया। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और पूर्वात्तर राज्यों के परिणाम बताते हैं कि इन राज्यों की जनता ने जैसे ठान रखा था कि मोदी के बढ़ते हुए कदमों को रूकने नहीं दिया जाएगा। फिर कर्नाटक और महाराष्ट्र की जनता ने मोदी के हाथ मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रांति लानी पढ़ती है। मोदी ने पार्टी के जनाधार में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के साथ समाज के सभी वर्ग के नए मतदाताओं को अपने साथ जोड़ लिया। खासकर युवा मतदाताओं को मोदी सरकार की हाईटेक प्रणाली बहुत प्रभावित कर गई।

भ्रष्टाचार, वंशवाद, वोट बैंक और राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करने वाले दलों के विपरीत मोदी ने जनता के समक्ष अलग सोच रखते हुए लगातार कड़ी मेहनत करके दिखाया कि इरादा नेक हो तो नामुमकिन भी मुमकिन है। यही कारण है कि चुनावी मैदान में अकेले मोदी को घेरने के लिए अवसरवादी गठबंधन हुए मगर जनता ने मजबूर सरकार के बजाए मजबूत सरकार देने की ही समझदारी दिखाई। लोगों ने जातिवाद और वंशवाद से उपर उठकर राष्ट्रवाद को प्रमुखता देते हुए एक बार फिर से मोदी सरकार में भरोसा जताया। कांग्रेस के लिए वंशवाद से मुक्ति पाने का समय आ गया है।

अमितशाह का बेजोड़ प्रबंधन

चुनाव जीतने के लिए संगठनात्मक मजबूती बेहद जरूरी होती है। शाह ने पूरे पांच साल संगठन को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। मोदी ने अगर सरकार को तो अमित शाह ने संगठन को कर्मयोगी की भांति चलाया। चुनाव में प्रचार की आक्रामकता व नेतृत्व का प्रभाव बेहद मायने रखता है। अमित शाह ने देश के तमाम राज्यों में लगातार घूमकर लोगों में यह भरोसा बनाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ देश को विकास की दिशा में आगे ले जा रहे हैं। शाह ने लोगों में यह भी भरोसा जगाया कि मोदी दूसरे नेताओं के विपरीत स्वार्थ, परिवारवाद, भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं। वे संगठन स्तर पर माइक्रो प्रबंधन पर जोर देते रहे तो मंच से लोगों को मोदी सरकार की योजनाओं के बारे में बताते रहे। फिर उनकी प्रबंधन क्षमता का ही कौशल था कि कार्यकर्ता जनता के बीच उज्जवला योजना, शौचालय, स्वच्छता अभियान और आयुष्मान योजनाओं को द्वार-द्वार तक पहुंचाने में कामयाब हो गए।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने माइक्रो प्रबंधन पर जोर देते हुए इसे जीत का आधार बनाया। वे इसे निचले स्तर तक ले गए। बूथ प्रबंधन इसी रणनीति का खास महत्वपूर्ण पहलू है। बूथ ने संचार को सशक्त बनाते हुए पार्टी की आम आदमी तक पहुंच बढ़ाई। सारे मंडलों का एक इंचार्ज होता था। हर जिले में एक हजार लोगों को लगाया गया था, जिन्हें सीधे जिले के कार्यालयों से जोड़ा गया था। इन कार्यालयों की फंडिंग भी केंद्र सरकार की ओर से की गई थी। यह एक आधुनिक व बेहतरीन तकनीकी थी जो अन्य पार्टियों की सोच से बाहर थी। निश्चित रूप से माइक्रो प्रबंधन जैसे मामले में अमित शाह का कोई विकल्प हो ही नही ंसकता था। तभी अमित शाह चुनाव के अंतिम दिन यानि 19 मई को तीन सौ प्लस का दावा कर रहे थे। यह कोई अनायास या अंधेरे में तीर चलाने जैसा कोई काम नहीं था और न ही कोई जादूगिरी। यह मोदी-शाह की जोड़ी अनवरत और अथक परिश्रम करने वाली थीम थी। जो आज सफलता के रूप में दिख रही है।

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