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मकर संक्रान्ति पर सूर्य पूजा क्यों?

मधुकर चतुर्वेदी

मकर संक्रान्ति पर सूर्य पूजा क्यों?

प्रकृति का प्रभातकाल 'मकर संक्रांति'

मकर संक्रान्ति प्रकृति का प्रभातकाल हैै। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने से इस पर्व का प्राकट्य होता है। इस दिन सूर्य उत्तरायण हो जाते हंै। उत्तरायण की अवधि को प्रकृति का दिन तथा दक्षिणायन को प्रकृति की रात्रि कहा जाता है। तिथि काल और सूर्य पृथ्वी की गति के कारण 14 जनवरी को मनाये जाने वाले प्रकृति के प्रभातोत्सव 'मकर संक्रान्तिÓ पर स्वदेश की प्रस्तुति.....'तिलतिल बढ़त प्रकाश'.......

भारत में मकर संक्रान्ति खगोलीय घटना के साथ ही देश की संस्कृति तथा सभ्यता के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस पर्व को श्रद्धा, आस्था, उमंग के साथ अलग-अलग प्रदेशों में अपने ढंग से मनाने की चिरपरिचित परंम्परा आज भी विद्यमान है। गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, सरयू, नर्मदा और अन्य वैदिक जलधाराओं का जल संक्रान्ति पर नवीन और पवित्र हो जाता है। क्योंकि सूर्य की राशि परिवर्तन से उत्पन्न ज्योति किरणों से उसकी समस्त मलिनता नष्ट हो जाती है। प्रकृति विकास की ओर अग्रसर होकर समस्त जीवों को नयी ऊर्जा-आभा के साथ देने को तत्पर दिखायी देती है।

मकर संक्रान्ति पर सूर्य अपनी कक्षाओं में परिवर्तन कर दक्षिणायन से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है। जिस राशि में सूर्य की कक्षा का परिवर्तन होता है, उस संक्रमण काल को ही संक्रान्ति कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में हुये परिवर्तन को अन्धकार से प्रकाश की ओर बढऩा माना जाता है। इस संक्रान्ति से दिन बढऩे लगता है और रात्रि की अवधि कम हो जाती है। दिन बढऩे से प्रकाश अधिक होगा और रात्रि छोटी होने से अन्धकार की अवधि कम होगी।

मकर संक्रान्ति का उत्सव मोक्षदायनी गंगा नदी के ज्यादा समीप है। इस दिन गंगास्नान और गंगा के निमित्त किये गये कार्यों का विशेष महत्व है। संगम नगरी प्रयाग का गंगा स्नान तो विश्व प्रसिद्ध है। यहां संगम तट पर हर वर्ष माघ मेला लगता है। जिसमें एक मास गंगा तट पर रहकर कल्पवास किया जाता है। उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति का एक समान रुप हमें गंगा आराधना के रुप में दिखायी देता है। समस्त लोग इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हुये सूर्योपासना करते हैं। यहां ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल-तिल बढ़ती है। इसलिये इस दिन तिल के मिष्ठानों को इष्टोपासना के लिये प्रयोग करते हंै और आपस में उसका वितरण करते हुये शुभकामनाएं देते हुये उत्सव मनाते हंै।

ब्रज वृन्दावन में भी मकर संक्रान्ति के पर्व को ब्रजवासी यमुनाजी के पवित्र जल में स्नान कर पूजन के साथ मनाते हैं। क्योंकि ब्रज में यमुनाजी सूर्य तनया है। सूर्य के निमित्त तिल, गुड़ मिश्रित जल से अघ्र्य प्रदान करते हंै। इस दिन ब्रज में खिचड़ी का दान सर्वत्र ही दिखायी देता है। मंन्दिरों में मेवे की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।

मकर संक्रान्ति के पर्व को सब तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार के संदर्भ में भी देखा जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन बंगाल स्थित गंगा और सागर के संगमतट पर भारत के हर स्थान का प्रतिनिधित्व सम्मलित होता है। दूसरे तीर्थो में अनेक बार जाने, दर्शन करने का जो पुण्य होता है, उतना पुण्य गंगासागर में एक बार के दर्शन से हो जाता है। गंगासागर की यात्रा वर्ष में मात्र संक्रान्ति पर ही सम्पन्न होती है। गंगासागर में गंगा और समुद्र की संयुक्त उपासना नारियल, जनेउ की भेंट से होती है। यहां पिण्डदान व गाय दान का संकल्प विशेष प्रयोजनीय है। यहां का कपिलमुनि क्षेत्र विख्यात है, जो समुद्र के बीच में होने के बाद भी डूबता नहीं हैं।

राजस्थान में मकर संक्रान्ति सौभाग्य का उत्सव है। संक्रान्ति के दिन राजस्थान की स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर तथा मोतीचूर के मिष्ठानों को अपने बुजुर्गो को वायने के रुप में प्रदान करती है तथा किसी भी वस्तु का चौहद की संख्या में संकल्प कर चैदह विप्रों को दान करती है। दक्षिण भारत में भी मकर संक्रान्ति का पर्व बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां इस पर्व को पोंगल के नाम से जाना जाता है। भारत की संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन में अनादिकाल से ही पर्वोत्सव की भूमिका रही है। सभी पर्वो का मूल मात्र प्रकृति प्रेम है। प्रकृति प्रेम से मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता प्राप्त होती है। पर्व का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अर्थ उन आचरणों से है, जो शुद्ध, सरल और सात्विक हो। वास्तम में मकर संक्रान्ति एक ऐसा उत्सव है, जिसमें भारत की विशाल संस्कृति और मान्यताओं के दर्शन आस्था.भावना और प्रकृति प्रेम के रुप में दिखायी देते हैं।

मकर संक्रान्ति पर सूर्य पूजा क्यों?

मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति शुरू हो जाती है। इसलिये इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही दिन चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे.पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। मकर संक्रांति से प्रकृति भी करवट बदलती है।

संक्रान्ति में तिल का महात्म्य

हमारे ऋ षि मुनियों ने मकर संक्रांति पर्व पर तिल के प्रयोग को बहुत सोच समझ कर परंपरा का अंग बनाया है। आयुर्वेद के अनुसार मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से तिल का विशेष महत्व है। इसीलिए हमारे तमाम धार्मिक तथा मांगलिक कार्यों में पूजा अर्चना या हवन और यहां तक कि विवाहोत्सव आदि में भी तिल की उपस्थिति अनिवार्य रखी गई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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